Spirit of a Fighter – Chapter 860
और तभी मुझे मिट्टी की वो गंध आई — कपूर वाली, हल्की, पहचानी हुई। मैं रुक गया। कमरे के कोने में कुछ था।
"मीरा," मैंने फुसफुसाया। "यहाँ कोई है।"
हम और आगे बढ़े। एक और दरवाज़ा, और उसके पीछे एक छोटा कमरा। लोहे का खंभा, और उससे बँधी एक बच्ची — आठ-नौ साल की, दुबली, बाल बिखरे हुए, मुँह पर कपड़ा बँधा।
मैंने कपड़ा खोला और उसने एक गहरी साँस ली, जैसे बहुत देर पानी के नीचे रही हो।
"तुम कौन हो?" उसकी आवाज़ फटी थी।
"मैं वीर हूँ। तुम्हारे पिता ने मुझे भेजा है।" मैंने रस्सी खोलनी शुरू की। "मुंशीजी।"
उसकी आँखों में पानी आया। "पापा कहाँ हैं?"
"वो बाहर हैं। तुम्हें ढूँढ रहे हैं।"
रस्सी खुलते ही वो मेरे गले में बाहों को लपेटकर रो पड़ी। उसका शरीर काँप रहा था। मैंने उसे उठाया। वो हल्की थी, बहुत हल्की — जैसे बहुत दिनों से ठीक से खाया नहीं था।
"मीरा," मैंने कहा। "पीछे चल।"
हम बाहर निकले। आँगन में आग और बढ़ गई थी। छत की एक बड़ी लकड़ी गिरी और दरवाज़े का रास्ता रोक गई। धुआँ इतना घना हो गया कि साँस लेना मुश्किल था।
"दरवाज़ा बंद हो रहा है!" मीरा ने कहा।
मैंने पीछे देखा। नंदकिशोर दरवाज़े की तरफ़ बढ़ रहा था, हाथ में लोहे की छड़। उसके आदमी उसके पीछे थे।
और तभी मुझे एक बात समझ आई — वो हमें बाहर नहीं जाने देगा। वो मेरे साथ खेल रहा था। वो चाहता था कि मैं बच्ची तक पहुँचूँ, ताकि मैं उसकी शर्तें सुनूँ।
"वीर!" टिंकू की आवाज़ आई। "भाई, मैंने ताला खोल दिया!"
मैंने देखा — टिंकू बड़े दरवाज़े के पास खड़ा था और उसका पेंच खोल रहा था। उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया।
"बर्फ़ी गिरी थी, पर चाबी नहीं," वो बोला। "ये मेरी दुकान की चाबी है, भाई। हर ताले में लग जाती है।"
मैं हँस पड़ा — इस डर के बीच, इस आग के बीच, मैं हँस पड़ा। यही तो टिंकू था।
नंदकिशोर अपने आदमियों के साथ दरवाज़े की तरफ़ भागा। वो बाहर निकलना चाहता था।
पर तभी — कालू काका।
वो बाहर से आए, दरवाज़े के सामने, हाथ में कुदाल। उनकी सफ़ेद दाढ़ी आग की रोशनी में लाल दिख रही थी। उनके हाथ काँप रहे थे, पर कुदाल की मूठ नहीं काँप रही थी।
"रुक," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, बहुत धीमी। "एक कदम भी और बढ़ा, तो ये कुदाल तेरे पैरों में उतर जाएगी।"
नंदकिशोर रुक गया।
"कालू," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास फिर आई। "तू बूढ़ा हो गया है। ये कुदाल तेरे हाथ में भारी है—"
"भारी नहीं है," कालू काका ने कहा। "बीस साल से मैं इसे उठाता हूँ। इसी कुदाल से अखाड़े की मिट्टी सींची है। और आज—" उन्होंने कुदाल थोड़ी ऊपर उठाई, "—आज ये मेरे बेटे के लिए उठी है।"
नंदकिशोर ने उनकी आँखों में देखा, और उसका चेहरा बदला। वो पहली बार कुछ और लग रहा था। बूढ़ा नहीं, कमज़ोर नहीं — डरा हुआ।
"तू तो वही है," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ में बीस साल की आग थी, "जिसने मेरे चंदन को बोतल पकड़ाई थी। मेरे चंदन को। मेरे बेटे को।"
"कालू—"
"तूने मुझसे कहा था कि चंदन अखाड़े में जीतेगा। तूने कहा था उसका नाम बड़ा होगा।" कालू काका की आवाज़ रुँध गई, फिर सख़्त हो गई। "और मैंने तुझे बीस साल तक देखा, और कुछ नहीं बोला। मैं डर गया था। मैं बूढ़ा था, और मेरा बेटा तेल के गड्ढे में जल रहा था, और मैं चुप रहा।"
उनकी आँखों से पानी बह रहा था, और वो कुदाल को नीचे नहीं कर रहे थे।
"आज मैं नहीं डरूँगा," उन्होंने कहा।
मैंने वो पल देखा और मेरी छाती भर आई। ये वो बूढ़ा आदमी था जो रोज़ सुबह अखाड़े की मिट्टी सींचता था, जो पुरानी तस्वीरें साफ़ करता था, जो कानों में रुई डालकर सोता था। और आज वो अपने बेटे के लिए खड़ा था।
नंदकिशोर ने पीछे देखा। उसके आदमी पीछे हट रहे थे। आग बढ़ रही थी और वो अकेला रह गया था।
उसने कुछ सोचा, फिर मुस्कुराया।
"तुमने मुझे पकड़ लिया," उसने कहा। उसने लोहे की छड़ नीचे रख दी और अपने आप हाथ आगे कर दिए। "पर एक बात सुन लो, वीर।"
"मैं तेरी कुछ नहीं सुनूँगा—"
"जो काग़ज़ तुम्हारी माँ की अलमारी में रखा है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब धीमी थी, बिलकुल साफ़, "वो तुम्हें कल मुकाबले से पहले पढ़ना चाहिए। उसमें लिखा है कि तुम्हारे पिता ने खुद भैरव के पिता को ज़हर दिया था।"
मेरे हाथ रुक गए।
"और तुम्हारी माँ को पता है," उसने कहा। "बीस साल से पता है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा पत्थर जैसा हो गया था।
"बकवास," मैंने कहा। पर मेरी आवाज़ कमज़ोर थी, और मैं जानता था।
"वो काग़ज़ जल नहीं रहा," नंदकिशोर ने कहा, जब मैंने उसकी कलाई बाँधी। "वो अलमारी में है, तुम्हारे ही घर में, और वो सच बोलता है। भवानी सिंह वो नहीं थे जो तुम सोचते हो।"
कालू काका ने कुदाल नीचे रख दी और अपने हाथों से मुँह ढक लिया। उनके कंधे काँप रहे थे।
टिंकू ने पास आकर मेरा कंधा पकड़ा। "भाई, वो झूठ बोल रहा है। तू मत सुन।"
पर मैं सुन रहा था। और वो सबसे ख़तरनाक बात थी।
हमने नंदकिशोर और उसके दो आदमियों को हवेली के बाहर बँधा हुआ छोड़ दिया और आग बुझाने में गाँव वालों की मदद की। पानी की बाल्टियाँ चलीं, और आधे घंटे में लपटें धीमी पड़ गईं। हवेली का पिछला हिस्सा जल गया था, पर आगे का हिस्सा बच गया। मुंशीजी दौड़कर आए और अपनी बेटी को गले लगा लिया। वो रो रहे थे — बिना शर्म के, बिना रुके। उनकी बेटी भी रो रही थी, और वो दोनों एक-दूसरे को पकड़े हुए वहीं बैठ गए।
टिंकू ने अपनी टूटी बर्फ़ी की डिब्बी उठाई और उसमें से एक टुकड़ा मुंशीजी की बेटी को दिया। "ले, मीठा है। डर के बाद मीठा खाना चाहिए।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मेरी माँ को नहीं बताना कि ये बर्फ़ी मैंने आग में ले जाकर गिरा दी।"
मैं हँसा नहीं। मैं उस वक़्त हँस नहीं सकता था। मेरे अंदर नंदकिशोर की बात घूम रही थी, और मैं उसे बाहर नहीं निकाल पा रहा था।
मीरा मेरे पास आई और मेरे हाथ पर हाथ रखा।
"तू क्या सोच रहा है?" उसने पूछा।
"कुछ नहीं।"
"झूठ।" उसकी आवाज़ सख़्त थी पर उसकी उँगलियाँ नरम थीं। "वीर, तू अपनी माँ के बारे में सोच रहा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके बाल धुएँ से काले पड़ गए थे और उसके गाल पर जलन का एक हल्का निशान था। फिर भी वो मेरी तरफ़ देख रही थी — पूरी तरह, बिना झुके।
"मैं सोच रहा हूँ कि मैंने आज उससे चिल्लाकर कितनी बड़ी गलती की," मैंने कहा। "और अब वो कहेगा कि माँ झूठ बोली।"
"नहीं कहेगा," मीरा ने कहा। "मैं कहूँगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"वीर, मैं तुम्हारे साथ हूँ। पर अगर उस अलमारी में वो काग़ज़ है, तो हमें पढ़ना होगा।" उसने मेरी आँखों में देखा। "सच का मतलब यही होता है। उसे चुनना नहीं होता। वो सामने आता है, और तुम्हें देखना पड़ता है।"
मैंने सिर हिलाया। पर मेरे अंदर एक डर बैठ गया था जो पहले नहीं था। मैंने अपने पिता को दो बार खोया था — एक बार जब वो मरे, और एक बार जब मुझे पता चला कि वो मेरे पिता नहीं थे। अब तीसरी बार?
कालू काका हमारे पास आए। उनकी आँखें सूजी हुई थीं और उनके हाथों में अब भी कुदाल थी।
"वीर," उन्होंने कहा। "मैं तुझसे कुछ कहना चाहता हूँ।"
"कहो, काका।"
"मैं बीस साल तक इस हवेली के सामने से गुज़रता रहा।" उनकी आवाज़ धीमी थी। "और मैं कुछ नहीं बोला। तेरे पिता—" उन्होंने रुक कर साँस ली, "—तेरे पिता भवानी को मैं जानता था। वो बुरा आदमी नहीं था।"
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