Spirit of a Fighter – Chapter 680
मैं रुका।
वो कोई औरत थी। बूढ़ी। सिर पर सफ़ेद बाल, कंधों पर शॉल। वो मिट्टी में हाथ डालकर उसे छान रही थी। जैसे कोई बच्चा रेत से खेलता है।
मैंने एक कदम आगे रखा। मिट्टी चरमराई।
वो रुकी। पलटी।
और मैंने उसका चेहरा देखा।
वो चेहरा मैंने पहले कभी नहीं देखा था, पर उस चेहरे पर एक निशान था — माथे पर, बालों के नीचे, एक पुराना जला हुआ निशान। और वो निशान मैंने पापा के चेहरे पर देखा था। उसी जगह। उसी आकार का।
"तू आ गया," उसने कहा। उसकी आवाज़ में कोई डर नहीं था। फ़र्क़ पड़ता है। बैठ जा।"
मैंने अपनी जगह नहीं छोड़ी।
उसने मुस्कुराकर कहा, "तेरे पापा ने भी पहली बार मुझसे मिलते वक़्त यही किया था। खड़े रहे, बैठे नहीं। बोले — 'पहले बताओ तुम कौन हो।'"
मेरी नाक में वो गंध तेज़ हुई। पापा की गंध। पर उसमें कुछ और मिला हुआ था। मिट्टी। और उसके नीचे एक हल्की, ठंडी महक — जो मैंने आज से पहले कभी नहीं सूँघी थी।
"तुम कौन हो?" मैंने कहा।
उसने अपने हाथ से माथे का बाल हटाया। जले हुए निशान पर उँगली रखी। "ये निशान तेरे पापा के माथे पर भी है। उस रात जब वो जले, मैं उनके साथ थी।"
मेरा साँस रुक गया।
"मैं उन्हें बचाने आई थी," उसने कहा। "पर आग मेरे पहले ही लग गई थी। मैंने उन्हें खींचकर बाहर निकाला। इसलिए वो ज़िंदा हैं।"
वो उठी। उसकी कमर झुकी हुई थी, पर उसने मेरी तरफ़ देखा। आँखें साफ़ थीं। धुँधली नहीं।
"मेरे पास तेरे पापा का एक संदेश है," उसने कहा। "जो उन्होंने उस रात मुझे दिया था। बीस साल से मैं उसे नहीं खोल पाई। आज खोलूँगी।"
उसने अपनी शॉल के नीचे से एक लाल कपड़े में लिपटी चीज़ निकाली। खोला।
अंदर एक छोटा पीतल का डिब्बा था। उसने ढक्कन खोला। अंदर एक काग़ज़ था, मोड़ा हुआ। पुराना, पीला, किनारों से फटा। और उसके साथ एक छोटी सी चीज़ — एक बाली।
मैंने देखा। वो बाली सोने की नहीं थी। लोहे की थी। और उस पर एक निशान खुदा था — आधा चाँद।
"ये किसकी बाली है?" मैंने पूछा।
औरत ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने बीस साल के सफ़र में किसी की आँखों में नहीं देखा था। दर्द नहीं। हार नहीं। कुछ और।
"ये भैरव की माँ की बाली है," उसने कहा।
मेरा माथा ठंडा हो गया।
"भैरव की माँ?" मैंने धीरे से कहा। "पर माधव सिंह…"
"माधव उसका बाप नहीं है," उसने कहा। "माधव ने भैरव को अपना बेटा कहा, पर वो उसका बेटा नहीं है। भैरव की माँ किसी और की थी। और वो औरत…"
वो रुकी। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"…वो औरत मैं हूँ।"
मेरा पैर पीछे हटा। मिट्टी फिसली।
"मैं भैरव की माँ हूँ," उसने कहा। "और तेरे पापा ने बीस साल पहले मुझे इसलिए बचाया था क्योंकि मैंने उन्हें बताया था कि भैरव मेरा बेटा है और माधव उसे ज़हर बनाने के लिए पाल रहा है।"
लालटेन की लौ हवा में काँपी।
"तेरे पापा ने मुझसे वादा किया था," वो बोली, "कि जिस दिन भैरव का सच खुलेगा, उस दिन मैं सामने आऊँगी। और आज वो दिन है।"
मैंने काग़ज़ की तरफ़ देखा। वो मेरे हाथ में था। पीतल के डिब्बे से मैंने खुद निकाला था, याद नहीं कब।
मैंने उसे खोला।
उसमें पापा की लिखाई थी — वही चिपचिपी, तिरछी लिखाई जो रजिस्टर में थी। दो लाइनें थीं।
"वीर, ये औरत तेरी माँ नहीं है। पर ये भैरव की माँ है। इसे सबके सामने खड़ा करना। सच सिर्फ़ आँखों से नहीं, दिल से भी देखा जाता है। और भैरव को बताना — उसका बाप उसे ज़हर नहीं देना चाहता था। उसका बाप उसे बचाना चाहता था। पर उसका बाप डर गया था। इसलिए वो भाग गया। और भैरव ने उस डर को अपना बाप समझ लिया।"
मैंने काग़ज़ मोड़ा। औरत मेरी तरफ़ देख रही थी।
"तेरे पापा से मिलना है?" मैंने पूछा।
उसकी आँखें भर आईं। "बीस साल से उसी इंतज़ार में हूँ," उसने धीरे से कहा। "पर वो सामने नहीं आते। पता है क्यों? क्योंकि वो जानते हैं कि जिस दिन मैं सामने आऊँगी, उस दिन भैरव की पूरी दुनिया उलट जाएगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके सफ़ेद बाल, झुकी कमर, और वो हाथ जो अभी मिट्टी छान रहे थे। और मुझे अचानक बीस साल का एक सन्नाटा सुनाई दिया — वो सन्नाटा जो किताबों में नहीं होता, वो सन्नाटा जो औरतें सहती हैं।
"अंदर चलो," मैंने कहा। "घर चलो। माँ से मिलो।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। पहली बार उसकी आवाज़ काँपी। "तेरी माँ को मुझसे बात करनी होगी?"
"माँ को तुमसे बात करनी ही नहीं होगी," मैंने कहा। "माँ तुम्हें देखकर चुप हो जाएगी। मैं जानता हूँ। माँ उस तरह देखती है।"
हम पलटे।
पर तभी अखाड़े के फाटक पर किसी ने आवाज़ दी।
"रुको।"
मैं पलटा।
मीरा थी। दौड़ती हुई आ रही थी। उसके हाथ में कुछ था।
"वीर," उसने हाँफते हुए कहा, "अभी-अभी पता चला। सुक्खी बुआ ने बताया कि भैरव अपने सारे आदमियों को रात में बुला रहा है। तहखाने के पास।"
"कितने?" मैंने पूछा।
"पता नहीं," मीरा ने कहा। "पर सुक्खी बुआ ने कहा कि उनमें से कुछ लोगों के हाथ में कुल्हाड़ियाँ हैं।"
मैंने उस औरत की तरफ़ देखा। भैरव की माँ की तरफ़।
"तुम अंदर जाओ," मैंने कहा। "माँ के पास। अभी।"
उसने एक बार मेरी तरफ़ देखा। फिर मीरा की तरफ़। फिर उसने अपनी शॉल कसी और अंधेरे में चल पड़ी।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। "तुम टिंकू के साथ घर जाओ।"
"नहीं," उसने कहा।
"मीरा—"
"नहीं," उसने कहा। और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मैंने पहली बार सुनी थी। "तुमने कहा था तुम अकेले नहीं हो। अब मेरी बारी है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। बालों में उलझी राख। कपड़ों पर मिट्टी। और आँखों में वो साफ़ नज़र जो कह रही थी — मैं यहाँ हूँ।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर तुम पीछे रहोगी।"
हम चले। अखाड़े से बाहर, नहर की तरफ़। रास्ते में मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। आधी जली रोटी अभी भी वहाँ थी। मैंने उसे मुट्ठी में कस लिया।
रात ठंडी थी। पर मेरी हथेलियाँ पसीने से गीली थीं। हवा में उस तहखाने की लाल मिट्टी की गंध आ रही थी, और उसके नीचे कुछ जला हुआ।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मेरे बराबर चल रही थी। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। बस चलती रही।
और तभी दूर, तहखाने की तरफ़ से, एक आवाज़ आई। कई आवाज़ें। धीमी। एक साथ। जैसे कोई मंत्र पढ़ रहा हो।
मैं रुका।
वो आवाज़ें कुछ और नहीं थीं। वो भैरव के आदमी थे। और वो जो पढ़ रहे थे, वो मंत्र नहीं था।
वो गिनती थी।
एक। दो। तीन। चार। पाँच।
मैंने मीरा की कलाई पकड़ी और उसकी हथेली में अपनी आधी जली रोटी रख दी। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"ये क्या है?" उसने धीरे से पूछा।
"माँ का हाथ," मैंने कहा। "अगर मैं वापस न आऊँ, तो ये उन्हें देना। और कहना — रोटी जल गई थी, पर हाथ का निशान नहीं जला।"
मीरा की आँखें भर आईं। उसने रोटी अपनी हथेली में कस ली।
और तहखाने की तरफ़ से गिनती पूरी हुई।
दस।
फिर सन्नाटा।
फिर भैरव की आवाज़ आई, बहुत शांत, जैसे कोई कब्र पर फूल रख रहा हो।
"वीर सिंह। मैं जानता हूँ तू सुन रहा है। मेरी माँ को लेकर आया है ना? तो ले आ। पर याद रख — आज रात यहाँ से जो ज़िंदा निकलेगा, वो कल के मुकाबले में नहीं लड़ेगा। वो सिर्फ़ बचेगा। और बचे हुए आदमी को पहलवान नहीं कहते।"
मैंने अपनी मुट्ठी कसी। मेरे पैरों के नीचे मिट्टी थी — गीली, ठंडी, जानी-पहचानी।
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