Spirit of a Fighter792 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 792

7 min read November 5, 2026

मैंने झुककर उसे उठाया।

चश्मा। आधा टूटा हुआ। एक काँच निकल गया था, और दूसरा टूटा हुआ था। फ्रेम सोने के रंग का, हल्का।

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

"ये…" मैंने कहा, और आवाज़ मेरी अपनी नहीं लगी।

"हरनाम का," मीरा ने कहा। उसने वो चश्मा मेरे हाथ से लिया और लालटेन की रोशनी में देखा। "हरनाम ठीक यही चश्मा पहनता था। मैंने उसे अखाड़े के दफ़्तर में हिसाब की कॉपी देखते हुए बहुत बार देखा है।"

"पर हरनाम तो मर चुका है," जग्गा ने कहा। "उसकी लाश तो मिल गई थी। मुँह से झाग, मुट्ठी में चाबी।"

"हाँ," मीरा ने कहा। "तो उसका चश्मा यहाँ क्यों है? कुएँ की सीढ़ियों पर? अगर वो मर चुका है, तो उसका चश्मा यहाँ आने के लिए अपने आप नहीं चला।"

चुप्पी। कुएँ की सीढ़ियों पर चुप्पी ऐसी लगती है जैसे कोई ऊपर से पत्थर गिराए और नीचे से आवाज़ न आए।

"ठाकुर," मैंने धीरे से कहा। और फिर मुझे एहसास हुआ जैसे कोई मेरे सिर में लालटेन जला रहा हो। "ठाकुर हरनाम की लाश को इधर-उधर कर रहा है। सबूत मिटाने के लिए। वो चश्मा उसकी लाश के पास से आया। मतलब वो लाश यहाँ थी। और फिर वो किसी और जगह ले जाई गई।"

"पर क्यों?" जग्गा ने कहा। "लाश आख़िर लाश है। कोई लाश को इधर-उधर क्यों करता है?"

"क्योंकि," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो सिर्फ़ तब आती है जब कोई सच को बहुत पास से देख रहा हो, "लाश का एक ही डर होता है — कि उसे देखकर कोई सवाल पूछे। और हरनाम की लाश से सवाल पूछा जाना ठाकुर के लिए ख़तरनाक है। उसकी मुट्ठी में चाबी थी। उसके मुँह में झाग था। उसने भैरव के साथ काम किया था। वो ठाकुर के बारे में बहुत कुछ जानता होगा।"

"तो ठाकुर उसकी लाश को छिपा रहा है," मैंने कहा, "ताकि कोई उसे देख न सके। और वो इसीलिए उसे यहाँ लाया — क्योंकि यहाँ कोई नहीं आता। कुआँ बंद है। सीढ़ियाँ टूटी हैं।"

"पर वो लाश नहीं है," जग्गा ने कहा। और उसने उस खून की तरफ़ इशारा किया जो नीचे जा रहा था। "ये खून ताज़ा है। कोई अभी घायल हुआ है। लाश खून नहीं बहाती।"

मैं एक पल के लिए वहीं खड़ा रह गया। जग्गा ठीक कह रहा था। ये खून ताज़ा था। उसकी गंध में वो गरमी थी जो मरे हुए खून में नहीं होती। किसी का शरीर अभी भी खुला था।

"तो कोई ज़िंदा है," मैंने कहा। "और वो घायल है। और वो नीचे है।"

"रामदीन," मीरा ने धीरे से कहा।

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"एक ही आदमी है जो इस कुएँ के अंदर ज़िंदा रह सकता है," मीरा ने कहा। "बीस साल से। और अगर उसने माँ की बात मानकर ऊपर आने से मना किया हो, तो वो अब भी नीचे होगा।"

और तभी कालू काका ने एक आवाज़ निकाली। वो आवाज़ किसी शब्द की नहीं थी, बस एक फँसी हुई साँस थी।

उनका चेहरा लालटेन के पीछे अंधेरे में था, पर उनका हाथ काँप रहा था — इतना कि लालटेन हिलने लगी और पूरे कुएँ की दीवारों पर परछाइयाँ नाचने लगीं।

"वीर," उन्होंने कहा। "वीर, रुक।"

"क्या हुआ, काका?"

"कल रात," उन्होंने कहा, और आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे पास जाना पड़ा। "कल रात मैंने दो आदमियों को देखा था। अखाड़े के पीछे। मैं मिट्टी सींचने के बाद सोने जा रहा था — वो पुरानी कोठरी में, जहाँ मैं सोता हूँ। मैंने सुना कि बाहर कोई बोल रहा है। मैंने दरवाज़े की दरार से देखा।"

वो रुके। उन्होंने गला साफ़ किया, पर आवाज़ फिर भी फँसी रही।

"दो आदमी थे। ठाकुर की वर्दी में। और वो एक बोरी उठाकर ले जा रहे थे। लंबी बोरी। और उसमें से…" उनकी आवाज़ टूट गई। "उसमें से आवाज़ आ रही थी। हल्की। धीमी। मैंने सुना — 'पानी… पानी…'"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

"और मैं," कालू काका ने कहा, और अपने हाथ से मुँह ढक लिया, "मैं चुप रहा। मैंने दरवाज़ा बंद किया। मैं सो गया। मैं — मैं फिर भाग गया, वीर। फिर।"

वो बैठ गए। सीढ़ी पर। उनके हाथ में लालटेन झूलने लगी और मुझे उसे पकड़ना पड़ा।

"काका," मैंने कहा। मैं उनके सामने झुका। "तुमने बताया। यही काफ़ी है।"

"काफ़ी नहीं है," उन्होंने कहा। उनकी आँखों से पानी आ रहा था और वो उसे पोंछने की कोशिश भी नहीं कर रहे थे। "मैंने बीस साल पहले भी यही किया था। मैंने तुम्हारे पापा को मरते देखा और भाग गया। अब फिर। मैं बूढ़ा हूँ, वीर, पर डर मुझमें जवान है।"

"तो ये बार हम कर लें," जग्गा ने कहा। उसकी आवाज़ नरम थी, और मुझे याद आया कि उसने भी अपनी माँ को खोया था। "तीनों मिलकर।"

कालू काका ने जग्गा की तरफ़ देखा। फिर उन्होंने आँखें पोंछीं और सीधे खड़े हो गए।

"हाँ," उन्होंने कहा। "चलो।"

हम नीचे उतरते रहे। सीढ़ियाँ अब भी जारी थीं — और नीचे गहरा अंधेरा। मेरी नाक में गंधें मिल रही थीं — खून, नीम का तेल, तंबाकू, जली चप्पल। पर अब एक और गंध आ गई थी। बहुत हल्की। गीली मिट्टी की। और उसमें कुछ ऐसा जो मैंने तहखाने में सूँघा था।

"रुको," मैंने कहा। "यहाँ से तहखाने की गंध आ रही है।"

"मतलब सीढ़ियाँ तहखाने तक जाती हैं," मीरा ने कहा।

"नहीं जातीं," कालू काका ने कहा। "तहखाने का रास्ता बंद कर दिया गया था। ईंटों से। भैरव ने करवाया था, बीस साल पहले।"

"तो फिर गंध कहाँ से आ रही है?" मैंने कहा।

हम और नीचे गए। और फिर सीढ़ियाँ ख़त्म हो गईं। एक छोटा-सा पत्थर का चबूतरा था, और उसके आगे एक दरवाज़ा — लकड़ी का, जिस पर काई और उल्टी लिखी बातें खुदी थीं। दरवाज़े के नीचे से हल्की रोशनी नहीं आ रही थी, पर नीचे से हवा आ रही थी। और हवा के साथ वो आवाज़।

"पानी… पानी…"

धीमी। काँपती। किसी ऐसे गले से जो बहुत देर से बोला हो।

मैंने दरवाज़े को धक्का दिया। वो नहीं खुला। मैंने फिर धक्का दिया। जग्गा मेरे साथ आया।

"एक साथ," मैंने कहा।

हम दोनों ने कंधा लगाया। लकड़ी चरमराई, और फिर दरवाज़ा अंदर की तरफ़ खुल गया — पूरा नहीं, बस एक हाथ जितना। और उसी हाथ जितने में मुझे वो दिखा।

एक आदमी। दीवार से पीठ टिकाए बैठा। उसके कपड़े फटे हुए थे। उसकी एक टाँग अजीब कोण पर मुड़ी हुई थी, जैसे टूट गई हो। उसके बाल सफ़ेद और बिखरे हुए थे, और उसके चेहरे पर खून सूख रहा था। पर उसकी आँखें — वो खुली थीं। और वो मेरी तरफ़ देख रही थीं।

"रामदीन?" मैंने कहा।

उसके होंठ हिले। "वीर…" उसने कहा। "तू आ गया। मैंने कहा था ना… मैं तेरा इंतज़ार कर रहा था।"

मैं दरवाज़े से अंदर घुसा। मेरे पैरों के नीचे कुछ कुचला — काँच। टूटा हुआ काँच। मैंने नीचे देखा। और वहीं पत्थर के फ़र्श पर दो और चीज़ें पड़ी थीं — एक लोहे की मोर वाली लालटेन, पीली, जिसमें तेल अब भी था। और उसके पास एक काग़ज़ का टुकड़ा, जो खून से सना हुआ था।

"ये किसका खून है?" मीरा ने कहा। वो मेरे पीछे पहुँच चुकी थी।

रामदीन ने अपनी कमज़ोर आवाज़ में कहा, "मेरा नहीं।"

"तो किसका?"

रामदीन ने अपना हाथ उठाया — बहुत धीरे, जैसे बहुत भारी हो। और उसने उस लालटेन की तरफ़ इशारा किया।

"वो आया था," उसने कहा। "लालटेन लेकर। ठाकुर का आदमी। वो मुझे उठाकर ले जा रहा था। बोरी में डालकर।" उसने एक लंबी साँस ली, और उस साँस में खाँसी की आवाज़ थी। "फिर ऊपर से कोई और आया।"

"कौन?" मैंने कहा।

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