Spirit of a Fighter732 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 732

7 min read November 5, 2026

"मुझे तीन महीने पहले पता चला," उसने कहा। "बाबा हरिदास के एक आदमी ने शराब पीकर ज़ुबान फिसला दी। मैं तब से खोद रहा था। मुझे बस एक चीज़ चाहिए थी — वो लोग जो मेरे बाप को बीस साल ज़मीन के नीचे दबाकर बैठे थे।"

"तो तुमने मेरे पापा को क्यों ढूँढा?" मैंने कहा।

"क्योंकि तुम्हारे पापा वो इकलौता सबूत हैं जो बाबा हरिदास को अदालत में बाँध सकते हैं। ज़िंदा सबूत। मैं उन्हें बाबा हरिदास के सामने नहीं, अदालत के सामने खड़ा करना चाहता था।" उसने रुककर मेरी तरफ़ देखा। "पर बाबा हरिदास ने मुझे ढूँढ लिया। उन्होंने मुझे कहा कि अगर मैं तुम्हारे पापा को उनके पास ले आऊँ, तो मेरे बाप आज़ाद हो जाएँगे।"

"और तुम मान गए?"

"मैंने हाँ कह दी।"

भीड़ में फुसफुसाहट उठी। कोई चिल्लाया — "पकड़ो इसे!" — और दो आदमी आगे बढ़ने लगे।

मैंने अपना हाथ उठाया।

"रुको," मैंने कहा। "रुको।"

दोनों रुक गए।

मैंने राघव की तरफ़ देखा। "अगर तुम अपने बाप को छुड़ाना चाहते हो, तो तुम मेरे पापा को बाबा हरिदास के पास क्यों ले जाते? तुम मुझे बता देते। हम मिलकर रास्ता निकालते।"

राघव हँसा। छोटी, सूखी हँसी।

"तुम्हें क्या लगता है, मैंने कोशिश नहीं की?" उसने कहा। "तीन हफ़्ते पहले मैंने तुम्हारे गाँव में एक आदमी भेजा — एक बूढ़ा, जिसे तुमने नहर के पुल के नीचे देखा था। उसने तुम्हें संदेश दिया था। तुमने सुना?"

मुझे याद आया। नहर के पुल के नीचे वो बूढ़ा, जो दीनू का संदेश लाया था। जो कुछ कहता था और फिर चुप हो जाता था।

"तो वो तुम्हारा आदमी था?"

"वो मेरा चाचा था। मेरे बाप का भाई। उसने तुम्हें बताने की कोशिश की कि बाबा हरिदास असली खेल खेल रहे हैं। पर तुम्हारे गाँव के लोगों ने उसे भगा दिया। उसे पत्थर मारे।" राघव की आवाज़ कड़वी हो गई। "तब मैंने सोचा, अगर सीधा रास्ता नहीं चलता, तो मैं वो करूँगा जो बाबा हरिदास कहेंगे। और फिर मैं तुम्हारे पापा को लेकर भीतर से तोड़ूँगा।"

"पर तुमने नहीं तोड़ा," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ तेज़ थी। "तुम यहाँ खड़े हो, सबके सामने, अपनी कलाई दिखा रहे हो। क्यों?"

राघव ने उसकी तरफ़ देखा। कुछ देर देखता रहा।

"क्योंकि कल रात," उसने धीरे से कहा, "मैंने अपने बाप को फ़ोन पर सुना। बाबा हरिदास ने उसे दो मिनट के लिए बोलने दिया था। उसने कहा — 'बेटा, अगर मैं मर गया, तो उस आदमी से कहना कि उसका बाप ज़िंदा था, और उसने उसे बचाने की कोशिश नहीं की।'" राघव ने रुककर साँस ली। "मेरे बाप ने मुझे नहीं कहा कि मैं बदला लूँ। उन्होंने कहा — 'उस आदमी को बता देना, मैंने जो देखा था, वो सब सच था।'"

"कौन सा आदमी?" मैंने पूछा।

राघव ने अपना सिर उठाया और सीधा मेरी आँखों में देखा।

"तुम्हारे पापा," उसने कहा। "शेर सिंह।"

मैं पलटा। पापा वहीं खड़े थे — रामलाल के सहारे, जले हुए चेहरे के साथ, आँखों में पानी। उन्होंने अपना सिर धीरे से हिलाया। हाँ।

"तुम्हारे पापा ने मेरे बाप को बचाने की कोशिश की थी," राघव ने कहा। "उस रात। जब भैरव ने ज़हर दिया, मेरे बाप भी वहीं थे। वो भागे, पर पकड़े गए। तुम्हारे पापा ने उन्हें बचाने के लिए अपनी जान ख़तरे में डाली थी। पर नहीं बचा पाए। और बीस साल तक मेरे बाप ने तुम्हारे पापा को कोसा। फिर कल रात उन्होंने मुझसे कहा कि वो ग़लत थे।"

भीड़ में से एक औरत आगे आई। सुक्खी बुआ, पान का बीड़ा हाथ में लिए, आँखें भरी हुई।

"तो अब क्या होगा?" उसने कहा। उसकी आवाज़ में वो चुगली वाली चमक नहीं थी। सिर्फ़ थकान थी। "तू हमें बताता फिर रहा है कि कौन मरा, कौन मारा। हमें ये बता — हमारे बेटे वापस आएँगे या नहीं?"

राघव ने उसकी तरफ़ देखा।

"नहीं आएँगे," उसने धीरे से कहा। "पर उनकी मौत का हिसाब ज़रूर मिलेगा।"

मैंने आगे कदम बढ़ाया। मेरे पैर अब नहीं काँप रहे थे।

"राघव," मैंने कहा। "तुम्हारे पास बाबा हरिदास का पता है?"

"है।"

"कहाँ?"

राघव ने अपना सिर उठाकर ऊपर देखा। अखाड़े की छत की तरफ़ नहीं — उससे भी ऊपर। आसमान की तरफ़। फिर वो मुस्कुराया, और इस बार उसकी मुस्कान में कुछ और था। डर।

"वो कहीं नहीं है," उसने कहा। "वो हर जगह है। वो उस जगह से चलाता है जहाँ से सब दिखता है और कोई उसे नहीं देखता।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तुम्हें उसे ढूँढना है तो उस आदमी से पूछो जो बीस साल से उसका इंतज़ार कर रहा है।"

"मेरे पापा?"

"तेरे पापा नहीं।" राघव ने पीछे इशारा किया। "वो।"

मैं पलटा। रणवीर सिंह व्हीलचेयर पर बैठे थे, मीरा के पीछे, और उनका चेहरा पत्थर जैसा था।

"रणवीर सिंह," राघव ने कहा, "तुमने बीस साल पहले उस आदमी को एक बार देखा था। उस रात। तुमने मुझे नहीं बताया, पर मुझे पता है। तुमने कभी किसी को नहीं बताया कि उस रात तुमने क्या देखा था। पर मेरे बाप को बताया था। और मेरे बाप ने मुझे बताया।"

रणवीर सिंह का हाथ अपनी व्हीलचेयर की बाँह पर कस गया।

"मैंने कुछ नहीं देखा," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में वो गरज नहीं थी, बस थकान।

"देखा था," राघव ने कहा। "तुमने देखा था कि तुम्हारे पैरों को ज़हर किसने दिया। और तुमने उसका नाम कभी नहीं लिया।"

मैदान में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा सन्नाटा कि मुझे अपनी साँसें सुनाई दीं।

मैं रणवीर सिंह के पास गया। उनके सामने घुटने टेके।

"सर," मैंने कहा। "यही वक़्त है। अब बोलिए।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ चल रहा था — बाढ़ आ रही थी, और वो रोक रहे थे।

"तुम्हारे पापा," उन्होंने धीरे से कहा, "मेरे सबसे अच्छे दोस्त थे। हम तीन थे — मैं, तुम्हारे पापा, और चंदन का बाप कालू।" उन्होंने रुककर साँस ली। "हम तीनों ने मिलकर अखाड़ा बनाया था। अपने पसीने से। मिट्टी से। और उस मिट्टी में हमने एक साथ खड़े होकर क़सम खाई थी — इस अखाड़े में कभी कोई पहलवान भूखा नहीं सोएगा, कभी कोई बीमार नहीं मरेगा।"

"फिर क्या हुआ?"

"फिर एक आदमी आया," रणवीर सिंह ने कहा। "तीसरी बार। तीसरे साल। उसने कहा कि उसे तहखाने की मिट्टी चाहिए। हमने मना किया। उसने कहा कि वो हमें अखाड़े का मालिक बना देगा, बड़े शहर के अखाड़े से जोड़ देगा, हमें अमीर बना देगा। हमने फिर मना किया।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "और फिर एक दिन मैं उठा, तो मेरे पैर हिल नहीं रहे थे।"

"वो कौन था?" मैंने पूछा। "नाम?"

रणवीर सिंह ने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। उनका हाथ भारी था, ठंडा।

"उसने हमें अपना नाम नहीं बताया," उन्होंने कहा। "पर उसने एक बार, बस एक बार, बहुत ग़लती से, अपना नाम बोल दिया था। उस रात मैंने उसे सुना था — तुम्हारे पापा से बात करते हुए। उसने कहा था, 'शेर सिंह, तूने मुझे पहचाना नहीं?' और तुम्हारे पापा ने कहा था, 'मैं तुझे कैसे पहचानूँ? तू तो मर गया था।'"

मेरी साँस रुक गई।

"मर गया था?" मैंने कहा।

"उस आदमी का नाम," रणवीर सिंह ने कहा, "रघुवीर था।"

मैं जम गया। मेरे हाथ ठंडे हो गए। मेरे कानों में एक अजीब सी आवाज़ गूँजी।

"रघुवीर?" मैंने कहा। "मेरे पापा का दोस्त रघुवीर? जिसकी डायरी मुझे मिली थी? जिसने ज़हर के खिलाफ़ लिखा था?"

रणवीर सिंह ने अपना सिर हिलाया। एक बार। धीरे से।

"रघुवीर इस इलाक़े का सबसे बड़ा पहलवान था," उन्होंने कहा। "उससे बड़ा कोई नहीं था। और उसका एक ही सपना था — तहखाने की मिट्टी से ऐसी ताकत बनाना जो किसी को न हारने दे। हमने मना किया। उसने कहा कि हम डरपोक हैं। वो अकेला चला गया।"

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