Spirit of a Fighter – Chapter 777
तालियाँ बजीं। कुछ पहलवानों ने "जग्गा सिंह की जय" भी बोला। पर मैंने देखा — जो पुराने पहलवान थे, जिनकी मूँछों में सफ़ेदी थी, वो ताली नहीं बजा रहे थे। वो चुप खड़े थे, और उनकी आँखें मंच पर नहीं, ज़मीन पर थीं।
जग्गा आगे आया। उसने माइक पकड़ा, और एक पल के लिए उसकी नज़र भीड़ पर पड़ी। फिर उसने कहा, "मैं इस मिट्टी का बेटा हूँ। जो मुझे यहाँ तक लाया, वो मेरे बाप हैं।"
उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मेरे भीतर ठहर गया। "मेरे बाप" — उसने ये शब्द ठाकुर के लिए कहे। पर उसकी आँखों में एक पल के लिए कुछ और चमका, और मुझे लगा जैसे उसने ये शब्द किसी और के लिए कहे जो वहाँ नहीं था।
अब रणवीर सिंह की बारी थी।
मैंने सोचा था कि उन्हें माइक तक जाने में मदद चाहिए होगी। पर वो खुद व्हीलचेयर को आगे बढ़ाकर मंच के किनारे तक आए। उन्होंने माइक उठाया, और उनकी आवाज़ में वो गरज थी जो मैंने पहली बार सुनी — जैसे कोई पुराना शेर अपनी गुफा से निकलकर दहाड़ रहा हो।
"मैं आज वीर सिंह को अपना उत्तराधिकारी बनाता हूँ।"
मैदान में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि मुझे अपनी साँस सुनाई दी।
"ये वो लड़का है," रणवीर सिंह ने कहा, "जिसने बिना किसी पानी के, सिर्फ़ मिट्टी और मेहनत से इस अखाड़े को ज़िंदा किया। जिसने वो सच बोला जो बीस साल से इस मिट्टी में दबा था। और मैं ये भी कहूँगा — मैंने बीस साल एक चीज़ के लिए चुप्पी साधी। आज वो चुप्पी टूट गई।"
भीड़ में कुछ पुराने पहलवान रोने लगे। एक बूढ़ा, जिसकी पीठ झुकी हुई थी और जिसके हाथ में लाठी थी, उसने अपना गमछा आँखों पर रख लिया। मैंने उसे पहचाना नहीं, पर मुझे लगा वो उनमें से कोई है जिसका बेटा इसी अखाड़े से लौटा ही नहीं।
मैं मंच पर गया। रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं, पर उनके होंठ मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा, और उनकी पकड़ में वो ताकत थी जो साठ साल की उम्र में भी बची हुई थी।
"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा, सिर्फ़ मेरे लिए, "तेरे पापा आज यहाँ होते तो क्या कहते, पता है?"
मेरा गला भर आया। मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ उनका हाथ कसकर पकड़ा।
पर तभी ठाकुर हँसे। वो हँसे, और उनकी हँसी माइक में गूँजी, और वो गूँज मेरे कानों में चुभी।
"रणवीर," उन्होंने कहा, "तुम्हारा उत्तराधिकारी तो मुकाबले में ही नहीं है। उसका नाम काग़ज़ से कट गया है। भारत केसरी की सूची में वीर सिंह का नाम नहीं है। और जो नाम नहीं है, वो उत्तराधिकारी कैसे होगा?"
मैदान में हलचल मच गई। किसी ने कहा "क्या?", किसी ने "नाम कट गया?" और भीड़ का वो शोर मेरे सिर पर पत्थर की तरह गिरा।
मैंने ठाकुर की तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो मुस्कान थी जो लोग तब दिखाते हैं जब उन्हें लगता है कि उन्होंने मात दे दी।
और तभी मीरा मंच पर चढ़ी।
वो सीढ़ियाँ चढ़ी, और उसकी कुर्ता-सलवार की आवाज़ माइक में आई। उसने ठाकुर से माइक माँगा — माँगा नहीं, छीन लिया। उसकी आँखों में वो आग थी जो मैंने पहली बार अदालत में देखी थी।
"नाम कटा नहीं है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई काँप नहीं थी। "काग़ज़ झूठा है।"
ठाकुर ने हाथ उठाया। "बेटी, सबूत?"
मीरा ने अपना बैग खोला। उसमें से काग़ज़ निकाले — तीन पन्ने। उसने उन्हें माइक के सामने खोला और भीड़ की तरफ़ घुमाया।
"ये वो काग़ज़ है," उसने कहा, "जिस पर वीर सिंह का नाम काटा गया है। इस पर अंगूठे का निशान है, और उसके नीचे तारीख़ है — पर तारीख़ की स्याही ताज़ी है। दो दिन पुरानी।"
मैदान में सन्नाटा फिर लौटा, पर इस बार वो अलग था। इस बार वो सन्नाटा ठाकुर के खिलाफ़ था।
"मुंशी जी यहाँ हैं?" मीरा ने पूछा।
भीड़ में से एक दुबला आदमी आगे आया — चश्मा, हाथ में फ़ाइल। मुंशी जी। उसने मंच पर चढ़ते हुए अपनी फ़ाइल ऊपर उठाई।
"मैंने ये काग़ज़ नहीं बनाया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी। "मुझे रिश्वत दी गई थी। लंगड़े आदमी ने दी थी। पर मैंने अपनी कॉपी में सच लिखा है। और सच ये है कि वीर सिंह का नाम कभी कटा ही नहीं।"
ठाकुर का चेहरा बदला। वो एक कदम पीछे हटे, और उनकी माला के मोती एक-दूसरे से टकराए।
"ये साज़िश है," उन्होंने कहा। "ये सब मेरे खिलाफ़ है।"
और तभी रणवीर सिंह खड़े हुए।
मैंने देखा — बहुत धीरे। उन्होंने व्हीलचेयर के हत्थों पर दोनों हाथ रखे, और अपने शरीर को ऊपर खींचा। पहले कुछ नहीं हुआ। फिर उनके पैर काँपे, और उनकी कमर सीधी हुई। वो मंच के किनारे तक सहारे से खड़े रहे — पूरे नहीं, पर इतने कि उनका चेहरा भीड़ के सामने आ गया।
मैदान में जोर की आवाज़ आई — कोई पहलवान चिल्लाया, कोई रोया, कोई "रणवीर सिंह" का नाम लेने लगा।
"मेरा उत्तराधिकारी," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ भारी थी, "मेरी बेटी के साथ खड़ा है। और मैं ये भी कहूँगा — मुझे इस मिट्टी से कोई शिकायत नहीं। शिकायत उस आदमी से है जिसने इस मिट्टी में ज़हर घोला।"
उन्होंने ठाकुर की तरफ़ उँगली उठाई, और उनकी उँगली काँप रही थी, पर वो रुकी नहीं।
"इस आदमी ने," रणवीर सिंह ने कहा, "मेरे पैर लिए। मेरे भाई की जान ली। और आज भी इस मिट्टी पर राज करना चाहता है।"
मैदान में हलचल शोर बन गई। कुछ पहलवान आगे बढ़े। किसी ने ठाकुर की तरफ़ मिट्टी फेंकी — मुट्ठी भर लाल मिट्टी, जो उनके सफ़ेद कुर्ते पर लग गई।
और मैंने देखा — ठाकुर की आँखों में पहली बार डर आया। वो एक कदम पीछे हटे, फिर मंच की सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।
पर उतरने से पहले वो रुके। वो जग्गा के पास गए, और उसके कान में कुछ कहा। मैं दूर था, सुन नहीं सका। पर मैंने देखा — जग्गा का चेहरा पत्थर जैसा हो गया। उसकी मुट्ठियाँ भींच गईं, और उसकी आँखों की थकान एक पल में गुस्से में बदल गई।
ठाकुर नीचे उतरे और भीड़ में घुल गए।
और जग्गा मंच के बीच में आया। उसने माइक पकड़ा, और उसकी आवाज़ में वो कुछ था जो पहले नहीं था — एक घाव।
"वीर सिंह," उसने कहा, और उसने मेरा नाम ऐसे लिया जैसे कोई हथियार उठाता हो। "मैं इससे अभी लड़ूँगा। यहीं। इसी मिट्टी पर। और जो जीतेगा, वही भारत केसरी में जाएगा।"
मैदान में फिर सन्नाटा। और उस सन्नाटे में मैंने अपनी साँस सुनी, और अपने दिल की धड़कन भी।
मैं आगे बढ़ा। मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी — एक पल के लिए, जैसे कह रही हो कि रुक जा, सोच ले। पर मैंने उसका हाथ धीरे से हटाया और मंच के किनारे पर आ गया।
मैंने जग्गा की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में गुस्सा था, पर उस गुस्से के नीचे वही थकान थी। वो आदमी नहीं था जो लड़ना चाहता था। वो आदमी था जिसे लड़ने के लिए मजबूर किया गया था।
"लड़ूँगा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ माइक में गूँजी। "पर तेरे पिता के सामने।"
जग्गा रुका। उसकी भौंहें सिकुड़ीं। "मेरे पिता?" उसने कहा। "मेरे पिता तो — "
"तेरे पिता ज़िंदा हैं," मैंने कहा।
मैदान में हवा रुक गई।
"और वो यहाँ हैं," मैंने कहा। "आज। इसी मैदान में।"
जग्गा का चेहरा बदला। पहले उसने हँसने की कोशिश की — जैसे कोई मज़ाक सुनकर हँसता है। पर हँसी उसके गले में ही अटक गई। उसने भीड़ की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर फिर भीड़ की तरफ़।
"झूठ," उसने कहा। पर उसकी आवाज़ में वो यकीन नहीं था।
मैंने भीड़ की तरफ़ हाथ बढ़ाया। और शमशेर सिंह आगे आए।
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