Spirit of a Fighter – Chapter 845
"काका, रुकिए," मैंने कहा।
वो रुके। सब रुके। चार साँसें, चार लोग, एक पत्थर की सीढ़ी पर।
"क्या है?" टिंकू ने फुसफुसाया। उसकी आवाज़ में वो हल्की काँपी थी जो उसे कभी मिठाई की देगची छूते वक़्त भी नहीं आती।
"गंध बदल रही है," मैंने कहा।
दरअसल बदल नहीं रही थी। नई आ रही थी। ऊपर गली में गीली मिट्टी की गंध थी, पुराने बरगद की, मुंशीजी के हाथों की हल्दी की। पर यहाँ, सीढ़ी के मोड़ पर, हवा में कुछ और मिल गया था। पुरानी लकड़ी। बहुत पुरानी, जैसे बरसात में भीगी अलमारी खुले। और उसके नीचे एक पतली, मीठी गंध।
बादाम।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने भी सूंघा और उसकी भौंहें सिकुड़ीं।
"बादाम का तेल," वो बोली। "कोई किसी को मालिश करता है, या बालों में लगाता है। और बहुत ताज़ा है।"
कालू काका ने लालटेन ऊपर उठाई। कुछ नहीं बोले। पर उनकी उँगलियाँ कुदाल पर सफ़ेद हो गईं — यही उनका तरीका था कुछ कहने का।
हम नीचे उतरे। सीढ़ियाँ खत्म हुईं और सामने वो चौड़ा हॉल खुला जो मैंने पहले देखा था — तहखाना। छत ऊँची, चारों तरफ़ मोटी दीवारें, फ़र्श पर वो लाल मिट्टी जो पैरों के नीचे स्पंज की तरह दबती थी। मिट्टी अब भी नम थी। किसी ने उसे हाल में सींचा था।
पर सबसे पहले मेरी नज़र मिट्टी पर पड़ी।
पैरों के निशान।
ताज़े। बहुत ताज़े — निशानों के किनारे की मिट्टी अभी गिर भी नहीं पाई थी। जूते के निशान, बड़े साइज़ के। और उनके साथ एक नन्हा-सा गोल निशान, जैसे किसी ने लाठी टेकी हो।
"कोई पहले से आया है," मीरा ने कहा। उसने भी देख लिया था।
"और गया भी है," टिंकू ने कहा। "क्योंकि आगे के निशान धुंधले हैं।" वो फौरन चुप हो गया, जैसे खुद अपनी बात से डर गया हो।
कालू काका ने लालटेन आगे की। रोशनी हॉल के एक कोने तक गई, और वहाँ मुझे धुआँ दिखा।
बहुत हल्का धुआँ। कोने में कुछ काग़ज़ पड़े थे — आधे जले, कुछ सुलगते, कुछ सिर्फ़ राख। और उस राख के बीच एक छोटा-सा लाल-नारंगी धब्बा अभी भी ज़िंदा था, धीरे-धीरे साँस लेते हुए।
मैं दौड़कर गया। टिंकू ने अपनी धोती का छोर खींचकर उस पर पटका। धुआँ एक झटके में उठा, फिर बैठ गया।
"अभी-अभी जलाया है," टिंकू ने कहा। "आधा घंटा भी नहीं हुआ होगा।"
मीरा झुकी। उसने राख में से एक टुकड़ा उठाया — आधा जला काग़ज़, किनारे भूरे, बीच में स्याही अब भी साफ़। उसने लालटेन के पास लाकर पढ़ा। उसके होंठ हिले, पर शब्द नहीं निकले। फिर उसने मेरी तरफ़ बढ़ाया।
स्याही नीली थी। अक्षर मेरे पिता के जैसे सीधे नहीं, ज़रा टेढ़े — जैसे किसी ने जल्दी में लिखा हो, या किसी ने बैठकर नहीं, खड़े होकर लिखा हो।
"भवानी सिंह…"
फिर नीचे एक लाइन कटी हुई थी। फिर — "…भैरव…"
फिर — "…बोतल…"
और सबसे नीचे, हाशिए पर, बहुत छोटा-सा — तारीख़। तारीख़ भी आधी जली थी। जो बची थी, वो सिर्फ़ इतनी बोलती थी — बीस साल पहले का कोई दिन।
मेरे हाथ काँपे। मैंने काग़ज़ कसकर पकड़ा, जैसे वो उड़ जाएगा।
"काका," मैंने कहा, "यहाँ कौन आता था?"
कालू काका ने लालटेन नीचे रखी और दोनों हाथ कुदाल पर टिका दिए। उनकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। उन्होंने हॉल की दीवारों को देखा, फिर मिट्टी को, फिर मेरी तरफ़।
"बेटा," उन्होंने कहा, आवाज़ बहुत धीमी, "यहाँ तो सिर्फ़ वही आते थे जो मिट्टी से सच बुलाना जानते थे।" उन्होंने कुदाल का सिरा मिट्टी में टिकाया। "और वो सब मरे। या मरवा दिए गए।"
टिंकू ने एक कदम पीछे लिया। मैंने उसका कंधा थाम लिया।
"मिट्टी से सच बुलाना?" मीरा ने पूछा। "काका, साफ़ बोलिए।"
कालू काका ने अपनी कमर सीधी करने की कोशिश की — वो कभी सीधी नहीं होती थी, पर कोशिश में उनकी हड्डियाँ बोलीं। "जो यहाँ आता था," वो बोले, "वो इस मिट्टी पर लेटता था। आँखें बंद करता था। और मिट्टी से पूछता था — 'मेरी ताकत कहाँ गई?'" उन्होंने मिट्टी की तरफ़ देखा। "और मिट्टी जवाब देती थी। कभी पसीने में, कभी साँस में। पर जवाब देती थी।"
मैंने दीवार की तरफ़ देखा।
दीवारें भी बोल रही थीं। मुझे ऐसा लगा जैसे अंधेरे में उन पर कुछ लिखा है जो लालटेन की रोशनी में धुँधला है — जैसे कोई बच्चा स्याही से दीवार पर लिखता है और माँ पोंछ देती है, पर निशान बाकी रह जाता है।
मैं दीवार के पास गया। हाथ फेरा। ठंडी, खुरदरी, गीली। पर उँगलियों के नीचे कुछ उभरा — खुदा हुआ, तराशा हुआ, मिट्टी से भरा, पर साफ़।
मैंने लालटेन मँगाई। कालू काका ने पास कर दी। मैंने रोशनी दीवार पर सीधी की।
तीन नाम थे। बड़े-बड़े अक्षरों में, किसी ने छेनी से खोदे थे।
भवानी सिंह।
रणवीर सिंह।
और तीसरा…
तीसरा नाम जान-बूझकर मिटाया गया था। गहरा गड्ढा खोदकर, पत्थर उखाड़कर, फिर मिट्टी से भरकर। कोई नहीं जानता कितने साल पहले। मेरी उँगली उस जगह पर रुकी, और मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी की ज़ुबान पर हाथ रख रहा हूँ।
"और नीचे," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में कुछ था — मेरी आवाज़ में जो नहीं था। हिम्मत।
मैंने लालटेन नीचे की।
उन बड़े नामों के नीचे, छोटे अक्षरों में, चार और नाम थे। चारों पढ़े जाते थे। चारों मरे हुए पहलवानों के नाम थे — जिनका हिसाब हरनाम की फ़ाइल में था। पर सबसे नीचे, सबसे छोटा, सबसे हल्का खुदा हुआ, एक नाम था जो मेरे पेट में ठंडा पत्थर डाल गया।
चंदन सिंह।
मैंने कालू काका की तरफ़ देखा।
उन्होंने देखा। पढ़ा। और फिर वो हुए जो मैंने उन्हें कभी न होते नहीं देखा।
कुदाल उनके हाथ से छूटी और मिट्टी में धँस गई। लालटेन लड़खड़ाई और गिरने से पहले टिंकू ने पकड़ ली। और कालू काका घुटनों के बल गिर पड़े — दीवार के सामने, बिलकुल उस नाम के नीचे, जैसे कोई मंदिर में माथा टेक रहा हो।
"मेरा बेटा," उन्होंने कहा। आवाज़ फटी हुई थी, जैसे पुरानी रस्सी। उनका एक हाथ दीवार पर, उस नाम पर था, और उँगलियाँ उसे पोंछ रही थीं, ऐसे जैसे कोई चेहरा पोंछता हो। "मेरा बेटा यहाँ आता था।"
उनकी आवाज़ टूट गई। मैंने अपनी साँस रोकी।
"वो भी इस मिट्टी का हिस्सा था," कालू काका ने कहा। "और मैंने कभी उससे नहीं पूछा कि तू यहाँ क्यों आता है, बेटा। मैंने कभी नहीं पूछा।" उन्होंने अपनी छाती पर हाथ रखा। "बीस साल मैंने अपने ही बेटे के बारे में सुक्खी बुआ की बातें सुनीं, गाँव की बातें सुनीं, और एक बार भी उसके मुँह से नहीं सुना।"
टिंकू मिट्टी में अपनी धोती बचाकर उनके पास बैठ गया। उसने उनका कंधा थामा। उसके हाथ में अब भी राख लगी थी, पर उसने पोंछी नहीं। "काका," वो बोला, आवाज़ बहुत धीमी, जैसे मिठाई के बर्तन के पास बात कर रहा हो ताकि कोई जाग न जाए, "आपका बेटा गुनहगार नहीं था। मजबूर था। भैरव ने हर किसी को बोतल पकड़ाई — रणवीर सिंह को भी, चंदन को भी, लुट्टन को भी। मजबूरी में पिया, तो भी पिया। पर उसका दिल साफ़ था, तभी तो अपने बाप के हाथों से नहीं मरा, और उस रात तेल के गड्ढे में गिरकर भी ज़िंदा बचा।"
कालू काका ने अपना सिर उठाया। उनकी आँखें गीली थीं, पर उनमें वो चमक थी जो धोखा नहीं देती — किसी बूढ़े की पहली शराब की चमक नहीं, बल्कि उस आदमी की चमक जो बीस साल बाद पहली बार अपने बेटे को ज़िंदा देख रहा हो। "वो बचा?" उन्होंने पूछा। "वो… वो ज़िंदा है?"
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