Spirit of a Fighter – Chapter 638
मैं हँसा। पहली बार उस दिन में। और वो हँसी अजीब थी — जैसे किसी सूखे खेत में पानी आ गया हो।
हम घर की तरफ़ चले। रास्ते में टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा और धीरे से कहा, "भाई, कल मैं भी चलूँगा। मैं गवाही दूँगा।"
"क्या गवाही देगा तू?"
"मैं कहूँगा कि भैरव ने मेरी मिठाइयों में कभी ज़हर नहीं मिलाया, क्योंकि वो जानता था कि मैं तुम्हारा दोस्त हूँ।" उसने अपनी टोपी ठीक की। "मतलब, वो जानता था कि मैं कुछ जानता हूँ।"
मैं रुक गया। "टिंकू, ये तूने अभी सोचा?"
"हाँ।" वो मुस्कुराया। "मैं सोचने में तेज़ हूँ, भाई। बस कसरत कल से शुरू करूँगा।"
मैंने उसका कंधा थपथपाया। और मैंने सोचा — अगर कल तहसील में सब कुछ गड़बड़ हो गया, तो भी ये दोस्त और ये माँ और ये लड़की मेरे साथ खड़े होंगे। और उतना ही काफ़ी है।
पर जब हम घर के मोड़ पर पहुँचे, तो गुड़िया दौड़ती हुई आई। उसके हाथ में स्कूल की कॉपी थी, पर वो खुली हुई थी, और उसके पन्नों पर किसी ने लिखाई की थी — मोटी, काली स्याही में।
"भैया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो बच्चों की आवाज़ में तब आता है जब उन्हें कुछ ऐसा मिले जो उन्हें समझ न आए। "मैं स्कूल से लौट रही थी, तो रास्ते में मेरी कॉपी गिर गई। और जब मैंने उसे उठाया, तो इसमें ये लिखा हुआ था।"
मैंने कॉपी ली। पन्ने पर लिखा था, बड़े अक्षरों में —
"जाँच में पास होना है तो कल सुबह मंदिर के पीछे अकेला आ। वरना तेरी बहन की कॉपी में अगली बार खून होगा।"
मेरे हाथ में कॉपी काँपी। गुड़िया की आँखें मेरी आँखों में थीं, और उनमें पानी भर आया था।
माँ ने कॉपी पढ़ी। उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस गुड़िया का सिर अपने सीने से लगा लिया।
"वीर," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो ख़तरे में आती है, "ये जाल है। वो चाहता है कि तुम अकेले जाओ।"
मैंने कॉपी को देखा। फिर गुड़िया को। फिर माँ को।
"मैं जाऊँगा," मैंने कहा।
"वीर —"
"मैं अकेला नहीं जाऊँगा," मैंने कहा, और मैंने मीरा की तरफ़ देखा। "पर मैं जाऊँगा। क्योंकि अगर मैं नहीं गया, तो वो समझेगा कि मैं डर गया। और जो डर गया, वो कल तहसील में कैसे खड़ा होगा?"
मैंने गुड़िया के सिर पर हाथ रखा। "और गुड़िया — तू आज रात माँ के साथ सोएगी। मेरे पास।"
गुड़िया ने अपनी आँखें पोंछीं। "भैया, तुम उन सबको पछाड़ दोगे। मुझे पता है।"
मैंने अपना सिर हिलाया। और मैंने कॉपी अपनी जेब में रखी, और मुझे लगा कि मेरी जेब अब बहुत भारी हो गई है — एक चिट्ठी, एक पर्ची, और एक कॉपी। तीनों काग़ज़। और तीनों में मौत का नाम लिखा था।
मैं घर के अंदर गया, और मैंने अपना पीतल का ढक्कन उठाया जो माँ ने दिया था। उसके अंदर रघुवीर की पुरानी पर्ची रखी, और चिट्ठी, और गुड़िया की कॉपी। और मैंने उसे अपने सीने से लगाया, जैसे कोई अपनी माँ का आशीर्वाद सीने से लगाता है।
बाहर आँगन में मीरा खड़ी थी। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी आँखों में वो बात थी जो वो कभी ज़ुबान से नहीं कहती।
"कल सुबह," उसने कहा, "मैं तुम्हारे साथ तहसील जाऊँगी। और मैं अपने पिता को भी लाऊँगी।"
"और अगर हम हार गए?"
वो मेरे पास आई। उसने मेरा हाथ पकड़ा, और उसकी उँगलियाँ अब ठंडी नहीं थीं। "तो हम हारेंगे नहीं," उसने कहा। "क्योंकि जिसके पास सच हो, वो हारता नहीं। वो सिर्फ़ थकता है। और फिर उठता है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा, और मुझे लगा कि मेरे अंदर कुछ ऐसा जगा है जो अब तक सो रहा था।
तभी आँगन के बाहर से किसी के चलने की आवाज़ आई। भारी कदम। हम सब पलटे।
दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा था। लंबा, काला चोगा, हाथ में लाठी। उसका चेहरा जला हुआ था — आधा चेहरा, और आधी ज़ुबान। पर उसकी आँखें… उसकी आँखें मेरी आँखों जैसी थीं।
शेर सिंह।
वो खुद चलकर आए थे। पहली बार। बीस साल बाद।
और उनके हाथ में एक लाल कपड़े में लिपटी चीज़ थी।
"बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ कर्कश थी, जैसे किसी पुराने ताले की चाबी घूम रही हो। "कल तहसील में ये दिखाना। ये वो असली दस्तावेज़ है जो माधव ने मुझसे छीना था — अखाड़े की ज़मीन का, जिस पर मेरा नाम है, और तेरा।"
मैंने वो लाल कपड़ा खोला। अंदर एक पुराना रजिस्टर था, जिसके पन्ने पीले पड़ गए थे, और पहले पन्ने पर मेरे पिता का नाम लिखा था — शेर सिंह — और उसके नीचे, छोटे अक्षरों में, मेरा नाम — वीर सिंह।
मेरी आँखें भर आईं। मैंने अपने पिता की तरफ़ देखा, और वो मुस्कुराए — आधे चेहरे से, जो जला नहीं था।
"अब तेरे पास काग़ज़ हैं, बेटा," उन्होंने कहा। "अब लड़।"
॥
"अब लड़।"
पापा के मुँह से ये दो शब्द निकले, और मुझे लगा जैसे बीस साल की चुप्पी टूट गई हो। उनका आधा चेहरा जला हुआ था, आधी ज़ुबान काम नहीं करती थी, पर उनकी आँखों में वो आग थी जो किसी जले हुए आदमी की आँखों में नहीं होनी चाहिए। वो आग थी जो आग से भी बड़ी होती है।
मैंने वो रजिस्टर दोनों हाथों से पकड़ा। पन्ने पीले थे, किनारे फटे हुए, और पहले पन्ने पर मेरे पिता का नाम था — शेर सिंह — और उसके नीचे छोटे अक्षरों में मेरा नाम।
"पापा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई।
"रो मत," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ किसी पुराने ताले जैसी थी, जो सालों बाद खुला हो। "रोने का वक़्त नहीं है। कल तहसील में रोना होगा, वो भी अच्छे से, जब सब देख रहे हों।"
माँ दौड़कर आईं। वो पापा के सामने खड़ी हो गईं, और उनका शरीर काँप रहा था। बीस साल बाद वो अपने पति को खुद चलते हुए देख रही थीं।
"तुम आ गए," माँ ने कहा। बस इतना।
"तूने बुलाया," पापा ने कहा। "शांति ने खबर भेजी — दीया जल गया है। मैं और कितना छुपता?"
माँ ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया। गुड़िया मेरी कमर से चिपक गई थी, और उसकी उँगलियाँ मेरी धोती में गड़ी हुई थीं।
मीरा आगे आई। वो पापा के सामने झुकी, और उसकी आवाज़ साफ़ थी।
"बाबा जी, मैं मीरा हूँ। रणवीर सिंह की बेटी।"
पापा ने उसे देखा। फिर उन्होंने धीरे से अपना जला हुआ हाथ उठाया और उसका सिर सहलाया। "रणवीर की बेटी," उन्होंने कहा। "वो आदमी मेरे साथ मिट्टी में खेला है। तू उसकी आँखें लेकर आई है।"
मीरा की आँखें भर आईं, पर वो हँसी। "मेरे पापा कहते हैं मैं उनकी ज़िद लेकर आई हूँ।"
पापा पहली बार हँसे। आधे चेहरे से। पर वो हँसी असली थी।
फिर वो मेरी तरफ़ मुड़े, और उनका चेहरा फिर गंभीर हो गया।
"बेटा, सुन। काग़ज़ है तेरे पास। पर काग़ज़ अकेला नहीं लड़ता। माधव कहेगा — ये काग़ज़ नकली है, ये आदमी नकली है, ये वीर पागल है। उसके पास वकील है, पैसा है, और सरकारी मुहर है। तेरे पास क्या है?"
मैंने सोचा। फिर मैंने कहा, "मेरे पास सच है।"
"सच काग़ज़ नहीं होता, बेटा," पापा ने कहा। "सच वो होता है जो आदमी अपनी आँखों से देखे। कल तहसील में तुझे ऐसा सच दिखाना है जिसे वो झूठ न कह सके।"
मैंने उनकी बात सुनी। और मुझे लगा कि मेरे पास जो है, वो काग़ज़ों से बड़ा है — पर उसे कैसे साबित करूँ?
तभी मीरा बोली। और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो अब मैं पहचानने लगा था — जब वो कोई रास्ता खोज लेती थी।
"मेरे पास एक तरीक़ा है," उसने कहा। "पर वो ख़तरनाक है, और अजीब भी।"
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