Spirit of a Fighter748 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 748

7 min read November 5, 2026

कालू काका ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया था। उनके कंधे हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी। जैसे कोई रो रहा हो पर खुद को रोक रहा हो, क्योंकि रोना पुरुषों का काम नहीं, ये उनके बाप ने उन्हें सिखाया था।

"काका," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई। "चंदन के बारे में बताइए। प्लीज।"

कालू काका ने हाथ नीचे किया। उनकी आँखें लाल थीं, और होंठ काँप रहे थे। "चंदन मेरा बेटा था," उन्होंने कहा, और वो शब्द एक-एक करके गिरे जैसे ईंटें गिरती हैं। "बारह साल पहले ये तीनों — रघुवीर, शेर सिंह, और मेरा चंदन — तीनों बाबा हरिदास के सबसे प्यारे शिष्य थे। तीनों एक ही मिट्टी में पले। और फिर भैरव आया। उसने तीनों को तोड़ने की कोशिश की। रघुवीर को मारने की कोशिश की, शेर सिंह को खरीद लिया, और मेरे चंदन को…"

वो रुके। उनका गला भर आया था।

"उसने चंदन को क्या किया?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ बहुत नरम थी, जैसे वो किसी बीमार आदमी से बोल रही हो।

"उसने उसे अपने साथ कर लिया," कालू काका ने कहा। "मेरा बेटा आज भैरव के साथ है। और वो जानता है कि मैं ज़िंदा हूँ। वो जानता है कि मैं यहाँ हूँ। और वो कभी मुझसे मिलने नहीं आया। बारह साल में एक बार भी नहीं।"

ये सुनकर मेरे अंदर कुछ ऐसा टूटा जो शब्दों में नहीं था। मैंने कालू काका को वैसे देखा जैसे पहली बार देख रहा हूँ। उनकी आँखों में वो दर्द था जो रोज़ सुबह उठकर चाय बनाता है, रोज़ रात को सोने से पहले छत को देखता है, और किसी को कुछ नहीं कहता।

"तस्वीर के पीछे लिखा है," मीरा ने धीरे से कहा, "जो अपने गुरु को भूल गया, उसका शिष्य भी उसे भूलेगा।" उसने तस्वीर पलटी और उसके किनारे को अपनी उँगली से सहलाया। फिर उसकी उँगली रुक गई। "वीर, ये देखो।"

मैं झुका। तस्वीर के दाएँ कोने में, उस साधु के पीछे, असल में एक दीवार थी — और उस दीवार में एक छोटा-सा दरवाज़ा। इतना छोटा कि पहली नज़र में वो दीवार का कोई धब्बा लगे।

"ये तहखाने के नीचे की कोई जगह है," मीरा ने कहा। "यहाँ से नीचे। और उस कमरे में एक और दरवाज़ा है।"

"भाई," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मासूमियत थी जो सिर्फ़ उसी के पास थी, "ये तो वो ही जगह है जहाँ बाबा हरिदास रहता है। असली वाला। जो ज़िंदा है।"

मैंने बिसरा की तरफ़ देखा। उसने आँखें बंद कर ली थीं, और उसके होंठ हिल रहे थे — कुछ पढ़ रहा था, या कुछ माँग रहा था। फिर उसने आँखें खोलीं।

"कल सुबह," उसने कहा, "जब सूरज निकलेगा, तब हम उस दरवाज़े से नीचे जाएँगे। रात में नहीं। क्योंकि रात में वो जागता है, और सुबह में सोता है। और सुबह हमें वो चीज़ मिल सकती है जो बीस साल से किसी ने नहीं देखी।"

"क्या चीज़?" मैंने पूछा।

बिसरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो पुरानी शर्म फिर आई, पर इस बार उसके साथ कुछ और भी था — एक चमक, जैसे किसी बूढ़े आदमी के हाथ में आख़िरी बार तलवार थमाई गई हो।

"तेरे पापा का असली चेहरा," उसने कहा। "जो उसने इस चेहरे के नीचे छिपा रखा है। और वो चेहरा देखकर ही हमें पता चलेगा कि चंदन को भैरव से कैसे वापस लाना है।"

कालू काका ने उस वक़्त एक आवाज़ निकाली — न रोना, न हँसी, बस एक टूटी हुई आवाज़, जैसे बारह साल का सन्नाटा एक साथ फूट पड़ा हो।

॥

कालू काका की वो आवाज़ अभी भी मेरे कानों में गूंज रही थी। जैसे किसी पुराने ताले की चाबी टूट गई हो और अंदर बारह साल की चुप्पी एक साथ बाहर निकल आई हो।

टिंकू ने उनका कंधा थाम लिया। कुछ नहीं बोला। बस थाम लिया। और कालू काका ने उसका हाथ पकड़कर इतनी ज़ोर से दबाया कि मैंने देखा टिंकू के होंठ सिकुड़ गए, पर वो हाथ नहीं छुड़ाया।

बिसरा खड़े थे, दीवार से टिके। उनका चेहरा — जो असल में किसी और का चेहरा था — लालटेन की पीली रोशनी में ऐसा लग रहा था जैसे कोई पुरानी तस्वीर अचानक साँस लेने लगी हो।

"कल सुबह," वो फिर बोले, धीमे से, जैसे खुद को याद दिला रहे हों। "सूरज निकलने के बाद। रात में वो जागता है।"

"नहीं।"

सबने मेरी तरफ़ देखा।

"कल सुबह नहीं," मैंने कहा। "अभी।"

कालू काका का हाथ टिंकू के कंधे से खिसक गया। "बेटा, तू पागल हो गया है क्या? उस आदमी ने तेरे पापा को—"

"मेरे दो पापा थे, काका," मैंने कहा। ये शब्द मेरे मुँह से ऐसे निकले जैसे किसी और ने बोले हों, कोई मेरे अंदर बैठा आदमी। "एक को उसने ज़हर दिया। दूसरे का चेहरा उसने उतार लिया। और अब वो मेरी माँ को, मेरे गाँव को, इस पूरी मिट्टी को धमका रहा है। तुम बताओ — ऐसे आदमी के लिए सुबह का इंतज़ार क्यों करूँ?"

मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत। "वीर, सुनो।" उसकी आवाज़ वो वाली नहीं थी जो अदालत में बहस करती है। ये आवाज़ नरम थी, किसी चीज़ को संभालने वाली। "वो आदमी तुम्हारे पापा का ज़हर पिलाने में शामिल था। हो सकता है आज भी उसके पास वो ज़हर हो। तुम अंधेरे में, रात में, एक ऐसे आदमी के सामने जाओगे जिसने बीस साल से अपना चेहरा बदलकर सबको धोखा दिया है?"

"हाँ," मैंने कहा। "क्योंकि वो ज़िंदा है। और मरे हुए आदमी सच नहीं बोलते।"

मीरा मेरी तरफ़ देखती रही। कुछ पल। फिर उसने हाथ छोड़ दिया, पर अपनी आँखें नहीं छोड़ीं। "ठीक है। पर एक शर्त पर। मैं साथ चलूँगी।"

"मीरा—"

"मैं साथ चलूँगी," उसने दोहराया, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद लौट आई जो उसे पहली बार अखाड़े में मिली थी, जब वो मुझे जूते पहनकर मिट्टी में घुसने पर धक्का दे रही थी। "और अगर तुमने मना किया, तो मैं अकेले चली जाऊँगी। तुम चुनो।"

मैंने उसे देखा। लालटेन की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी, और उसके बालों में धूल थी, और उसके होंठ सूखे थे — और उस वक़्त मुझे याद आया कि वो कल रात से कुछ खाई भी नहीं थी। मैं कितना बड़ा बेवकूफ़ हूँ।

"ठीक है," मैंने कहा। "पर पहले तुम कुछ खाओगी।"

"मैं भूखी नहीं हूँ।"

"मैंने पूछा भी नहीं।" मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। "तेरे पास कुछ है?"

टिंकू ने अपनी जेब टटोली और एक छोटी पोटली निकाली, जिसमें दो लड्डू थे, थोड़े टूटे हुए। "सुबह का बचा हुआ है," उसने कहा, थोड़ी शर्म से। "पर भाई, ये थोड़े सूखे हैं—"

"दे दे।"

मीरा ने लड्डू नहीं लिया। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं देखा था — जैसे वो मेरे अंदर किसी ऐसी चीज़ को ढूँढ रही हो जो उसे अभी तक नहीं मिली थी।

"तुम्हें पता है," उसने धीरे से कहा, "मैंने इस गाँव में आकर सबसे पहली चीज़ जो सीखी, वो ये थी कि यहाँ के लोग अपनी बात सीधे नहीं कहते। तुम भी नहीं कहते।"

मैं चुप रहा।

"तुमने मुझे पहले कभी नहीं बताया कि तुम्हारी माँ कैसे रोटी बनाती है। या कि तुम्हारी बहन कैसे मिट्टी भरकर रखती है। या कि तुम रातों को कहाँ जाते हो। मैंने सब खुद देखा। खुद समझा।" उसने लड्डू ले लिया, पर खाया नहीं — उसे हाथ में पकड़कर घुमाया। "और अब तुम मुझे अंधेरे में अपने साथ ले जाना चाहते हो, ये कहकर कि 'मेरी मदद करने आई हो या मेरी माँ बनने?'"

मेरे पेट में एक झटका लगा। ये मैंने कब कहा? मैंने तो सोचा भी नहीं था।

"मैंने… मैंने ऐसा कहा?"

टिंकू ने मुँह दबाकर हँसी रोकी। कालू काका ने अपनी दाढ़ी में मुँह छिपा लिया। बिसरा ने आँखें ऊपर कर लीं, जैसे आसमान से कोई जवाब माँग रहे हों।

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