Spirit of a Fighter – Chapter 663
माँ चूल्हे के पास बैठी थीं। उनके सामने आटे की लोई रखी थी, पर हाथ स्थिर थे। वो रोटी बना रही थीं, पर उनकी आँखें मुझ पर थीं।
"काग़ज़ पढ़ लिया?" उन्होंने पूछा।
"पढ़ लिया।"
"क्या लिखा था?"
"कि अलमारी खाली है। अब सच सिर्फ़ उस आदमी के पास है जो जला हुआ है।"
माँ ने बेलन रख दिया। उन्होंने अपने हाथ आँचल में पोंछे और मेरी तरफ़ मुड़ीं। "वो काग़ज़ किसने लाया, ये तो तेरी नाक ने भी नहीं पकड़ा?"
मैं चुप रहा।
"मैंने तुझे सिखाया था ना," उन्होंने कहा, "कि हर चीज़ नाक से नहीं पकड़ी जाती। कुछ चीज़ें आँखों से पकड़ी जाती हैं।" उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "वो आदमी जो काग़ज़ दे गया, उसके हाथ पर एक निशान था। जला हुआ। पीतल का। छोटा-सा।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। "त्रिकोण और बिंदु?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ हिला। "तूने भी देखा?"
"पुल पर। एक आदमी भागा था। उसके माथे पर वही निशान था।"
माँ ने अपनी आँखें बंद कर लीं। वो कुछ देर ऐसे ही बैठी रहीं। फिर उन्होंने आँखें खोलीं और बहुत धीरे से कहा, "बंसी।"
"क्या?"
"वो निशान भैरव के आदमियों का नहीं है। वो माधव सिंह के खानदान का निशान है। जो उसके सबसे बड़े बेटे के माथे पर जलाया जाता था — जिसे वो अपना वारिस बनाता था।" उन्होंने चूल्हे में घास डाली और आग भड़की। "माधव ने ये निशान भैरव के माथे पर जलाया था। फिर राघव के माथे पर। फिर रघुवीर के माथे पर। चार बेटे थे। चारों के माथे पर।"
"तो बंसी…"
"बंसी सबसे छोटा था। माधव ने उसके माथे पर निशान जलाया ही नहीं।" माँ की आवाज़ सपाट हो गई। "क्योंकि उस रात शेर सिंह ने माधव का हाथ पकड़ लिया था। उसने कहा था — बच्चों पर क्यों? बच्चों का क्या कसूर? और फिर अगली सुबह शेर सिंह जल रहा था। और बंसी गायब।"
मैंने अपने हाथ मेज़ पर रखे। वो काँप रहे थे। "माँ, मतलब बंसी ज़िंदा है? और वो हमें चंबल से रोक रहा है?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "या फिर वो तुझे चंबल भेज रहा है। तरकीब से। जैसे कोई चिड़िया को दाना दिखाकर पिंजरे की तरफ़ बुलाता है।"
रात गहरी हो रही थी। आँगन में झींगुर बोल रहे थे। मैंने अपने हाथ सिकोड़े और बोला, "माँ, मुझे चंबल जाना है। दीनू ने बुलाया है। वो मर सकता है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "दीनू मर सकता है, हाँ।" उन्होंने रोटी उठाई और सीधी आँच पर रख दी। "पर तू मरेगा तो ये आँगन सूना हो जाएगा।"
वो चुप हो गईं। रोटी फूलने लगी। उन्होंने उसे पलटा और फिर बोलीं, "जब जाना है तो जा। पर मेरी एक बात मान — भूखा मत जाना।"
फिर वो उठीं और दीवार पर टँगी पुरानी अलमारी खोलने लगीं। मैंने उन्हें रोका नहीं।
सुबह साढ़े तीन बजे मैं उठा। माँ पहले से जाग रही थीं। चूल्हे पर कढ़ाई रखी थी और उसमें गुड़ पिघल रहा था। उन्होंने मुझे बैठने का इशारा किया और एक कटोरी में गुड़ और भुना चना निकाला।
"ये तेरे हाथ में बाँध दूँगी," उन्होंने कहा। "भूखा आदमी सोच नहीं पाता। इसलिए खाते चलना। रास्ते में जब भी हिम्मत टूटे, एक चुटकी मुँह में डाल लेना।"
मैंने अपना हाथ बढ़ाया। माँ ने कपड़े में गुड़-चना बाँधकर मेरी कलाई पर एक मज़बूत गाँठ लगाई। उनके हाथ ठंडे थे, पर गाँठ जैसे मेरे अंदर तक बँध गई।
तभी गुड़िया की आवाज़ आई। "भैया।"
वो दरवाज़े पर खड़ी थी, आँखें आधी सोई हुईं, बाल उलझे हुए। उसने अपनी थैली मेरी जेब में डालते हुए कहा, "ये अखाड़े की मिट्टी है। रात में मैंने जाकर भरी है। जब डर लगे तो इसे मुठ्ठी में दबा लेना।"
मैंने उसका सिर सहलाया। "तू ऐसे ही बड़ी हो जा, गुड़िया।"
"मैं बड़ी हो जाऊँगी," उसने कहा। "पर तब तक तू जीते रहना।"
माँ ने कुछ नहीं कहा। सिर्फ़ मेरे माथे पर हल्दी का टीका लगाया और पीछे हट गईं।
मीरा और टिंकू बाहर तैयार खड़े थे। मीरा के कंधे पर बैग था, हाथ में नक़्शा। टिंकू के हाथ में मिठाई की डिब्बी, और उसके सिर पर टोपी, कान के पीछे पेंसिल। जैसे वो कसरत के लिए नहीं, दुकान खोलने जा रहा हो।
"चलो," मैंने कहा।
हम निकले। गाँव की गलियाँ सूनी थीं। सिर्फ़ कुत्ते भौंके और चले गए। नहर के रास्ते पर चलते हुए मीरा ने नक़्शा खोला।
"दीनू का गाँव तीन पहाड़ियों के पार है," उसने दबी आवाज़ में कहा, उँगली नक़्शे पर चलाते हुए। "रास्ते में एक पुराना पुल है — लोहे का, टूटा हुआ। उसी पुल पर भैरव के आदमी चौकी लगाए बैठे हैं। ये रास्ता सीधा है, पर ख़तरनाक।"
"और दूसरा रास्ता?" मैंने पूछा।
"नहर के किनारे-किनारे। दो घंटे ज़्यादा। पर वहाँ पहरा नहीं।" उसने नक़्शा बंद किया। "पर वहाँ कीचड़ है। और रात में कीचड़ फिसलन भरा होता है।"
टिंकू ने डिब्बी ऊपर उठाई। "मैं पहले वाला रास्ता चुनता हूँ। दूसरे में अगर मैं फिसला, तो ये मिठाई गारंटी से खराब।"
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा। "तुम्हारी मिठाई की फ़िक्र समझ में आती है, पर पहले वाले रास्ते पर पहरा है।"
"तो क्या हुआ?" टिंकू बोला। "पहरा देने वाले भी इंसान हैं। और इंसान को मिठाई पसंद होती है।"
मैं रुक गया।
"टिंकू," मैंने कहा, "तू गंभीर है?"
"भाई, मैं जितना गंभीर दिखता हूँ, उतना हूँ नहीं।" उसने मुस्कुराकर कहा। "पर एक बात सोच — अगर चौकी पर दो आदमी बैठे हैं और उन्हें कोई मिठाई वाला मिले, तो वो उसे रोकेंगे या पूछेंगे — 'भाई क्या है सामान में?' और मैं कहूँगा — 'खीर की डिब्बी है, गाँव के मंदिर में भोग चढ़ाने जा रहा हूँ।' और फिर मैं उन्हें एक-एक लड्डू दे दूँगा। और वो खाते-खाते हमें जाने देंगे।"
मीरा कुछ कहने लगी, फिर चुप हो गई। फिर उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई। "तुम पागल हो।"
"और तुम अब तक ये नहीं जानती थीं?" टिंकू बोला।
मैंने सोचा। फिर बोला, "नहीं। हम दूसरे रास्ते से जाएँगे।"
टिंकू का चेहरा लटक गया। "पर भाई…"
"पर तू गलत नहीं बोला," मैंने कहा। "उस पुल पर अगर कोई मिला, तो मिठाई काम आएगी। पर हम उस पुल पर जाएँगे ही क्यों, जब दूसरा रास्ता खुला है?"
टिंकू ने सोचा। फिर सिर हिलाया। "ठीक है, मान लिया। पर फिसलना मत।"
हम नहर के किनारे-किनारे चले। रात की हवा में पानी की गंध थी। मेरी जेब में गुड़िया की थैली थी। कलाई पर माँ का गुड़-चना बँधा था। और सीने में वो बात, जो माँ ने कान में कही थी — जो अभी भी मेरे भीतर गरम थी।
टिंकू मेरे बगल में चल रहा था। डिब्बी उसके हाथ में झूल रही थी। वो कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, "भाई, एक बात कहूँ?"
"कह।"
"जब हम दीनू को ढूँढ लेंगे और सब ठीक हो जाएगा, तो मैं उस बूढ़े को ये मिठाई खिलाऊँगा।"
मीरा ने मुस्कुराकर कहा, "पहले उसे मनाना तो सही। वो अभी तक हमसे बोला भी नहीं है।"
टिंकू ने सिर हिलाया। "मनाना पड़ेगा। बूढ़े लोग मिठाई देखकर नरम पड़ जाते हैं। मेरी माँ भी पड़ती है।"
मैं चुपचाप चलता रहा। मेरा मन माँ की जली रोटी के पास था। वो आधी जली रोटी जो उन्होंने जानबूझकर चूल्हे पर छोड़ी थी — मुझे याद दिलाने के लिए कि घर में कोई इंतज़ार कर रहा है। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। गुड़िया की थैली उँगलियों में आई। मिट्टी की गंध। अखाड़े की लाल मिट्टी। मेरी आँखें भर आईं।
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