Spirit of a Fighter649 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 649

6 min read November 5, 2026

"ठीक है," उसने कहा। "पर एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"अगर कल अदालत में सब कुछ खत्म हो जाए, तो मेरी मिठाई का क्या होगा?"

मैं हँस पड़ा। पहली बार कई दिनों में हँसा। टिंकू ने भी हँसी छोड़ दी, पर उसकी आँखों में डर था।

"तेरी मिठाई," मैंने कहा, "जीतने वाले पहलवान के मुँह में जाएगी। ये तूने खुद कहा था।"

"तो पहलवान जीतेगा ना, भाई साहब?"

"जीतेगा," माँ ने पीछे से कहा। "अब जा।"

रास्ते में टिंकू बहुत बोला। जब वो डरता है, तो बहुत बोलता है। ये मैं जानता हूँ। बचपन से जानता हूँ। जब स्कूल में मास्टर उसे डंडा दिखाते थे, तो वो बोलता रहता था — सर, मेरी कॉपी घर रह गई, सर, कल से पक्का लाऊँगा, सर, मेरी माँ बीमार है। और मास्टर डंडा रख देते थे। टिंकू का हथियार बोलना है। जब डर लगता है, वो बोलता है।

"भाई साहब, वो जो बल्ली ने कहा — अपना खून रास्ता रोकेगा — उसका मतलब क्या है? मेरा मतलब, मुझे तो लगता है कि ये सब बकवास है। बाप बेटे का रास्ता क्यों रोकेगा? बाप तो बेटे के लिए मरता है। मेरी माँ तो मेरे लिए—"

"टिंकू।"

"हाँ भाई साहब।"

"चुप कर।"

वो चुप हो गया। दो कदम चला। फिर फिर बोला।

"पर भाई साहब, एक बात—"

"टिंकू!"

"माफ़ करो, सॉरी, बस एक आख़िरी बात।" उसने अपनी आवाज़ धीमी की। "तुम्हारे पापा जो जले हुए हैं… वो अगर अदालत में आए, तो तुम उन्हें रोक पाओगे?"

मैं रुक गया।

ये बात मेरे दिल में लगी। मैं सोच भी नहीं रहा था इस बारे में। मैं सिर्फ़ भैरव के बारे में सोच रहा था, माधव के बारे में, अदालत के बारे में। पर ये सवाल — कि अगर मेरे अपने पापा मेरे खिलाफ़ खड़े हों, तो मैं क्या करूँगा — ये मैंने अपने आप से कभी नहीं पूछा।

"पता नहीं," मैंने कहा।

टिंकू ने कुछ नहीं कहा। और यही उसका सबसे बड़ा सवाल था। जब टिंकू चुप हो जाए, तो समझ लो बात गंभीर है।

मीरा के घर की सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त मेरी साँस फूल रही थी। मैंने दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से आवाज़ नहीं आई। फिर दरवाज़ा खुला, और मीरा खड़ी थी — छोटे बाल बिखरे, आँखों पर थकान, और हाथ में काग़ज़ों का बंडल।

"तुम्हें कब से नींद नहीं आई?" मैंने पूछा।

वो मुस्कुराई। एक छोटी-सी मुस्कान, जैसे किसी ने बंद किताब के पन्नों के बीच से रोशनी दिखाई हो।

"तुम्हें कब से आई है?" उसने जवाब दिया और दरवाज़ा पूरा खोल दिया।

उसका कमरा काग़ज़ों से भरा था। फ़र्श पर, मेज़ पर, बिस्तर पर — हर जगह काग़ज़। कोई पुराना, कोई नया। दीवार पर एक बड़ा-सा काग़ज़ चिपका था जिस पर उसने खुद कुछ लिखा था। मैंने पढ़ा — "माधव सिंह — कब क्या कहा" और नीचे तारीख़ों की लिस्ट।

"तुम ये सब कर रही थीं?" मैंने कहा।

"अदालत में अंदाज़े नहीं चलते," उसने कहा और मेज़ पर से कुछ काग़ज़ हटाए। "यहाँ बैठो।"

मैं बैठा। टिंकू दरवाज़े पर खड़ा रहा।

"बैठ जा टिंकू," मीरा ने कहा।

"मैं… मैं खड़ा ही ठीक हूँ," टिंकू ने कहा। "अरे, तुम्हारे कमरे में इतने काग़ज़ कि पैर रखने की जगह नहीं। कहीं मैं किसी ज़रूरी काग़ज़ को पैर से—"

"टिंकू, बैठ जा," मैंने कहा।

वो बैठ गया। बिस्तर के कोने पर, सावधानी से, जैसे बिस्तर भी काग़ज़ का हो।

मैंने अपनी जेब से दोनों काग़ज़ निकाले। भैरव का प्लान वाला — जिसमें तीन पहलवानों के नाम थे — और पापा का काग़ज़ जो टूटी घड़ी के पीछे से मिला था।

मीरा ने पहले वो काग़ज़ पढ़ा जो पापा का था। धीरे पढ़ा। हर लाइन पर रुकी। दो बार वो पीछे लौटी और फिर पढ़ा।

"तेरे पापा ने ये लिखा है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी थी, "कि 'अगर मैं न रहूँ, तो मेरा बेटा इस ज़हर को पानी में नहीं, मिट्टी में डालेगा।'"

"हाँ।"

"तुम्हारे पापा जानते थे कि वो मरेंगे।"

"जानते थे।"

मीरा ने काग़ज़ नीचे रख दिया। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी — डर नहीं, दया नहीं, कुछ और। जैसे किसी ने उसके सामने एक दरवाज़ा खोल दिया हो जिसे वो बहुत दिनों से ढूँढ रही थी।

"वीर," उसने कहा, "तेरे पापा ने सिर्फ़ ज़हर का सच नहीं लिखा। उन्होंने ये भी लिखा है कि 'माधव ने मुझे जलाया, पर माचिस रघुवीर के हाथ में थी।'"

मैं ठिठक गया।

"क्या?"

"देखो।" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ सरकाया और उँगली एक लाइन पर रखी। मैंने पढ़ा। मेरी आँखें उन शब्दों पर अटक गईं।

"माचिस रघुवीर के हाथ में थी।"

मेरा दिमाग़ घूम गया। रघुवीर — मेरा मामा। जिसने कहा था कि वो मेरी माँ का भाई है। जो अदालत में भैरव का वकील बना। जिसने मीरा को धमकाया — "मीरा को छूना मत।" जो बीस साल से माधव के डर से चुप था।

"मतलब," मैंने धीरे से कहा, "रघुवीर सिर्फ़ गवाह नहीं था। वो… वो शामिल था।"

"शामिल नहीं," मीरा ने कहा। "ये शब्द आसान है। असल में देखो।" उसने एक और लाइन दिखाई। "तेरे पापा ने लिखा है — 'रघुवीर ने माचिस जलाई, पर उसने मुझे बचाया भी। जब मैं जल रहा था, तो वो भागा नहीं। वो पानी लाया। उसने मेरी आधी जान बचाई। पर उसने माधव को रोका नहीं।'"

कमरे में चुप्पी छा गई।

टिंकू ने अपनी टोपी उतार ली। ये उसका सबसे बड़ा सम्मान है — जब वो किसी बात को गंभीरता से लेता है, तो टोपी उतार देता है।

"तो रघुवीर," मैंने कहा, "आधा दुश्मन है और आधा… क्या?"

"आधा वो आदमी है," मीरा ने कहा, "जो बीस साल से अपने ही जले हुए दोस्त की दवा बना रहा है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तुम्हें कैसे पता?"

"क्योंकि यही तो वो कर रहा है," मीरा ने कहा और उठकर दीवार के पास गई। "सोचो। रघुवीर ने तेरे पापा को ज़िंदा रखा। बीस साल। उनकी दवा बनाई। उन्हें छुपाया। अगर वो पूरा दुश्मन होता, तो उन्हें मरने देता। पर उसने नहीं दिया।"

"तो फिर उसने मेरे पापा को जलाया क्यों?"

मीरा कुछ देर चुप रही। फिर बोली।

"शायद उसके पास कोई रास्ता नहीं था। शायद माधव ने उसे चुनने पर मजबूर किया — या तू माचिस जला, या तेरा पूरा परिवार मरेगा।"

मेरे हाथ मेज़ पर रखे थे। वो काँप रहे थे। मैंने उन्हें मेज़ से दबा दिया।

"मुझे उससे मिलना है," मैंने कहा।

"किससे? रघुवीर से?"

"हाँ।"

"वीर, वो हमारा दुश्मन है—"

"वो मेरा मामा है," मैंने कहा। "और उसने मेरे पापा की जान बचाई है। मुझे उससे पूछना है कि उस रात क्या हुआ था। क्यों उसने माचिस जलाई। क्यों उसने माधव को रोका नहीं। और क्यों आज वो भैरव का वकील बना हुआ है।"

मीरा मेरे सामने खड़ी हो गई।

"अगर तुम उसके पास जाओ और उसने तुम्हें बंधक बना लिया—"

"तो तुम मुझे बचा लेना," मैंने कहा। "तुम मेरी वकील हो ना?"

मीरा की आँखें बड़ी हो गईं। मैंने पहली बार उसे ऐसे देखा। वो कुछ ऐसा देख रही थी जो उसे उम्मीद नहीं थी।

"तुम मुझे वकील कह रहे हो?" उसने धीरे से पूछा।

"तुम्हारे सिवा और कौन है?" मैंने कहा।

वो कुछ देर चुप खड़ी रही। फिर उसने मेरे सामने काग़ज़ रखा और उँगली एक लाइन पर रखी।

"यहाँ," उसने कहा। "भैरव का प्लान। तीन पहलवान। बल्ली, बड़ा और बीच वाला। पर ये देखो — नीचे एक आख़िरी लाइन है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "यहाँ लिखा है — 'अगर तीनों नाकाम रहें, तो मीरा के पास जाना। उसे डराना। अगर वो डर गई, तो वीर खुद हार जाएगा।'"

मेरे अंदर कुछ ठंडा सा फैल गया।

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