Spirit of a Fighter – Chapter 766
मैं उठा।
"तो हमें हबीब से मिलना है," मैंने कहा। "जग्गा से नहीं। पहले हबीब।"
टिंकू ने अपनी टोपी ठीक की, जैसे अब कोई बड़ा काम शुरू हो रहा हो।
"भाई," उसने कहा, "मैं एक बात कहूँ? जग्गा शहर के अखाड़े में है। और शहर के अखाड़े में पहुँचने के लिए बस अड्डे से बस पकड़नी पड़ती है। और बस अड्डे पर चाय ऐसी होती है कि…" उसने एक पल रुककर हवा में हाथ घुमाया, "कि इंसान अपना सब कुछ भूल जाए।"
माँ ने पहली बार बोला।
"तू जा रहा है?"
मैं उनके पास गया।
"माँ," मैंने कहा, "जग्गा के बाप को कुएँ में धक्का देने वाला वही आदमी है जिसने पापा को ज़हर दिया। अगर जग्गा को पता है, तो वो हमारा सबसे बड़ा गवाह है। और अगर उसे नहीं पता, तो हमें उसे बताना है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो पुरानी चमक थी, वो जो मुझे रोज़ सुबह चक्की पर बैठे दिखती है।
"एक शर्त पर," उन्होंने कहा। "टिंकू तेरे साथ जाएगा। और ये ले।" उन्होंने अपनी कमर से एक छोटी पोटली निकाली। "इसमें हल्दी और काली मिर्च है। अगर रास्ते में कोई रोके, तो आँखों में फेंक देना। और हाँ…"
वो रुकीं।
"मीरा," उन्होंने कहा, "तू भी जाएगी?"
मीरा ने सिर हिलाया।
"तो फिर मेरी बात सुन।" माँ ने मीरा का हाथ पकड़ा, और मैंने देखा कि माँ की उँगलियाँ मीरा की उँगलियों पर कैसे कस गईं। "तू ठाकुर की बेटी है। अगर शहर में किसी ने तुझे पहचान लिया, तो ठाकुर को ख़बर जाएगी। तू मुँह पर कपड़ा रख लेना। बस थोड़ा-सा।"
मीरा ने एक पल माँ को देखा, और फिर उसने सिर झुका लिया। मुझे लगा वो कुछ कहेगी, पर वो चुप रही। पहली बार मैंने देखा कि मीरा ने किसी के सामने सिर झुकाया था, और वो भी मेरी माँ के सामने।
हम निकले।
रामलाल काका को सुरंग में बाबा हरिदास के पास छोड़ दिया — वहाँ कोई नहीं पहुँच सकता था। कालू काका ने उनके हाथ में घंटी थमाई, और रामलाल काका ने उसे सीने से लगा लिया, जैसे कोई बच्चा अपनी खिलौना।
"मैं तेरा इंतज़ार करूँगा," रामलाल काका ने मेरे हाथ पकड़कर कहा। "पर वीर, एक बात याद रख — जग्गा का दिल टूटा है। टूटे हुए आदमी के पास जाना है तो पहले उसका टूटना सुनना।"
मैंने सिर हिलाया। मैंने उनका हाथ माथे से लगाया, और हम निकल पड़े।
रास्ता लाल मिट्टी का था, और धूप ऐसी कि चप्पलें तवे जैसी लगें। टिंकू ने अपनी टोपी आँखों पर खींच ली और बड़ी-बड़ी बातें करने लगा, जैसे वो हमेशा करता है जब उसे डर लग रहा हो।
"भाई," उसने कहा, "मैं तो कहता हूँ, शहर के अखाड़े में जग्गा कोई बड़ा पहलवान होगा। और जब वो सुनेगा कि हम उसके बाप की बात लेकर आए हैं, तो वो खुश होकर हमें अपनी मिठाई खिलाएगा। मुझे तो बस यही टेंशन है कि अगर उसने मुझसे कहा 'कुश्ती करो', तो मैं…"
"तो तू कहेगा कल से करूँगा," मैंने कहा।
मीरा हँसी। पहली बार आज सुबह से।
टिंकू ने उसकी तरफ़ देखा और मुँह बनाया। "मैडम, आप भी।"
"अब मैडम मत कहो," मीरा ने कहा, और मैंने उसकी आवाज़ में वो नरमी पहचानी जो अब मुझे बहुत प्यारी लगती है। "मीरा काफ़ी है।"
टिंकू ने एक पल के लिए आँखें मूँदीं, जैसे कोई बड़ा सच सुन लिया हो।
"ठीक है," उसने कहा। "मीरा। पर तुम मुझे टिंकू ही कहना। भाई की तरह।"
"तू तो भाई है ही," मीरा ने कहा, और उसने टिंकू के कंधे पर हाथ रखा। टिंकू एक पल के लिए चुप हो गया। शायद उसे ऐसा किसी ने नहीं कहा था।
बस अड्डा दोपहर के वक़्त भरा था। धूल, पसीना, चाय की भाप, और मोटर की सीटों की गंध — मैं सब कुछ एक साथ सूँघ रहा था। मेरी नाक आज बहुत ज़्यादा जाग रही थी, जैसे उसे पता हो कि आज कुछ ऐसा मिलेगा जो बहुत दिनों से गायब था।
हम एक चाय की दुकान के बाहर बेंच पर बैठे। टिंकू ने तीन कुल्हड़ मँगाए और अपनी जेब से गुड़ निकालकर चाय में डालने लगा। मीरा ने अपने मुँह पर सूती का कपड़ा रख लिया था, ठीक वैसे जैसे माँ ने कहा था। पर उसकी आँखें छुप नहीं सकती थीं। वो आँखें बोलती हैं।
और तभी मुझे गंध आई।
नीम का तेल और तंबाकू।
मेरी पीठ सीधी हो गई। ये गंध मैं भूल नहीं सकता था। ये गंध उन आदमियों की थी जो ठाकुर के साथ चलते थे। जो मेरे आँगन में खड़े होकर माँ को पीतल का ढक्कन थमाते थे। जो भैरव के इशारे पर चलते थे।
मैं धीरे से पलटा।
दुकान के दूसरे कोने पर, एक बेंच पर, एक आदमी बैठा था। पचास के आस-पास, दुबला, कमर झुकी हुई, सिर पर गमछा। उसके सामने चाय रखी थी, ठंडी। उसे छुई भी नहीं थी।
उसके हाथ में अख़बार था। मैंने गौर से देखा — अख़बार नहीं। तस्वीर। पुरानी, मुड़ी हुई, किनारों से फटी हुई। वो उसे दोनों हाथों से पकड़े था, और उसके अंगूठे उस पर इतने कस रहे थे जैसे वो तस्वीर उड़ न जाए।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरी नज़र के रास्ते उस आदमी पर।
उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, लेकिन पकड़ मज़बूत थी।
"अब तुम अकेले नहीं हो," उसने बहुत धीरे कहा, होंठ लगभग हिले भी नहीं। "ध्यान से।"
मुझे उस एक लाइन में वो सब मिल गया जो मुझे चाहिए था। मैं उठा।
"भाई?" टिंकू ने कहा, चाय के कुल्हड़ के ऊपर से। "कहाँ?"
"तू यहीं रुक।" मैंने कहा। "अगर मैं दो पल में न आऊँ, तो मीरा को लेकर बस पकड़ लेना।"
"मैं नहीं जाऊँगी," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जिससे मैं अब अच्छी तरह वाक़िफ़ हूँ।
मैं उस आदमी की तरफ़ बढ़ा। पैर धूल में दब रहे थे। चाय की भाप के बीच से मैं उसकी गंध के और करीब आ रहा था। नीम का तेल। तंबाकू। और उसके ऊपर, एक और गंध — पुरानी मिट्टी की, जो सिर्फ़ उन कपड़ों से आती है जो बरसों एक ही संदूक में बंद रहे हों।
मैं उसकी बेंच पर बैठ गया। इतना पास कि हमारी कोहनियाँ लगभग छू जाएँ।
वो चौंका नहीं। उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। बस तस्वीर पर अपनी नज़रें जमाए रहा।
"ये तस्वीर में कौन है?" मैंने पूछा।
मेरी आवाज़ सपाट थी, बिना डर, बिना गुस्सा। पर मेरे अंदर मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
उसने एक लंबी साँस ली। वो साँस जैसी कोई बीस साल से रुकी हुई हो।
फिर उसने तस्वीर धीरे से घुमाई, मेरी तरफ़।
उसमें एक नौजवान था — डेढ़ी-मुश्की उमर, चौड़े कंधे, मुँह पर वो हल्की मुस्कान जो सिर्फ़ उन्हीं के चेहरे पर होती है जिनके अंदर कोई सपना ज़िंदा हो। वो जग्गा था। मैंने उसे पहचान लिया, क्योंकि उसकी आँखें वैसी थीं जैसी कुएँ के पास रोते हुए आदमी की होती हैं।
और उसके कंधे पर हाथ रखे खड़ा था एक बड़ा, चौड़ा आदमी, जिसकी मूँछें घनी थीं, गले में सोने की चेन, और आँखों में वो ठंडक जो मैं बीस बार देख चुका हूँ। ठाकुर महेंद्र सिंह।
मैंने अपनी आँखें तस्वीर से हटाईं और उस आदमी की तरफ़ देखा। उसकी आँखें अब भीगी हुई थीं, पर उनमें वो डर नहीं था जो मैंने सोचा था। उनमें एक सन्नाटा था। बहुत पुराना सन्नाटा।
"मैं जग्गा का पिता हूँ," उसने कहा।
मेरी साँस रुक गई।
"और मैं तीस साल से मरा हुआ हूँ।" उसने तस्वीर को अपनी छाती से लगाया। "ठाकुर ने मुझे ज़िंदा गाड़ दिया था।"
मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। पूरा बस अड्डा, चाय की भाप, टिंकू की आवाज़, सब कुछ दूर हो गया। सिर्फ़ उसकी आवाज़ बची थी, और उसके हाथों में पकड़ी वो तस्वीर।
"आप…" मेरी आवाज़ निकली पर फटी हुई। "आप छोटू हैं? जग्गा के बाप? जिसे कुएँ में…"
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