Spirit of a Fighter – Chapter 773
"मुझे ठाकुर ने कहा था," उसने कहा, और हर शब्द को अलग-अलग रखकर बोला, "कि तू मुकाबले से डरकर भाग गया। कि तू काग़ज़ पर अँगूठा लगाकर नाम खुद वापस ले लिया।"
"मैंने नहीं लिया," मैंने कहा।
"मैं जानता हूँ," उसने कहा।
मैं रुक गया। मीरा ने मेरी बाँह दबाई।
"कैसे जानता है?" मैंने पूछा।
जग्गा ने अपना हाथ उठाया और उससे अपनी छाती पर वार किया — धीरे, जैसे कोई पुरानी चोट याद दिला रहा हो।
"क्योंकि ठाकुर झूठ बोलता है, ये मैं बचपन से जानता हूँ," उसने कहा। "जिस दिन मेरे बाप को कुएँ में गिराया गया, उस दिन उसने कहा था कि मेरे बाप ने खुद को मार डाला। मैंने तब सोचा था — अगर बाप ही ऐसा कर सकता है, तो बेटा क्या करेगा?" उसकी आँखें मेरी आँखों में थीं, और उनमें एक पुरानी थकान बह रही थी। "मैं बीस साल से उसके पीछे-पीछे चल रहा हूँ। उसने मुझे अपना हथियार बनाया। मैं बन गया। पर आज सुबह, जब उसने मुझसे कहा कि वीर भाग गया, मुझे कुछ अजीब लगा।"
"क्या?"
"क्योंकि भागने वाला आदमी पंचायत के दफ़्तर में काग़ज़ों के पीछे नहीं आता," जग्गा ने कहा, और उसके होठों पर एक हल्की-सी रेखा आई, जो शायद मुस्कान थी। "मैं तुझे यहाँ आता देख रहा था। मैं सोच रहा था — ये आदमी काग़ज़ का झूठ खोजने आया है, तो ये भागा नहीं है।"
मीरा ने मेरी बाँह छोड़ दी। मैंने जग्गा की तरफ़ कदम बढ़ाया।
"तू मुझसे क्यों लड़ना चाहता है?" मैंने पूछा। "अगर तुझे पता है कि ठाकुर झूठा है, तो तू मेरे सामने क्यों खड़ा है? तू उसके सामने क्यों खड़ा नहीं होता?"
जग्गा का चेहरा बदला। कुछ पल के लिए उसकी आँखों में वो गुस्सा आया जो दबा हुआ पानी फूटने से पहले आता है।
"क्योंकि मेरे पास कुछ नहीं है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "मेरे बाप की कोई कब्र नहीं। मेरे बाप की कोई तस्वीर नहीं। बस एक कुआँ है जो बंद है, और एक नाम जो किसी काग़ज़ पर नहीं लिखा। ठाकुर ने मुझे खाना दिया, कपड़ा दिया, ताकत दी। मैंने सोचा — मैं उसका ही हूँ। फिर मुझे पता चला कि जिसने मेरे बाप को मारा, वही मेरा बाप है।"
वो चुप हो गया। हवा चली, और उसके कुर्ते का कोना उड़ा।
"तू मुझसे लड़ेगा?" मैंने पूछा।
"हाँ," उसने कहा। "पर वो ठाकुर के लिए नहीं। मैं लड़ूँगा, ताकि मैं खुद को साबित कर सकूँ कि मैं उसका हथियार नहीं हूँ। मैं लड़ूँगा, और अगर तू मुझे गिरा दे, तो मैं तेरे साथ खड़ा हो जाऊँगा। और अगर मैं तुझे गिरा दूँ, तो तू मेरी बात सुनेगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथ बगल में थे, मुट्ठियाँ बंधी हुई। उसकी आँखों में वो ज़िद थी जो मैंने अपनी माँ की आँखों में देखी थी — वो ज़िद जो हार मानने से इनकार करती है।
"मैं तुझसे लड़ूँगा," मैंने कहा।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ी।
"भाई —"
"पर अभी नहीं," मैंने कहा। "गली में नहीं। अभी नहीं। मैदान में। सबके सामने। जब पूरा शहर देख रहा हो। तब लड़ेंगे। तब तेरा बाप भी देखेगा, और मेरा बाप भी। और तब हम दोनों के बीच जो भी होगा, वो सिर्फ़ हम दोनों का होगा।"
जग्गा कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने अपनी मुट्ठियाँ खोल दीं, और उसकी साँस धीमी हुई।
"कल," उसने कहा। "सुबह। मैदान में।"
"कल सुबह," मैंने दोहराया।
वो पलटा और चलने लगा। दो कदम चलकर वो रुका और बिना पलटे बोला, "तेरे पापा शेर सिंह के बारे में… ठाकुर कभी उनका नाम नहीं लेता। कभी नहीं। जब भी कोई उनका नाम लेता है, वो उस आदमी को ऐसे देखता है जैसे कोई खून देख रहा हो।" वो एक पल रुका, फिर बोला, "ये बात जान ले। ये काम आएगी।"
और वो चला गया। उसके जाने के बाद सिर्फ़ धूल बची, और उसके पैरों के निशान सूखी मिट्टी पर।
टिंकू ने लंबी साँस छोड़ी। "भाई, तुम पागल हो। तुमने उससे लड़ने का वादा कर दिया। कल सुबह। मैदान में।"
"मैंने मना नहीं किया," मैंने कहा।
"पर भैरव ने तो खुद को हारा घोषित कर दिया था। अब क्या — तुम्हें उससे नहीं, जग्गा से लड़ना है?"
"नहीं," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो साफ़पन था जो अचानक किसी बात को समझ लेने पर आता है। "वो जग्गा से नहीं लड़ेगा। वो जग्गा के साथ खड़ा होगा। और जब दोनों साथ खड़े होंगे, तब ठाकुर के पास क्या बचेगा?"
टिंकू ने सोचा। फिर उसका मुँह खुला। "कुछ नहीं।"
"बिलकुल कुछ नहीं," मीरा ने कहा।
मैंने अपनी जेब से वो पर्ची निकाली जो अभी मिली थी — "आज रात, अखाड़े के पीछे वाली दीवार के पास आ जाओ। अकेले।" मैंने उसे मीरा को दिखाया।
"ये पर्ची जग्गा की नहीं है," मैंने कहा। "इस पर उस पुराने आदमी की मिट्टी की गंध है — वो ठंडी, गीली मिट्टी, गड्ढे की। जग्गा की गंध मुझे आज साफ़ मिली — उस पर सूखी धूल है, तेल नहीं। पर इस पर्ची पर तेल है। पुराना तेल, बहुत पुराना।"
मीरा ने पर्ची देखी। "तो ये किसने भेजी?"
मैंने अखाड़े की दीवार की तरफ़ देखा। वो अब भी वहीं खड़ी थी, और उस पर कोई नहीं था।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर आज रात मुझे जानना है। और एक बात — जग्गा ने कहा न कि ठाकुर पापा का नाम सुनकर खून जैसा देखता है।"
"हाँ।"
"तो माँ से पूछना होगा," मैंने कहा। "क्योंकि अगर ठाकुर पापा से इतना डरता है, तो पापा के पास कुछ था जो ठाकुर के पास नहीं है। और वो चीज़ शायद अभी भी कहीं है।"
टिंकू ने अपनी टोपी पहनी और उसे ठीक किया। "तो अब हम घर चलें? माँ से पूछने?"
"नहीं," मैंने कहा। "पहले अखाड़े के पीछे वाली दीवार। आज रात। मुझे देखना है कि वो आदमी कौन है जो जग्गा के नाम पर मुझे बुला रहा है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चिंता थी जो वो कभी मुँह से नहीं कहती। "अकेले?"
"नहीं," मैंने कहा। "तुम दोनों के साथ। पर दीवार के पीछे सिर्फ़ मैं जाऊँगा। वो अकेले बुला रहा है, तो अकेले ही मिलेगा। तुम दोनों दीवार के इस तरफ़ रहोगे। अगर मेरी आवाज़ बंद हो जाए, तो तुम समझ जाना।"
टिंकू ने अपनी छाती पर हाथ रखा। "भाई, मेरी आवाज़ तो कभी बंद नहीं होती। मैं चिल्लाता रहूँगा।"
मीरा पहली बार उस दिन हँसी। वो हँसी छोटी थी, पर साफ़ थी, और उस हँसी में वो सब था जो हम तीनों के बीच था — डर, थकान, और उसके ऊपर एक अजीब-सी हिम्मत।
हम अखाड़े की तरफ़ चले। रास्ते में मैंने मुंशी जी को उनके घर तक छोड़ा। उन्होंने दरवाज़े पर खड़े होकर मेरा हाथ पकड़ा और धीरे से कहा, "बेटा, मैं कल सुबह पंचायत में रहूँगा। तेरे साथ।"
"थैंक्यू, मुंशी जी," मैंने कहा।
घर पहुँचकर मैंने माँ को सब बताया। वो चूल्हे के पास बैठी थीं, और उनके हाथ में लोहे की कड़छी थी। जब मैंने ठाकुर का नाम लिया, तो कड़छी उनके हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिरी। उसकी आवाज़ आँगन में गूँजी, और माँ कुछ पल के लिए वैसी ही बैठी रहीं, जैसे कोई पुरानी तस्वीर हो।
"माँ," मैंने धीरे से कहा, और उनके पास बैठ गया। "ठाकुर पापा का नाम सुनकर क्यों डरता है?"
माँ ने अपना चेहरा मेरी तरफ़ किया। उनकी आँखों में पानी था, पर वो नहीं गिरा। उन्होंने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा।
"क्योंकि तेरे पापा के पास एक काग़ज़ था," उन्होंने कहा, इतनी धीमी आवाज़ में कि जैसे वो खुद भी उसे सुनकर डर रही हों। "एक काग़ज़ जिस पर ठाकुर के हाथ की लिखाई थी। और उस काग़ज़ में वो सब लिखा था जो ठाकुर ने बीस साल में किया — किसे मारा, किसे डुबोया, किसे बेचा। तेरे पापा ने वो काग़ज़ किसी को दिया था। किसी ऐसे आदमी को जिस पर वो आँख बंद करके भरोसा करते थे।"
"किसको?" मैंने पूछा।
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