Spirit of a Fighter – Chapter 645
शाम को मैं घर लौटा। आँगन में गुड़िया बैठी थी, उसकी कॉपी खुली थी, पर वो पढ़ नहीं रही थी। वो सामने दीवार को देख रही थी।
मैं उसके पास बैठ गया।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"भैया," उसने कहा। "जब तुम लड़ने जाओगे, तो मैं कहाँ रहूँगी?"
"घर में। माँ के पास।"
"और अगर तुम हार गए तो?"
मैं चुप हो गया।
"तो क्या हमें ये घर छोड़ना पड़ेगा?" उसने पूछा। "मेरा स्कूल? मेरी कॉपियाँ? मेरी थैली?"
मैंने उसकी उँगली पकड़ी।
"गुड़िया," मैंने कहा। "मैं हारूँगा नहीं।"
"पर अगर—"
"सुन," मैंने कहा। "तूने मुझे मिट्टी दी थी न? वो थैली।"
उसने सिर हिलाया।
"वो मिट्टी मेरे पास है," मैंने कहा। "मैंने उसे अपने माथे पर लगाया है। और जब मैं मुकाबले में उतरूँगा, तो वो मिट्टी मेरे साथ होगी। तू मेरे साथ होगी। हर पल।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था, पर वो रोई नहीं।
"वादा?" उसने पूछा।
"वादा," मैंने कहा।
वो उठी और दौड़कर अंदर चली गई। फिर लौटी — उसके हाथ में एक छोटी सी पोटली थी।
"ये मैंने आज सुबह भरी थी," उसने कहा। "अखाड़े की मिट्टी। नई। कालू काका ने दी।"
मैंने पोटली खोली। उसमें लाल मिट्टी थी, और उसमें कुछ चमक रहा था — सोने जैसा।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"कालू काका ने कहा कि ये अखाड़े की सबसे पुरानी मिट्टी है," उसने कहा। "जो तहखाने के ऊपर की परत से आई है। उन्होंने कहा कि इसमें ताकत है।"
मैंने उस मिट्टी को अपनी हथेली पर रखा। वो गरम थी। और उसमें से एक गंध आ रही थी — पुरानी, मीठी, जैसे बारिश के बाद की मिट्टी।
मैंने उसे अपनी जेब में रख लिया।
रात को मैं चूल्हे के पास बैठा था। आग धीमी जल रही थी। माँ ने मेरे पास आकर बैठ गईं। उनके हाथ में एक कटोरी थी — गरम दाल। उन्होंने मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"खा ले," उन्होंने कहा।
"भूख नहीं है।"
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "फिर भी खा ले।"
मैंने कटोरी ली। दाल में नमक ठीक था।
"माँ," मैंने कहा। "पापा ने भी कभी शर्त लगाई थी?"
वो कुछ देर चुप रहीं। आग की लपटें उनके चेहरे पर नाच रही थीं।
"हाँ," उन्होंने कहा। "एक बार। बहुत बड़ी शर्त।"
"क्या?"
"उन्होंने कहा था कि अगर वो एक पहलवान को हरा देंगे, तो वो अखाड़े का मालिक बन जाएँगे। और अगर हार गए, तो अखाड़ा छोड़ देंगे।"
"तो क्या हुआ?"
माँ ने आग की तरफ़ देखा।
"वो हार गए," उन्होंने कहा। "उस दिन उनका घुटना टूट गया। पूरे अखाड़े ने देखा। माधव सिंह हँसे। भैरव ने ताली बजाई।"
मेरा हाथ रुक गया।
"पर वो हारकर भी जीते," माँ ने कहा।
"कैसे?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में आग की रोशनी थी।
"क्योंकि उन्होंने हारकर सच नहीं छोड़ा," उन्होंने कहा। "उसी रात उन्होंने मुझसे कहा — 'सरस्वती, मैं आज हारा हूँ, पर मैंने ये नहीं कहा कि मैं कल नहीं जीतूँगा।' और अगले दिन वो फिर अखाड़े में उतरे। घुटने पर पट्टी बाँधकर। और उस दिन उन्होंने उसी पहलवान को हराया।"
"पर फिर तो वो जीत गए?"
"हाँ," माँ ने कहा। "पर माधव ने उन्हें जीतने नहीं दिया। उसी रात ज़हर दे दिया।"
मैंने कटोरी रख दी।
"तो शर्त का कोई फ़ायदा नहीं?"
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा।
"फ़ायदा ये है," उन्होंने कहा, "कि तेरे पापा ने हारकर भी वो किया जो कोई नहीं कर सका — वो फिर उठे। और जब तक उठे रहे, तब तक उन्होंने सच की तरफ़ देखा। शर्त जीतने-हारने की नहीं है, बेटा। शर्त इस बात की है कि हार के बाद भी तू सच के साथ खड़ा रहेगा या नहीं।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। आग की रोशनी में उनका चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे बीस साल पुराना हो, और फिर भी आज का।
"माँ," मैंने कहा। "वो आदमी जो आज तहसील के पीछे दिखा — वो कौन था?"
वो चुप रहीं।
"माँ?"
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर मुझे ये पता है कि वो तेरे पापा नहीं है।"
"कैसे पता?"
"क्योंकि तेरे पापा की आँखों में जो आग थी, वो मरते वक़्त भी बुझी नहीं थी। और उस आदमी की आँखों में…" वो रुकीं। "उस आदमी की आँखों में बीस साल की थकान थी। जैसे वो किसी और की ज़िंदगी जी रहा हो।"
मैंने आग की तरफ़ देखा।
"तो वो क्यों कह रहा है कि वो मेरा पापा है?"
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया। पर उनके हाथ ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया।
उस रात मैं सो नहीं पाया। मैं आँगन में आया। चाँद आधा था, आसमान में बादल थे। मैं दीवार के पास बैठा और अपनी जेब से वो मिट्टी निकाली।
मैंने उसे सूँघा।
उसमें वो गंध थी — पुरानी मिट्टी, बारिश, और कुछ और। कुछ ऐसा जो मैंने पहले कभी नहीं सूँघा। जैसे कोई दवा। या जड़ी-बूटी। या…
मेरी आँखें फट गईं।
ये गंध मैंने पहले सुनी थी। आज सुबह। तहसील में।
वो आदमी — जो तहसील के पीछे गुज़रा था — उसके कपड़ों से यही गंध आ रही थी।
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था।
तभी मुझे कुछ दिखा। दरवाज़े के नीचे, फर्श पर, एक छोटी सी पुड़िया पड़ी थी। लाल काग़ज़ में लिपटी।
मैंने उसे उठाया। मेरे हाथ ठंडे हो गए।
मैंने लाल काग़ज़ खोला। अंदर सिर्फ़ राख थी। जली हुई, काली राख। और उस राख में एक काग़ज़ की पुड़िया थी जिस पर किसी ने लाल स्याही से लिखा था —
"जिस दिन तू अदालत जीतेगा, उस दिन तेरी माँ नहीं रहेगी।"
मेरे हाथ से पुड़िया गिर गई। राख आँगन में बिखर गई।
मैं पलटा। माँ की खिड़की में रोशनी जल रही थी। वो जाग रही थीं। मैं दौड़कर वहाँ गया।
"माँ!" मैंने दरवाज़ा खोला।
वो चारपाई पर बैठी थीं। उनके हाथ में एक कटोरी थी — मेरे लिए दाल। उन्होंने मुझे देखा और मुस्कुराईं।
"क्या हुआ?" उन्होंने पूछा। "सपना देखा?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। वो ठीक थीं। वो सामने थीं।
मैंने पुड़िया को अपनी जेब में दबा दिया।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस प्यास लगी थी।"
वो उठीं और पानी लेने गईं। मैं वहीं खड़ा रहा। मेरी आँखें उन पर टिकी थीं।
पर मेरे अंदर वो राख अभी भी जल रही थी।
सुबह होते ही मैंने मीरा को बुलाया। मैंने उसे वो पुड़िया दिखाई। उसने राख को उँगली पर लिया और सूँघा।
"ये जली हुई जड़ी-बूटी है," उसने कहा। "शायद कुछ ऐसा जो डर पैदा करने के लिए जलाया जाता है। जादू-टोना जैसा।"
"मैं जादू-टोने पर विश्वास नहीं करता," मैंने कहा।
"मैं भी नहीं," उसने कहा। "पर जो इसे भेज रहा है, वो चाहता है कि तू डरे।"
"तो वो जानता है कि मैं डरूँगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"वो जानता है," उसने कहा, "कि तेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी तेरी माँ है।"
मैं चुप हो गया।
"वीर," उसने मेरा हाथ पकड़ा। "मैं तेरे साथ हूँ। माँ के पास कालू काका और लुट्टन हैं। गुड़िया के पास टिंकू है। हम सब तैयार रहेंगे।"
"और अगर कुछ हो गया?"
"कुछ नहीं होगा," उसने कहा। "क्योंकि इस बार हम जानते हैं कि दुश्मन कौन है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो साफ़ सुबह थी जो हर बारीश के बाद आती है।
"तू बहुत ज़िद्दी है," मैंने कहा।
"मुझे पता है," उसने कहा। "और तू बहुत ज़िद्दी है।"
"मुझे भी पता है।"
वो हँसी। और उस हँसी में मेरे अंदर की राख थोड़ी ठंडी हुई।
तभी टिंकू दौड़ता हुआ आया।
"भाई!" उसने कहा। "भैरव के आदमी ने आज सुबह पंचायत के चबूतरे पर ढोल बजवाया है। सबको बुला रहे हैं। कह रहे हैं — भैरव जेल से फ़रमान भेज रहा है।"
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