Spirit of a Fighter – Chapter 784
"वो तुझसे मिलना चाहती है," मैंने कहा। "पर वो कुछ बताना चाहती है। और मैं चाहता हूँ कि तू उसकी बात सुन ले।"
जग्गा ने एक गहरी साँस ली। फिर वो अंदर गया।
मैं बाहर खड़ा रहा। मीरा मेरे पास आई और उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसका हाथ ठंडा था, पर उसकी पकड़ मज़बूत थी।
"वो ठीक है?" उसने पूछा।
"वो बूढ़ी है," मैंने कहा। "पर उसकी आवाज़ में दम है।"
अंदर से जग्गा की आवाज़ आई — "माँ?"
और फिर एक चीख। फिर दौड़ने की आवाज़। फिर वो आवाज़ जो सबको तोड़ देती है — एक बूढ़ी औरत का रोना जो अपने बेटे को गले लगा रही हो।
मैंने दरवाज़े से झाँका। जग्गा घुटनों के बल बैठा था और बूढ़ी औरत उसका सिर सहला रही थी। उसके हाथ में टूटा खिलौना था, और वो उसे जग्गा के सिर पर रख रही थी।
"मैंने तेरे लिए तीस साल इंतज़ार किया," वो बोली। "हर रोज़, जब ठाकुर का आदमी खाना देता, मैं सोचती — काश ये खाना मेरे जग्गा को मिलता। हर रात, जब अंधेरा आता, मैं तेरा नाम लेती। और आज तू आ गया।"
जग्गा ने उसके हाथ पकड़े और उसकी उँगलियों को अपने माथे पर रखा।
"माँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ बच्चे जैसी हो गई थी। "मुझे तेरी गंध याद है। तू रोज़ हल्दी वाली रोटी बनाती थी।"
"तुझे याद है?" वो बोली, और उसकी आवाज़ में हैरानी थी।
"हाँ," उसने कहा। "और मुझे याद है कि तू मुझे रात में उठाकर पानी पिलाती थी, क्योंकि मुझे बुखार आता था।"
बूढ़ी औरत ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया और उसे देखा।
"तू मेरा जग्गा है," वो बोली। "तू मेरा बेटा है। तेरी आँखें वैसी ही हैं जैसी तेरे बाप की थीं।"
जग्गा ने उसकी तरफ़ देखा।
"मेरे बाप?" उसने पूछा।
बूढ़ी औरत रुकी। फिर उसने कहा, "तेरा बाप ज़िंदा है। वो बाहर खड़ा है। वो तीस साल से तुझे ढूँढ रहा है।"
जग्गा ने पलटकर दरवाज़े की तरफ़ देखा, और उसकी आँखें शमशेर सिंह पर पड़ीं।
शमशेर सिंह अंदर आए। उनके पैर काँप रहे थे, और उनकी आँखों में पानी था।
"जग्गा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट रही थी। "मैं तेरा बाप हूँ।"
जग्गा उठा। उसने शमशेर सिंह की तरफ़ देखा, और उसका चेहरा ऐसा था जैसे वो किसी और दुनिया में हो।
"तू ज़िंदा है?" जग्गा ने कहा। "तू तीस साल से ज़िंदा है और मुझे नहीं बताया?"
"मैं डरता था," शमशेर सिंह ने कहा। "मैं डरता था कि अगर मैं तेरे पास आया, तो ठाकुर को पता चल जाएगा और वो तुझे मार देगा।"
जग्गा कुछ नहीं बोला। वो बस खड़ा रहा, और उसके हाथ काँप रहे थे।
फिर वो बूढ़ी औरत की तरफ़ मुड़ा।
"तू मेरी माँ है?" उसने पूछा।
और बूढ़ी औरत रोई। उसने अपना हाथ जग्गा के सिर पर रखा।
"नहीं, बेटा," वो बोली। "मैं तेरी मौसी हूँ। तेरी माँ की बहन।"
जग्गा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"तो मेरी माँ कहाँ है?" उसने पूछा, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो किसी भी बच्चे के होता है।
मौसी ने उसका हाथ पकड़ा।
"तेरी माँ ने मुझे बचाया," वो बोली। "जब ठाकुर के आदमी आए, तो तेरी माँ ने मुझे अलमारी में छिपा दिया। और खुद उनके सामने आ गई। उसने कहा कि वो जग्गा की माँ है, और मैं कोई नहीं हूँ।"
जग्गा ने उसकी तरफ़ देखा।
"तो वो कहाँ है?" उसने फिर पूछा।
मौसी ने आँखें बंद कर लीं।
"मुझे नहीं पता," वो बोली। "ठाकुर के आदमी उसे ले गए थे। उसके बाद मैंने उसे नहीं देखा। पर एक बात मुझे याद है — उसने जाते वक़्त कहा था, 'मेरा बेटा ज़िंदा रहेगा, और एक दिन वो मेरा बदला लेगा।'"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसकी आँखें भर आई थीं, और उसने मेरा हाथ और मज़बूती से पकड़ लिया।
टिंकू अंदर आया, और उसके हाथ में मिठाई की डिब्बी थी। वो बूढ़ी औरत के पास गया और उसने डिब्बी उसके हाथ में रख दी।
"ये मेरे हाथ की मिठाई है," उसने कहा। "जग्गा के दोस्त की तरफ़ से।"
मौसी ने उसकी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में पहली बार कुछ और आया।
"तू कौन है?" उसने पूछा।
"मैं टिंकू हूँ," उसने कहा। "मैं मिठाई बनाता हूँ।"
मौसी मुस्कुराई। उसकी मुस्कान ऐसी थी जैसे किसी पुरानी दीवार पर फूल उग आया हो।
"मुझे मिठाई बहुत पसंद थी," वो बोली। "पर तीस साल से मैंने मिठाई खाई नहीं।"
टिंकू ने डिब्बी खोली और उसके हाथ में एक लड्डू रख दिया।
"अब खा लीजिए," उसने कहा। "अब किसी को कुछ कहने का हक़ नहीं है।"
मौसी ने लड्डू खाया, और उसकी आँखों से पानी बह रहा था, पर वो मुस्कुरा रही थी।
मैं बाहर आया। मुझे हवा चाहिए थी। मेरा सीना भारी हो रहा था, और मेरी आँखें जल रही थीं।
मीरा मेरे पीछे आई। उसने कुछ नहीं कहा, बस मेरे पास खड़ी हो गई।
"मुझे अपनी माँ याद आ गई," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।
"तुम्हारी माँ सुरक्षित है," उसने कहा। "और अब ये माँ भी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो नरमी थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी। और मैंने सोचा — अगर माँ यहाँ होती, तो वो यही कहती।
फिर जग्गा बाहर आया। उसकी आँखें सूजी हुई थीं, और उसके हाथ में टूटा खिलौना था।
"वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ ठंडी थी। "कल मुकाबला है।"
"हाँ," मैंने कहा।
"मैं लड़ूँगा," उसने कहा। "पर अपने लिए नहीं।"
वो रुका। उसने खिलौने को देखा।
"मेरी माँ के लिए," उसने कहा। "और उस सच के लिए जो तीस साल से दबा हुआ है।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा।
"तो लड़," मैंने कहा। "और मैं तेरे साथ हूँ।"
वो मुस्कुराया, पहली बार। और उसकी मुस्कान में वो सब था जो टूटकर भी जुड़ रहा था।
हम बंगले से बाहर निकले। गली अंधेरी थी, और हवा में नमी थी। मैंने नाक उठाई — और मुझे कुछ अजीब लगा। पसीना, लोहा, और गीली मिट्टी।
मैं रुका। मैंने मीरा का हाथ पकड़ा।
"रुक," मैंने कहा।
"क्या हुआ?"
"कुछ है," मैंने कहा। "बहुत कुछ है।"
और तभी गली के मोड़ से एक आवाज़ आई।
"तुमने मेरा सबसे कीमती खिलौना तोड़ दिया।"
मैंने पलटकर देखा। ठाकुर वहाँ खड़ा था, और उसके हाथ में लोहे की छड़ थी। उसके चेहरे पर वो ठंडी मुस्कान थी जो मैंने पहले भी देखी थी, पर इस बार उसकी आँखों में कुछ और था — पागलपन।
"अब मुकाबला नहीं होगा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो कुएँ से आती है। "आज रात यहीं खत्म होगा।"
और उसके पीछे अंधेरे से दस आदमी निकल आए। उनके हाथों में लाठियाँ थीं, और उनके चेहरे पर कपड़े बँधे थे।
मैंने जग्गा की तरफ़ देखा। उसने खिलौना अपनी जेब में रखा और अपनी मुट्ठी भींच ली।
"दस हैं," जग्गा ने कहा।
"ग्यारह," मैंने कहा, और मैंने ठाकुर की तरफ़ देखा। "पर एक छड़ी वाला है, और वो बूढ़ा है।"
मीरा ने अपनी थैली खोली और उसमें से एक छोटी-सी पुड़िया निकाली।
"काली मिर्च और तुलसी का पाउडर," उसने कहा। "आँखों में जाएगा तो जलन होगी।"
"तू पीछे रह," मैंने कहा।
"मैं पीछे नहीं रहूँगी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो अब मुझे अच्छी लगती थी। "तूने मुझे सिखाया है कि साथ का मतलब साथ होता है।"
मैं मुस्कुराया, और मैंने अपनी मुट्ठी भींच ली।
ठाकुर ने अपनी छड़ी उठाई।
"आख़िरी बार पूछता हूँ," उसने कहा। "कल का मुकाबला छोड़ दे, और मैं तुम सबको जाने दूँगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"और अगर नहीं?" मैंने पूछा।
"तो कल का मुकाबला किसी और के साथ होगा," उसने कहा। "क्योंकि तुम आज रात यहाँ से ज़िंदा नहीं जाओगे।"
मैंने जग्गा की तरफ़ देखा। जग्गा ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर हम दोनों एक साथ आगे बढ़े।
"जो भी होगा," मैंने कहा, "साथ में।"
और पहली लाठी मेरे सिर की तरफ़ आई।
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