Spirit of a Fighter730 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 730

7 min read November 5, 2026

रामलाल ने लड्डू अपने हाथ में लिया। उसने उसे सूँघा। फिर उसने अपने मुँह में रखा। और उसका चेहरा बदल गया। वो रोया नहीं। वो हँसा। बूढ़ी, टूटी हँसी।

"बेटा," उसने कहा, "मेरे बेटे भी यही मिठाई खाते थे। अखाड़े के बाहर एक दुकान थी, पुरानी। वो अब भी है क्या?"

टिंकू ने कुछ नहीं कहा। उसने बस रामलाल का हाथ कसकर पकड़ लिया।

हम बाहर निकले। रास्ते में एक पुरानी जीप मिली — टिंकू ने किसी मुंशी के बेटे को जानता था जो गाड़ी चलाता था। उसने दो रुपये में उसे मना लिया। रामलाल को पीछे बैठाया। कालू काका उसके पास बैठे। मीरा आगे बैठी और मैं उसके पास।

गाड़ी चली। धूल उड़ रही थी। रास्ते में रामलाल ने अपने सीने से वो तस्वीर निकाली — जो उसने अपने बेटे की सीने से लगाकर ली थी, और जिसे मैंने उसके घर में देखा था। उसने उसे अपने हाथों में खोला और मुझे दिया।

"ये देख," उसने कहा। "ये मेरे दोनों बेटे हैं।"

मैंने तस्वीर देखी। दो लड़के थे। एक बड़ा, एक छोटा। दोनों मिट्टी से सने हुए, दोनों की आँखें हँस रही थीं। बड़े वाले के हाथ में मिट्टी की गोली थी, जैसे वो अभी किसी को मारने वाला हो। छोटे वाले ने अपनी बाँहें फैला रखी थीं, जैसे वो दुनिया को गले लगाना चाहता हो।

"बड़ा वाला कालू है," रामलाल ने कहा। "सबसे बड़ा। और छोटा वाला… छोटा वाला मोहन है।"

मेरे हाथ रुक गए। "मोहन?" मैंने कहा।

"हाँ," रामलाल ने कहा। "मेरे छोटे बेटे का नाम मोहन था।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसकी आँखें बड़ी हो गई थीं। उसने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से कहा, "भैरव का असली नाम मोहन है।"

हाँ। भैरव का असली नाम मोहन। और उसके बाप माधव सिंह ने उसे ये नाम दिया था। पर अगर रामलाल के बेटे का नाम भी मोहन था, तो…

"काका," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप रही थी, "आपके छोटे बेटे मोहन को क्या हुआ?"

रामलाल ने अपना सिर झुकाया। उसने अपनी उँगली से तस्वीर पर छोटे लड़के के चेहरे को छुआ।

"वो मर गया," उसने कहा। "अखाड़े ने उसे खा लिया। बीस साल पहले। उसकी मौत का काग़ज़ किसी अलमारी में बंद है। और मैं तीस साल से उस काग़ज़ को नहीं देख पाया। नहीं, तीस साल नहीं — बीस साल। उन्नीस साल। जब से वो मरा। मैंने उसकी लाश भी नहीं देखी। मुझे बस ये बताया गया कि बुख़ार से मर गया। और मैंने पूछा भी नहीं। क्योंकि मैं डर गया था। मैं उस वक़्त भी डर गया था जब मेरा बड़ा बेटा मरा था।"

उसकी आवाज़ टूट गई। उसने अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया, जैसे वो अपनी ही आवाज़ को रोक रहा हो।

"काका," मैंने कहा, और मैंने उसका हाथ पकड़ा। "मैं आपको वो काग़ज़ दिलाऊँगा। अपने हाथों से। भैरव की अलमारी खुलेगी, और उसमें आपके बेटों की मौत का काग़ज़ मिलेगा। और मैं उसे आपके हाथ में दूँगा। ये मेरा वादा है।"

रामलाल ने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था, पर उसके होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान आई।

"तू अपने पापा का बेटा है," उसने कहा। "शेर सिंह का बेटा।"

गाड़ी एक गड्ढे से गुज़री और हम सब उछल गए। टिंकू ने झटके से मेरा कंधा पकड़ा। "भाई," उसने कहा, "अगर भैरव का असली नाम मोहन है, और रामलाल काका के बेटे का नाम भी मोहन था, तो कहीं भैरव…"

"नहीं," रामलाल ने कहा, और उसकी आवाज़ अचानक सख़्त हो गई। "भैरव मेरा बेटा नहीं है। भैरव माधव का बेटा है। मैंने उसकी शक्ल देखी है। वो मेरे मोहन जैसा नहीं है। मेरा मोहन मिट्टी में खेलता था, उसकी हथेलियों में मिट्टी की गंध रहती थी। भैरव की हथेलियों में… भैरव की हथेलियों में ज़हर की गंध है।"

"तो भैरव को मोहन नाम क्यों दिया गया?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ में अब वो सख़्ती लौट आई थी जो मैं जानता था — इंस्पेक्टर मीरा की सख़्ती।

रामलाल ने कुछ देर सोचा। गाड़ी की आवाज़ के बीच उसकी साँसें सुनाई दे रही थीं।

"शायद," उसने कहा, "शायद माधव ने जान-बूझकर ये नाम चुना। ताकि जब भी कोई मोहन का नाम ले, तो मेरे बेटे की मौत की याद आए। ताकि वो मुझे हर दिन चुभाए।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा। और मैंने देखा कि उसके होठों ने धीरे से कहा — "बीस साल की साज़िश।" मैंने सिर हिलाया।

गाड़ी रामपुर की सीमा पर पहुँची। सूरज ढल रहा था और आसमान में धूल की एक पीली चादर बिछी थी। पर जैसे ही हम गाँव के बाहर वाले रास्ते पर मुड़े, टिंकू ने अचानक कहा — "भाई, रुकवा।"

उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था कि ड्राइवर ने खुद ब्रेक मार दिए। मैंने आगे देखा। अखाड़े के बाहर भीड़ लगी थी। बहुत भीड़। दूर-दूर से लोग आए थे — कुछ की साइकिलें थीं, कुछ पैदल, कुछ बैलगाड़ियों में। सबके हाथ में एक अख़बार था, और सब उसे लहरा रहे थे जैसे कोई झंडा हो।

"ये क्या है?" मैंने कहा।

कालू काका ने गाड़ी से अपना सिर बाहर निकाला। उसने अख़बार देखा और फिर धीरे से कहा, "बेटा, अख़बार में तेरा नाम है।"

मैं गाड़ी से नीचे कूदा। मैंने एक आदमी के हाथ से अख़बार खींचा। सुर्ख़ी बड़ी-बड़ी छपी थी — "अखाड़े का ज़हर।" और उसके नीचे — "ग्यारह पहलवानों की मौत का सच बाहर। मालिक माधव सिंह और मैनेजर भैरव सिंह के खिलाफ़ जाँच। रामपुर के एक नौजवान वीर सिंह का बड़ा खुलासा।"

मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने अख़बार के पन्ने पलटे। दूसरे पन्ने पर एक फोटो थी — मेरी। अखाड़े में, मिट्टी में खड़ा हुआ। वो फोटो किसने ली? कब ली?

"भाई," टिंकू ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "ये अख़बार तो आज सुबह छपा होगा। पर हमने तो किसी को नहीं बताया।"

"मैंने बताया," मीरा ने कहा। वो गाड़ी से उतर चुकी थी और मेरे पास खड़ी थी। "मैंने कल रात शहर के एक अख़बार वाले को सब कुछ भेज दिया था। मेरे पास सबूत थे — लैब की रिपोर्ट, बोतल की फोटो, सब कुछ। मैंने सोचा कि अगर एक बार अख़बार में आ गया, तो कोई इसे दबा नहीं पाएगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी आँखों में वो चमक थी जो जीत के वक़्त होती है। पर उसके हाथ काँप रहे थे। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया, बिना सोचे। वो झटका नहीं हुई। उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया।

भीड़ में से एक आवाज़ आई — ऊँची, साफ़, और बिलकुल बेपरवाह। "वीर सिंह कहाँ है? मैं उससे मिलना चाहता हूँ।"

मैं पलटा। भीड़ चीरकर एक आदमी आ रहा था। कद में मेरे जितना, पर उसके कपड़े शहर के थे — पैंट, शर्ट, और गले में कैमरा लटका हुआ था। उसने मुझे देखा और उसके चेहरे पर मुस्कान आई। पर वो मुस्कान उस तरह की नहीं थी जैसे कोई दोस्त मिलता है। वो मुस्कान उस तरह की थी जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को देखकर मुस्कुराता है।

"वीर सिंह?" उसने कहा, और मेरे सामने आकर रुक गया। "मैं शहर से आया हूँ। 'दैनिक सच' अख़बार का रिपोर्टर हूँ। नाम है राघव।" उसने अपना हाथ बढ़ाया। मैंने नहीं पकड़ा। उसने हाथ वापस किया और हँसा। "ठीक है, हाथ बाद में। पहले बताओ — तुम्हारे पापा शेर सिंह ज़िंदा हैं ना? मुझे उनसे मिलना है।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। "क्या?" मैंने कहा।

"तुम्हारे पापा," राघव ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो भैरव की आवाज़ में होती थी। "शेर सिंह। जिन्हें बीस साल पहले मरा हुआ मान लिया गया था। जो अभी तुम्हारे घर में हैं। मुझे उनका इंटरव्यू चाहिए। और तुम्हारा भी।"

मेरे पीछे रामलाल की छड़ी की आवाज़ आई। वो गाड़ी से उतर रहे थे, कालू काका का हाथ पकड़कर।

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