Spirit of a Fighter – Chapter 848
"रुक।" मीरा ने मोमबत्ती नीचे की। "ये आधा गोल — ये हल्दी है। पुराने चिह्नों में हल्दी ऐसे ही दिखाया जाता है — गोल, आधा छोटा। और ये दो लकीरें — ये काली मिर्च। और ये तिरछी रेखा —" वो रुकी। उसने एक बार गहरी साँस ली। "ये कपूर है।"
"कपूर?" टिंकू ने कहा। "पर भाई, कपूर तो आरती में जलाते हैं।"
"पर ये तीनों," मीरा ने कहा, "ये तीनों मिलकर एक दवा बनाते हैं।" वो उठी, मुझे देखने लगी। उसकी आँखों में कुछ और था — डर नहीं। कुछ ऐसा जैसे रास्ता मिल गया हो। "वीर, मैंने अपनी किताब में पढ़ा था — इन तीनों का मेल, सही मात्रा में, शरीर के अंदर का ज़हर बाहर निकाल देता है। पर अगर मात्रा बिगड़ जाए, तो यही तीनों मिलकर ज़हर बन जाते हैं।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। "यानी…"
"यानी," मीरा ने कहा, "तहखाने की मिट्टी की ताकत और भैरव के ज़हर के बीच का फ़र्क़ यही हो सकता है। वो पानी जो पहलवानों को पिलाया जाता है — वो ज़हर है। पर इस दीवार पर लिखा है — जो शायद उस ज़हर का तोड़ है।"
कालू काका ने एक अजीब-सी आवाज़ निकाली। जैसे कोई रो रहा हो, पर आँसू नहीं आ रहे हों। "कमला देवी," उन्होंने कहा। "वो इसीलिए यहाँ आती थी। वो तोड़ ढूँढ रही थी।" उन्होंने दीवार की तरफ़ देखा। "अपने बेटे के ज़हर का।"
"पर उसे मिला नहीं," मैंने कहा। "या मिला, और वो बता नहीं पाई।"
"या बताया," मीरा ने कहा, "और जिसे बताया, उसने माना नहीं।"
मैं दीवार के सामने खड़ा रह गया। मोमबत्ती की रोशनी में वो निशान अब पहले से बड़ा लग रहा था। जैसे कोई औरत बीस साल पहले यहाँ खड़ी हो, अकेली, अँधेरे में, और अपने बेटे को बचाने का रास्ता दीवार पर लिख रही हो — यह जानते हुए कि कोई इसे पढ़ेगा या नहीं।
मेरे गले में कुछ अटक गया।
"माँ," मैंने धीरे कहा — किसी को नहीं, खुद से। "वो औरत… जिसने मेरे पिता को बेल का पत्ता दिया था… वो यही कमला देवी है?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं। "मुझे भी अब यही लग रहा है, बेटा," उन्होंने कहा। "वो औरत जो भवानी को बेल का पत्ता देकर गई — और वो औरत जो इस दीवार पर निशान बनाती थी — एक ही हो सकती है।"
"पर वो क्यों?" टिंकू ने पूछा। उसकी आवाज़ में अब झुंझलाहट थी, डर नहीं। "वो भैरव की माँ है। भैरव तो हमारा दुश्मन है। तो उसकी माँ हमारी मदद क्यों करेगी?"
कालू काका ने एक लंबी साँस ली। "क्योंकि," उन्होंने कहा, "माँ माँ होती है, बेटे का काम नहीं देखती।" वो उठे, अपनी कमर सीधी करने की कोशिश की, नहीं हुई। "भैरव ने अपने बाप को मारा था। क्या तू सोचता है, उसकी माँ को ये पता नहीं था? उस औरत ने अपने बेटे को बचाने की कोशिश की — शायद इसीलिए नहीं कि वो उसे बचाना चाहती थी, बल्कि इसलिए कि वो जानती थी, एक दिन उसका बेटा खुद अपने ही ज़हर से मरेगा।"
मैंने आँखें बंद कीं। एक पल के लिए मुझे अपनी माँ याद आई — चक्की पर बैठी, कमर में दर्द छुपाए, मुझे देखती हुई। माँएँ ऐसी ही होती हैं। वो सब जानती हैं, पर कहती नहीं। बस करती रहती हैं — चुपचाप, अपने तरीके से।
"मुझे वो औरत ढूँढनी है," मैंने कहा। मैंने आँखें खोलीं। "वो यहाँ थी। वो जानती है तीसरा नाम। और वो जानती है ये दवा।"
"पर उसने कहा," मीरा बोली, "कि तीसरा नाम बताने से कालू काका का बेटा पूरा जल जाएगा।"
"तो वो नाम नहीं बताएगी," मैंने कहा। "पर दवा बता सकती है। और मुझे दवा चाहिए — कल के मुकाबले से पहले।"
टिंकू ने अपनी टोपी खिसकाई। "भाई, एक बात कहूँ? तू कभी-कभी बहुत सीधा-सीधा सोचता है। औरत कह गई — 'मुंशीजी की अलमारी खोलना।' हम यहाँ दीवारें देख रहे हैं, और वो कह रही है अलमारी खोल।"
"टिंकू ठीक कह रहा है," मीरा ने कहा। "हमें ऊपर जाना चाहिए। मुंशीजी की अलमारी।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पर पहले — ये निशान। मुझे इसे कॉपी करना है।"
उसने अपनी जेब से एक छोटी कॉपी निकाली — जिसमें वो हमेशा दवाओं के नुस्खे लिखती थी — और पेंसिल से दीवार पर बने निशान की आकृति उतारने लगी। उसकी पेंसिल काग़ज़ पर चल रही थी — खट, खट, खट — और उसके होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे, जैसे वो पढ़ रही हो।
"हो गया," उसने कहा, कॉपी बंद करके जेब में रखते हुए। "ऊपर चलो।"
हम सीढ़ियों की तरफ़ बढ़े। कालू काका सबसे आगे, मोमबत्ती लिए मीरा, फिर मैं, और सबसे पीछे टिंकू — जो बार-बार पीछे मुड़कर देख रहा था।
"भाई," उसने धीरे कहा, जब हम पाँच-छह सीढ़ियाँ चढ़ चुके थे, "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"वो औरत — कमला देवी — अगर भैरव की माँ है… तो भैरव को ये पता है कि उसकी माँ ज़िंदा है?"
मैं रुक गया। ये बात मेरे दिमाग़ में नहीं आई थी।
"भैरव ने अपने बाप को मारा," मैंने धीरे कहा। "अगर उसकी माँ उसके खिलाफ़ है… तो भैरव उसके बारे में क्या सोचता है? क्या वो जानता है कि उसकी माँ ज़िंदा है? या वो समझता है कि वो भी मर गई?"
"या," मीरा ने बिना पीछे मुड़े कहा, "वो जानता है। और इसीलिए उसने कभी हमें उसका ज़िक्र नहीं किया।"
कालू काका सीढ़ी पर रुक गए। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। मोमबत्ती की रोशनी में उनका चेहरा आधा अंधेरे में था।
"भैरव की माँ," उन्होंने कहा, धीरे से, "जब भैरव ने अपने बाप को मारा, तब वो गाँव में नहीं थी। वो अपने मायके गई थी। जब लौटी, तो उसके पति की अर्थी उठ चुकी थी, और भैरव कह रहा था — 'बुखार से मरे।'" उन्होंने एक लंबी साँस ली। "वो औरत उस दिन के बाद कभी भैरव से ठीक से नहीं बोली। गाँव वाले कहते हैं, वो एक दिन गायब हो गई। कोई कहता था — मर गई। कोई कहता था — तीर्थ पर चली गई। पर मैं जानता हूँ, वो यहीं थी। इसी तहखाने में।"
"तो भैरव को पता है?" मैंने पूछा।
"पता है," कालू काका ने कहा। "पर वो कभी उसका नाम नहीं लेता। मुझे लगता है — डरता है।"
मैंने कुछ कहने की कोशिश की, पर तभी मीरा की मोमबत्ती हवा से काँपी — और हम सब सीढ़ी पर ठिठक गए।
क्योंकि ऊपर से एक आवाज़ आई थी। धीमी। मीठी। जैसे कोई गा रहा हो — बहुत धीरे, बिना शब्दों के।
कालू काका की आँखें फैल गईं।
"ये," उन्होंने फुसफुसाया, "ये वही धुन है। कमला देवी इसी धुन में निशान बनाती थी। बीस साल बाद भी।"
हम सीढ़ियाँ चढ़ते रहे। मोमबत्ती की लौ अब लालटेन से छोटी लग रही थी, और अंधेरा हर कदम पर और मोटा होता जा रहा था।
ऊपर पहुँचकर मैंने दरवाज़े से सिर निकाला। अखाड़े का पिछला हिस्सा — वही जगह जहाँ कुआँ है। पर अब वहाँ कुछ और था। कुएँ के किनारे पर, मिट्टी पर, एक छोटी लालटेन रखी थी — जल रही थी। और उसके पास, मिट्टी पर, ताज़े पैरों के निशान थे। बहुत छोटे। औरत के।
"वो गई नहीं," मैंने कहा। "वो हमारा इंतज़ार कर रही है।"
मैंने कुएँ की तरफ़ देखा। लालटेन की रोशनी में, कुएँ की मिट्टी पर, कुछ और लिखा था। मैंने पढ़ा —
"मुंशीजी की अलमारी खोलने से पहले, एक बात सुन लेना।"
नीचे कोई नाम नहीं था। जगह खाली थी — जैसे लिखने वाले को उस पल कुछ और याद आ गया हो।
"अरे," टिंकू ने कहा, "ये औरत आख़िर चाहती क्या है? सीधा बोल दे न — भाई, तेरे पिता को ये हुआ था, तेरे घर में ये छुपा है।" उसने हाथ हिलाया। "नहीं, वो ऐसा नहीं करेगी। पहेलियाँ। सब पहेलियाँ। मेरी माँ भी ऐसी ही है — एक बात कहती है, फिर कहती है — 'अभी नहीं, बाद में समझेगा।'"
मीरा ने कुएँ की तरफ़ देखा। "वो हमें कुछ बता रही है," वो बोली, "पर पूरा नहीं। शायद डरती है। शायद उसने कोई वादा किया था।"
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