Spirit of a Fighter – Chapter 836
मैंने तस्वीर को दोनों हाथों से पकड़ा।
"मैंने तुझे ये इसलिए नहीं दिखाया," रणवीर सिंह ने कहा, "कि मैं तुझे आज से पहले नहीं जानता था। मैं तुझे उस दिन से पहचानता हूँ, जिस दिन तूने इन आँखों से उस पहलवान को हराया था जो तेरे पिता का शागिर्द था। तेरे पिता की तरह तू भी चुपचाप आता था। तेरे पिता की तरह तेरी आँखें थीं।"
वो रुके। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"पर मैंने कभी नहीं कहा, क्योंकि मैं जानता था — जिस दिन तुझे पता चलेगा, उस दिन तू मेरा बेटा भी होगा और तेरे पिता का भी। और तू मुझसे कहेगा — तूने इतनी देर क्यों की।"
मैंने तस्वीर को सीने से लगा लिया।
"भवानी सिंह," मैंने धीरे से दोहराया। नाम ज़ुबान पर नया था, पर लगा जैसे बचपन से जानता हूँ।
"तेरे पिता," रणवीर सिंह ने कहा। "और मेरे साथी। महेंद्र ने उन्हें इसलिए नहीं मारा कि वो उसके रास्ते में थे। उसने उन्हें इसलिए मारा कि वो मेरे रास्ते में थे।"
तस्वीर में भवानी सिंह मुस्कुरा रहे थे। एक तरफ़ उनका हाथ मेरे कंधे पर था — या शायद रणवीर सिंह के। फ़र्क़ करना मुश्किल था।
मैंने तस्वीर उठाई और माँ की तरफ़ बढ़ाया।
माँ ने देखा। उनके होंठ काँपे। उन्होंने तस्वीर पर उँगली रखी — भवानी सिंह के चेहरे पर।
"तूने ये संभालकर रखी," उन्होंने रणवीर सिंह से कहा। आवाज़ में इल्ज़ाम नहीं था। सिर्फ़ थकान।
"बीस साल," रणवीर सिंह ने कहा। "हर रात इस तस्वीर के नीचे सोया।"
माँ ने तस्वीर मुझे लौटाई।
"अब तेरे पास दो पापा हैं," उन्होंने कहा। "एक जिसने तुझे जन्म दिया और एक जिसने तुझे पहचाना। दोनों ने तुझे प्यार दिया।"
टिंकू ने पीछे से आवाज़ दी। "और एक जो तुझे खीर खिलाता है। तीन हो गए।"
मैदान में पहली बार हँसी फूटी।
पर मैं हँस नहीं पाया। मेरे हाथ में तस्वीर थी, और तस्वीर में एक आदमी था जिसने मुझे कभी नहीं देखा, पर जिसकी आँखें मेरे चेहरे पर थीं।
मीरा मेरे पास आई। उसने तस्वीर देखी, फिर मुझे।
"तुम्हारे पापा कितने सुंदर थे," उसने कहा।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "मैंने उन्हें कभी देखा नहीं।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं — जैसे वो बाहर से अभी आई हो। पर उसकी पकड़ मज़बूत थी।
"अब देख लिया," उसने कहा। "और कल मैदान में, जब तुम जीतोगे, तो पूरा गाँव देखेगा — भवानी सिंह का बेटा।"
मेरी आँखें भर आईं।
"मीरा," मैंने कहा। आवाज़ धीमी थी। "कल अगर मैं हार गया…"
"तो क्या?" उसने मेरी बात काटी। "तो क्या तुम कम वीर सिंह हो जाओगे? तो क्या तुम्हारी माँ तुम्हारी माँ नहीं रहेगी?"
मैं चुप हो गया।
"मेरे पापा हार गए थे," मीरा ने कहा। "बीस साल पहले। इस व्हीलचेयर में। पर आज वो खड़े हुए। तुम्हारे लिए। इसलिए कल के बारे में मत सोचो। कल जो होगा, वो कल देखेंगे।"
उसने मेरा हाथ छोड़ा, और जाते-जाते रुकी।
"और वीर," उसने कहा, बिना पलटे, "आज तुमने जो किया — अपनी माँ के लिए, अपने पापा के लिए — वो जीत से कम नहीं है।"
वो चली गई।
मैं वहीं खड़ा रहा। तस्वीर हाथ में।
माँ मेरे पास आईं और उन्होंने मेरे हाथ से तस्वीर ले ली, उसे अपनी साड़ी के पल्लू में लपेटकर रख लिया।
"अब घर चल," उन्होंने कहा। "कल की लड़ाई के लिए आज सोना ज़रूरी है।"
"माँ," मैंने कहा। "आपने कभी नहीं बताया। भवानी सिंह के बारे में।"
माँ रुकीं। उन्होंने आसमान की तरफ़ देखा। शाम हो रही थी और आसमान में पहला तारा निकल रहा था।
"मैंने तुझे बहुत कुछ नहीं बताया," उन्होंने कहा। "क्योंकि जो बताती, वो तुझे रास्ते से भटका देता। तेरे पापा चाहते थे कि तू अपने दम पर खड़ा हो। बिना किसी के नाम के सहारे।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"और आज तू खड़ा है। अपने दम पर।"
मैंने उनके पैर छुए। वो हँसीं, और मेरे सिर पर हाथ रखा।
घर लौटते वक़्त रास्ते में कोई कुछ नहीं बोला। टिंकू मेरे साथ-साथ चल रहा था, उसका मिठाई का डिब्बा अब खाली था, और वो उसे बजा-बजाकर चल रहा था। कालू काका पीछे थे, उनकी लाठी की आवाज़ दूर से आ रही थी। मीरा अपने पापा के साथ थी — रणवीर सिंह अब फिर व्हीलचेयर पर थे, पर उनका चेहरा बदला हुआ था। जैसे किसी ने उनके अंदर का पुराना पत्थर हटा दिया हो।
आँगन में पहुँचकर मैंने चूल्हे की तरफ़ देखा।
माँ ने आधी जली रोटी फेंक दी थी। अब वहाँ ताज़ी रोटी की खुशबू आ रही थी।
मैं बैठ गया। माँ ने मेरे आगे थाली रखी। दाल, रोटी, और एक छोटा कटोरा — उसमें खीर।
"ये?" मैंने कहा।
"टिंकू लाया था," माँ ने कहा, और उनकी आँखों में हँसी थी। "कह रहा था — आज भाई को मीठी खीर चाहिए। मिर्च वाली नहीं।"
मैं हँसा। और फिर मैंने खीर खाई, धीरे-धीरे, एक-एक चम्मच।
खाते वक़्त मैंने सोचा — कल मैदान में क्या होगा। ठाकुर ने कहा था — माँ सबसे आगे बैठेगी। मैंने सोचा, अगर एक पल के लिए भी मेरी नज़र माँ से हटी, तो क्या होगा। मैंने सोचा, अगर मैं हारा, तो क्या होगा।
फिर मैंने खीर का आख़िरी चम्मच मुँह में डाला, और सोचना बंद कर दिया।
माँ ने मेरे पास आकर बैठकर कहा, "आज तूने जो मेरे लिए किया…"
"माँ," मैंने कहा। "आपने मेरे लिए बीस साल किया। आज बस एक दिन है।"
माँ ने मेरा सिर अपने कंधे पर रख लिया। उनके बालों से हल्दी की गंध आ रही थी। वही गंध जो पीली शीशी में थी। वही गंध जो मेरे बचपन में थी।
और तभी बाहर आँगन में किसी के चलने की आवाज़ आई।
मैं उठा। दरवाज़े पर टिंकू खड़ा था, उसके पीछे गुड़िया। गुड़िया के हाथ में एक छोटी थैली थी।
"भैया," गुड़िया ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुरानी ज़िद थी। "ये तेरे लिए।"
मैंने थैली खोली। उसमें अखाड़े की लाल मिट्टी थी।
"आज सुबह लाई थी," गुड़िया ने कहा। "जब तू झोपड़ी गया था।"
मैंने मिट्टी को उँगलियों में लिया। वो मुलायम थी, ठंडी थी, और उसमें वो गंध थी जो सिर्फ़ अखाड़े की मिट्टी में होती है — पसीना, हल्दी, और बारिश।
"कल इसे माथे पर लगाना," गुड़िया ने कहा। "फिर तू नहीं हारेगा।"
मैंने गुड़िया की चोटी खींची।
"तू तो बड़ी डायन है," मैंने कहा। "मुझे तो तेरी चिंता हो रही है।"
गुड़िया हँसी।
पर तभी टिंकू ने, जो अभी तक चुप था, धीरे से कहा — "भाई।"
उसकी आवाज़ में वो मज़ाक नहीं था।
"क्या?"
"मैंने जब आज मिठाई में मिर्च डाली," टिंकू ने कहा, "तो मैंने अपनी माँ की दुकान से एक चीज़ उठाई थी। एक डिब्बी। जिस पर लिखा था — 'सिर्फ़ राख होगी'।"
मेरी रीढ़ में झुरझुरी दौड़ी।
"वो डिब्बी कहाँ है?"
"मैंने उसे खोला नहीं," टिंकू ने कहा। "पर उस पर ठाकुर की मुहर थी। और अंदर से एक आवाज़ आ रही थी। जैसे किसी चीज़ के जलने की।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
और बाहर, गाँव के बाज़ार की तरफ़ से, एक लंबी सीटी बजी। वो सीटी ठाकुर के आदमियों की थी। वो सीटी मैंने आज पहली बार सुनी थी — और मैं जानता था, ये आख़िरी बार नहीं थी।
मैंने थैली से मिट्टी निकाली और अपने माथे पर लगाई।
"कल," मैंने कहा। "कल सब पता चलेगा।"
पर मेरे अंदर एक आवाज़ थी जो कह रही थी — कल नहीं। आज। आज रात।
क्योंकि ठाकुर ने जो डिब्बी छोड़ी थी, वो बिना वजह नहीं छोड़ी थी।
वो एक चीज़ जलाने वाला था।
और मुझे पता था — वो चीज़ क्या है।
अखाड़ा।
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