Spirit of a Fighter – Chapter 871
जब हम आँगन में पहुँचे तो चक्की की आवाज़ नहीं आ रही थी। गुड़िया का स्कूल का बस्ता दरवाज़े पर पड़ा था, और माँ की चप्पल चौखट के पास। घर खाली था, पर खाली नहीं था — उसमें वो सन्नाटा था जो किसी के चले जाने के बाद रह जाता है।
मीरा ने घर में घूमकर देखा। मैं बाहर आँगन में खड़ा रहा और मैंने गंध पकड़ने की कोशिश की। माँ की गंध। गुड़िया की गंध। चक्की के आटे की गंध। पर उन सब के ऊपर एक और गंध थी — नीम का तेल, वही जो कब्र के मैदान में था। यानी यहाँ भी ठाकुर के आदमी आए थे।
"वो हवेली में हैं," मैंने कहा। "माँ और गुड़िया। ठाकुर ने उन्हें उठवा लिया।"
"तो सुबह का इंतज़ार क्यों?" टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ में पहली बार गुस्सा था, और मुझे ये नया लगा। "अभी चलते हैं। मशालें लेकर। दरवाज़ा तोड़कर।"
"नहीं," मीरा ने कहा। "अगर हम टूटकर घुसे, तो वो गुड़िया को लेकर भाग जाएँगे — या कुछ और कर देंगे। हमें ऐसे घुसना है कि उन्हें पता ही न चले।"
"सुरंग," मैंने कहा। मैंने मीरा की तरफ़ देखा और वो समझ गई।
"कुएँ वाली राह," उसने कहा। "पर वो राह अंधेरी है। और हमें पता नहीं कि वो कहाँ निकलती है।"
"तो पता करेंगे," मैंने कहा। "आज रात। अभी।"
रात के तीसरे पहर में हम तहखाने में थे। कालू काका ने एक और लालटेन जलाई और हमें उस सुरंग के मुँह तक ले आए जो तहखाने की पिछली दीवार के पास थी — एक छोटा-सा सूराख, जिस पर पत्थर की सिल रखी थी। कालू काका ने बताया कि उन्होंने बीस साल पहले इस सिल को खिसकते देखा था, जब भैरव यहाँ आया करता था।
हमने सिल खिसकाई। अंदर से हवा आई — ठंडी, नम, और उसमें मिट्टी की वो गंध थी जो बताती थी कि राह लंबी है। टिंकू ने हिम्मत से पहला कदम रखा, फिर मीरा, फिर मैं, और सबसे पीछे कालू काका अपनी कुदाल लेकर।
सुरंग संकरी थी। कहीं-कहीं हमें झुककर चलना पड़ता था, कहीं घुटनों के बल। मेरी उँगलियाँ दीवार पर सरकती रहीं और उन्हें ठंडी मिट्टी और पुराने पत्थर का एहसास होता रहा। मीरा की लालटेन आगे-पीछे झूलती रही और उसकी रोशनी में परछाइयाँ हमारे साथ चलती रहीं।
रास्ते में एक जगह सुरंग दो हिस्सों में बँट गई। बायाँ रास्ता ऊपर की तरफ़ जाता था, दायाँ नीचे। मैंने आँखें बंद करके गंध पकड़ी — बाएँ से हवा आ रही थी, जिसमें हल्की-सी कपूर की गंध थी। दाएँ से वो गंध नहीं आ रही थी, पर वहाँ से पानी की आवाज़ आ रही थी।
"बायाँ," मैंने कहा। "कपूर। वही गंध जो कब्र पर थी।"
हम बाएँ मुड़े। सुरंग ऊपर की तरफ़ जाती थी, और हर कदम पर हवा गरम होती जा रही थी। फिर अचानक सुरंग खुली और हम एक गोल कमरे में खड़े थे। ऊपर से रोशनी आ रही थी — चाँदनी, किसी दरार से। और बीच में एक कुआँ था — छोटा, पत्थर का, जिस पर जंग लगी थी। उसके किनारे पर मिट्टी के दीये रखे थे, कुछ जले हुए, कुछ नए। और कुएँ के पास, ज़मीन पर, एक पीतल की संदूक थी।
मेरी साँस रुक गई। संदूक छोटी थी, पर भारी। उसका ढक्कन बंद था, और उस पर ताला नहीं था — बस एक रस्सी बँधी थी, जिसका सिरा कुएँ के पत्थर से बँधा था।
"वो देखो," टिंकू ने फुसफुसाया।
मैं आगे बढ़ा। मेरे हाथ काँप रहे थे और मेरा दिल कानों में धड़क रहा था। मैंने रस्सी खोली और संदूक का ढक्कन उठाया।
अंदर हड्डियाँ थीं। साफ़ रखी हुईं, कपड़े में लिपटी हुईं। और उनके ऊपर एक छोटी थैली थी, जिसमें कुछ काग़ज़ और एक चाँदी की अंगूठी थी। मैंने थैली उठाई और काग़ज़ खोला।
उस पर लिखा था, बूढ़े काँपते हाथों से, "ये हड्डियाँ भवानी सिंह की हैं। नंदकिशोर ने इन्हें जलाने का हुक्म दिया था। मैंने बचा लीं। मैंने अपने बेटे को नहीं बचाया, पर उसकी हड्डियों को बचा लिया। — गंगा।"
मेरे हाथ से काग़ज़ फिसल गया। मैं संदूक के पास घुटनों पर गिर पड़ा और मैंने अपना माथा उसके ठंडे पीतल पर टिका दिया। आँसू आए, पर इस बार वो गुस्से के नहीं थे। वो कुछ और थे, जिसका नाम मुझे नहीं पता था।
"वो बुरी नहीं है," मीरा ने धीरे से कहा। "वो सिर्फ़ डरपोक है।"
"उसने मेरे पिता की हड्डियाँ बचाईं," मैंने कहा। "पर उसने मेरे पिता को बचाने की कोशिश नहीं की। ये कैसा हिसाब है?"
कालू काका ने मेरा कंधा पकड़ा। "बेटा, कुछ लोग डर के मारे दूसरों की हड्डियाँ बचा पाते हैं, ज़िंदगी नहीं। गंगा वैसी है। उसे माफ़ करना तेरे हाथ में है, पर पहले हमें उसे बोलने पर मजबूर करना होगा।"
मैं उठा। मैंने संदूक का ढक्कन बंद किया और टिंकू की तरफ़ देखा।
"टिंकू, तू यहीं रुक। संदूक की हिफ़ाज़त कर। कुछ भी हो, ये संदूक यहाँ से नहीं जानी चाहिए।"
"पर भाई…"
"मेरी बात मान।" मैंने उसका कंधा पकड़ा। "तू मेरा सबसे पक्का आदमी है। और आज रात मुझे सबसे पक्का आदमी यहीं चाहिए।"
टिंकू ने मेरी आँखों में देखा, और फिर उसने सिर हिलाया। "ठीक है। पर अगर तू सुबह तक नहीं आया, तो मैं ये संदूक लेकर पंचायत के सामने खड़ा हो जाऊँगा। और तब मुझे कोई नहीं रोक पाएगा।"
मैं हँसा। पहली बार उस रात। "ये तो तूने अभी से कह दिया, टिंकू। अब तो मुझे आना ही पड़ेगा।"
मैं और मीरा और कालू काका उस कुएँ की सीढ़ियों से ऊपर चढ़े। सीढ़ियाँ उसी हवेली के पीछे के आँगन में खुलीं, जहाँ गंगा देवी का दीया जलता था। सुबह की पहली किरण आ रही थी और हवा में ठंडक थी।
और हमने देखा कि हवेली के पिछले दरवाज़े पर गंगा देवी खुद खड़ी थीं।
उनके हाथ में लालटेन थी, और उनका चेहरा उस उजाले में और भी झुर्रीदार लग रहा था। वो हमें देखकर चौंकीं नहीं। वो हमारा इंतज़ार कर रही थीं।
"मुझे पता था तुम आओगे," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ बुढ़िया जैसी नहीं, बस थकी हुई थी। "संदूक मिल गई?"
मैं आगे बढ़ा। "आपने बचाई। क्यों?"
"क्योंकि मैं बीस साल से ये जानती हूँ कि एक दिन कोई आएगा जो इन्हें माँगेगा।" उन्होंने लालटेन नीचे रख दी। "मैंने तुम्हारे पिता को नहीं बचाया, वीर। ये मेरा गुनाह है। पर मैं उनकी हड्डियों को बचाकर अपना कुछ हिसाब साफ़ करना चाहती थी।"
"मेरी माँ और बहन कहाँ हैं?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ सख़्त थी। "अगर आप कुछ जानती हैं, तो अभी बताइए।"
गंगा देवी ने पीछे, हवेली की तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में डर आया — वो डर जो सच बोलने वाले की आँखों में होता है।
"वो अंदर हैं," उन्होंने कहा। "नंदकिशोर ने उन्हें पूजा के कमरे में बंद किया है। पर वीर, सुन — अंदर सिर्फ़ नंदकिशोर नहीं है। उसने शहर से दो आदमी बुलाए हैं। बड़े आदमी। जो अखाड़े के पैसों का हिसाब रखते हैं। वो आज सुबह आ रहे हैं। और उन्हें पता चल गया है कि तुम्हारे पास ख़त है।"
"तो फिर देर क्यों?" मैंने कहा।
मैं आगे बढ़ा, पर तभी हवेली के अंदर से एक आवाज़ आई — तेज़, चीखती हुई। गुड़िया की आवाज़। "भैया! भैया, मैं यहाँ हूँ!"
मेरे पैर जम गए।
और तभी, उसी वक़्त, हवेली के सामने वाले दरवाज़े से बैलगाड़ी की आवाज़ आई और एक हाँफती हुई आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।
"अरे मैंने तो सुना है… अरे वीर!" सुक्खी बुआ आँगन में घुसीं, उनकी साड़ी का पल्लू कंधे से खिसक रहा था और उनके हाथ में पान का बीड़ा नहीं था — पहली बार। "मैं तो सीधे पंचायत से आ रही हूँ। अरे, हवेली में आज रात कोई पूजा हो रही है, और वहाँ एक बड़ी पीतल की संदूक ले जाई गई है — जिसमें से बदबू आ रही थी। अरे मैंने तो सुना है… मरे हुए की बदबू।"
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