Spirit of a Fighter628 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 628

7 min read November 5, 2026

आदमी ने सिर हिलाया — ना में।

गुड़िया ने उसकी गोद में अपना सिर रख दिया।

हम सब अंदर गए। टिंकू ने दरवाज़ा बंद किया और कुंडी लगा दी। माँ ने चूल्हे पर पानी चढ़ाया। मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से कुछ कपास और एक छोटी शीशी निकाली।

शेर सिंह को हमने चारपाई पर बैठाया। माँ ने उनके लिए एक पुरानी चादर निकाली और उनके कंधों पर डाल दी। उन्होंने उसे छुआ, फिर अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे किसी पुरानी चीज़ की गंध ले रहे हों।

मीरा ने उनकी कलाई पकड़ी और नाड़ी देखी। उसका चेहरा गंभीर हो गया।

"बहुत कमज़ोर है," उसने धीरे से कहा। "नाड़ी ऐसी है जैसे… जैसे कोई बूढ़ा आदमी हो। पर ये तो…"

"पचास का है," माँ ने कहा, बिना पलटे। "पचास से ज़्यादा नहीं।"

मीरा ने उनकी आँखों में देखा। फिर उसने उनका मुँह खोलकर देखा — जली हुई ज़ुबान, सूखा गला।

"इन्हें बोलने में दर्द होता है," मीरा ने कहा। "ज़ुबान का जो हिस्सा जला है, वो सख़्त हो गया है। ये ठीक हो सकता है, पर वक़्त लगेगा। और मुझे इनका पूरा शरीर देखना पड़ेगा।"

माँ ने उसकी तरफ़ देखा। "तू ठीक कर सकती है?"

"मैं कोशिश कर सकती हूँ," मीरा ने कहा। "पर मैडम…"

"मुझे मैडम मत कह," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ में वो तेज़ी लौट आई थी जो मैं जानता था। "मेरा नाम सरस्वती है।"

मीरा एक पल रुकी। फिर उसने सिर हिलाया। "सरस्वती जी, इनके शरीर पर सिर्फ़ जलन के निशान नहीं हैं। मुझे लगता है इन्हें किसी चीज़ की लत है। कोई दवा। जो इन्हें बीस साल से दी जा रही है।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

माँ ने चूल्हे से पानी उतारा और एक कटोरी में डालकर शेर सिंह के पास रख दी। फिर वो उनके सामने बैठ गईं।

"बोल नहीं सकते," उन्होंने कहा। "तो सुनो।"

शेर सिंह ने उनकी तरफ़ देखा।

"तेरे बेटे ने आज अखाड़े में खड़े होकर सबके सामने सच बोला," माँ ने कहा। "उसने भैरव का ज़हर उगलवाया। उसने माधव सिंह को पुलिस के हवाले करवाया। और तू — तू बीस साल से कहाँ था?"

शेर सिंह का सिर झुक गया।

"मैं जानती हूँ तू कहाँ था," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "तू उस औरत के पास था। शांति के पास।"

मैं चौंक गया। "माँ?"

"शांति ने तुझे बताया नहीं?" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "उसने तेरे पिता को छुपाया। बीस साल। उसने उन्हें खाना दिया, दवा दी, और उस दवा ने उन्हें ज़िंदा रखा — पर उसी दवा ने उन्हें तोड़ भी दिया।"

शेर सिंह ने अपना हाथ उठाया। उसने माँ की तरफ़ इशारा किया, फिर अपनी तरफ़, फिर अपने गले पर हाथ रखा।

"तू कहना चाहता है कि तू मजबूर था?" माँ ने पूछा।

उसने सिर हिलाया।

"मजबूर कैसे?" माँ ने कहा। उनकी आवाज़ में अब वो गुस्सा आ गया था जो बीस साल से दबा था। "तू मरा हुआ था, शेर सिंह। तेरी लाश मेरे सामने रखी थी। मैंने तेरे चेहरे पर हाथ फेरा था। मैंने तेरा कफ़न खुद सिला था। और तू ज़िंदा था? तू उस औरत के घर में छुपा बैठा था और मुझे कुछ नहीं बताया?"

शेर सिंह की आँखों से फिर पानी बहा। उसने अपना हाथ माँ की तरफ़ बढ़ाया।

माँ ने हाथ पीछे खींच लिया।

"नहीं," उन्होंने कहा। "अभी नहीं।"

वो उठकर खड़ी हो गईं और चूल्हे की तरफ़ चली गईं। उनकी पीठ मेरी तरफ़ थी, पर मैं देख सकता था कि उनके कंधे काँप रहे थे। उन्होंने कटोरी उठाई और उसे पोंछने लगीं, हालाँकि वो साफ़ थी।

टिंकू ने धीरे से मेरा कोहनी पकड़ा। "भाई," उसने फुसफुसाया, "मैं चाय बनाता हूँ।"

"चार बजे?"

"चाय का वक़्त नहीं होता," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुरानी हल्की हँसी लौट आई थी। "चाय बस बहाना होती है।"

वो उठकर चूल्हे के पास गया और माँ के बगल में बैठ गया।

मैं शेर सिंह के पास बैठ गया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने कभी नहीं देखा — डर। वो मुझसे डर रहे थे। अपने ही बेटे से।

"तुम्हें कुछ नहीं कहना," मैंने कहा। "अभी नहीं।"

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी पकड़ में ताकत थी — कम, पर थी। पहलवान की पकड़, जो शरीर से पहले मरती है।

मीरा ने अपना बैग उठाया और मेरे पास बैठ गई।

"वीर," उसने धीरे से कहा, "मुझे इन्हें अंदर से देखना पड़ेगा। शरीर पर जो निशान हैं, वो सिर्फ़ जलने के नहीं हैं। इनकी पीठ पर कुछ है — मुझे चादर के नीचे से दिख रहा है।"

"अभी?'

"अभी," उसने कहा। "अगर इन्हें रोज़ कोई दवा मिल रही थी और वो बंद हो गई, तो अगले कुछ घंटों में इनकी हालत बिगड़ सकती है।"

मैंने शेर सिंह की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी आँखों में देखा और मुझे लगा कि वो समझ गए। उन्होंने धीरे से अपना कंधा हिलाया और चादर अपने आप सरक गई।

मैंने उनकी पीठ देखी और मेरी साँस रुक गई।

उनकी पीठ पर बीस साल पुराने जले के निशान थे — पर उनके बीच में, रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ़, काले धब्बे थे। छोटे-छोटे, गोल, जैसे किसी ने उँगली से स्याही के टीके लगाए हों। दर्जनों।

मीरा ने उन्हें छुआ। शेर सिंह का पूरा शरीर सिकुड़ गया।

"ये सुई के निशान नहीं हैं," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "ये जलने के निशान हैं। किसी ने गरम चीज़ इनकी पीठ पर लगाई है। बार-बार।"

माँ पलट गईं। उनकी आँखों में अब गुस्सा नहीं था, कुछ और था।

"माधव," उन्होंने धीरे से कहा।

शेर सिंह ने सिर हिलाया।

"माधव ने तुझे ज़िंदा रखा," माँ ने कहा, "ताकि तू उसके काम आए।"

उन्होंने फिर सिर हिलाया।

मैं उठ खड़ा हुआ। "मैं उससे अभी बात करता हूँ।"

"बैठ जा।" माँ की आवाज़ सख़्त थी। "पुलिस उसे ले गई है। और सुबह तक वो जेल में होगा। तब तक तू क्या करेगा? जेल की दीवार तोड़ेगा?"

मैं बैठ गया।

तभी मीरा ने कुछ कहा जो मेरे दिल में लगा।

"इन्हें सबसे बड़ी चोट यहाँ लगी है," उसने शेर सिंह की पीठ पर हाथ रखकर कहा। "रीढ़ पर। जो आदमी इन्हें इस तरह जलाता था, वो जानता था कि कहाँ जलाना है। रीढ़ पर जलाने से आदमी लकवे जैसा हो जाता है। और जो आदमी लकवे जैसा हो, वो किसी काम का नहीं रहता।"

"पर ये बोल नहीं सकते," मैंने कहा।

"ज़ुबान जल गई," मीरा ने कहा। "आग से। शायद इन्होंने कुछ कहना चाहा होगा। शायद इन्होंने सच बोलने की कोशिश की होगी और उन्हें चुप करवाया गया।"

शेर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था — कुछ ऐसा जो वो बोलना चाहते थे पर बोल नहीं सकते थे।

मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।

"तुम कुछ मत बोलो," मैंने कहा। "बस एक बात बताओ — सिर हिलाकर। क्या तुमने भैरव के लिए कुछ किया? कुछ ऐसा जो मुझे पता होना चाहिए?"

शेर सिंह रुके। फिर उन्होंने धीरे से सिर हिलाया — हाँ।

"क्या?" माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में अब वो डर था जो मैंने बहुत कम सुना था।

शेर सिंह ने अपना हाथ उठाया और अपनी उँगली से हवा में कुछ लिखने की कोशिश की। उसकी उँगली काँप रही थी, अक्षर नहीं बन रहे थे। वो हारकर अपना हाथ नीचे गिरा दिया।

फिर उसने अपनी नज़र माँ पर टिकाई।

माँ ने उनकी तरफ़ देखा। बहुत देर तक। फिर उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और धीरे से कहा, "तूने उसे मिट्टी दी।"

शेर सिंह हिले नहीं।

"तूने उसे तहखाना दिखाया," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ अब भी धीमी थी, पर हर शब्द तेज़ी से गिर रहा था। "तूने उसे वो मिट्टी दी जिसमें ताकत है।"

शेर सिंह ने सिर नहीं हिलाया। पर उनकी आँखों से एक आँसू निकला और वो काफ़ी जवाब था।

"क्यों?" माँ ने कहा।

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