Spirit of a Fighter – Chapter 626
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो दर्द था जो शब्दों में नहीं आता। "वीर," उन्होंने कहा, "मुझे तुझ पर हर पल भरोसा था। इसीलिए मैंने तुझे नहीं बताया। क्योंकि अगर मैंने बताया होता, तो तू बीस साल पहले ही उस रास्ते पर निकल पड़ता, और मैं तुझे खो देती। मैं तुझे खोने से नहीं डरती थी — मैं इस बात से डरती थी कि तू मुझे अकेला छोड़कर चला जाएगा।"
मैं लौटकर उनके पास गया। मैंने उनके घुटनों पर सिर रख दिया, जैसे बचपन में करता था जब मुझे बुख़ार आता था।
"माँ," मैंने कहा, "मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ूँगा। कभी नहीं।"
उन्होंने मेरे बालों में उँगलियाँ फेरीं।
"अब जा," उन्होंने कहा, "और सो।"
मैं उठा और बाहर आया। टिंकू बाहर आँगन में खड़ा था, उसकी आँखें लाल थीं, और वो आसमान की तरफ़ देख रहा था। मीरा दरवाज़े के पास खड़ी थी।
"टिंकू," मैंने कहा, "तू अपनी दुकान पर जा।"
"पर भाई —"
"जा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो सिर्फ़ ज़रूरत में आती है। "कल सुबह तुझे पंचायत से पहले मेरे पास होना है। और अपनी मिठाई की डिब्बी लाना।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "क्यों?"
"क्योंकि कल मैं जीतूँगा," मैंने कहा, "और जब मैं जीतूँगा, तो मैं तेरी मिठाई खाऊँगा। खुद। अपने हाथ से। और अगर तूने मिठाई में नमक डाल दिया, तो तू जानता है क्या होगा?"
टिंकू हँसा। पहली बार उस रात में हँसा। "क्या होगा?"
" मैं तुझे पंचायत में घोषित कर दूँगा — 'ये टिंकू है, और इसकी मिठाई में हमेशा नमक आता है।'"
"नहीं!" टिंकू ने कहा, और उसकी आँखें चमक उठीं। "मैं नमक नहीं डालूँगा। पर भाई, मैं तेरी जीत के लिए एक ख़ास मिठाई बनाऊँगा। ऐसी मिठाई जो गाँव ने कभी नहीं चखी।"
वो चला गया। उसकी चप्पलों की आवाज़ दूर तक सुनाई दी।
मैं मीरा के पास आया। वो दरवाज़े के सहारे खड़ी थी। उसकी आँखें सूजी हुई थीं, पर उनमें वो चमक थी।
"मीरा," मैंने कहा।
"हाँ?"
"तू आज रात यहीं रुक जा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। "वीर —"
"माँ के पास," मैंने कहा। "मैं बाहर सोऊँगा। तू अंदर सो जा। माँ को आज अकेले नहीं छोड़ना।"
वो कुछ पल मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने धीरे से कहा, "तू अच्छा आदमी है, वीर सिंह।"
मैं हँसा। "आज पहली बार किसी ने मुझे ये कहा।"
"तो आज पहली बार सही आदमी ने कहा," वो बोली, और अंदर चली गई।
मैं आँगन में बैठ गया। रात ठंडी थी। नीम के पेड़ की पत्तियाँ हवा में सरसरा रही थीं। मैंने उस पेड़ की तरफ़ देखा — जहाँ से कुछ देर पहले बुझी लालटेन वाली परछाई मुझे देख रही थी।
मैं आँगन में बैठा था, पर मेरा दिमाग़ वहीं नीम के पेड़ के नीचे अटका हुआ था। बुझी लालटेन वाली परछाई। वो आदमी जो पंद्रह दिन में कभी बात नहीं करता था, पर हर बात जानता था। जो मेरे पीछे-पीछे चलता था, खुद कभी सामने नहीं आता था।
और माँ ने अभी कहा — पापा खुद आएँगे।
मेरे हाथ काँपने लगे। जब मैंने सोचा कि वो गूँगा आदमी कौन हो सकता है, तो मेरे अंदर कुछ ऐसा उलझ गया जो मैं सुलझा नहीं पा रहा था। अगर वो पापा हैं, तो वो बोल क्यों नहीं रहे? वो मुझे गले क्यों नहीं लगा रहे? बीस साल। बीस साल वो मेरे गाँव में थे, मेरी गली से गुज़रते थे, और मुझे पता भी नहीं चला?
मैं उठा। मेरे पैर खुद माँ के कमरे की तरफ़ बढ़ गए।
दरवाज़े पर माँ बैठी थीं। उनके हाथ में रोटी थी, पर वो एक टुकड़ा भी नहीं खा रही थीं। जैसे उन्होंने रोटी बनाई ही इसलिए हो कि किसी की नज़र में ये काम करने वाली औरत लगे। पर उनकी आँखें खाली थीं।
मैं उनके सामने बैठ गया।
"माँ," मैंने कहा। मेरी आवाज़ फट गई। मैंने गला साफ़ किया और फिर पूछा। "पिताजी ज़िंदा हैं?"
रोटी उनके हाथ से फिसलकर गिर गई।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनका चेहरा एक पल में बदल गया — जैसे कोई पुरानी दीवार गिर रही हो। उन्होंने कुछ कहना चाहा। होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं आई।
फिर वो बैठकर रोईं।
ऐसा रोना जो बीस साल से अंदर जमा था। ऐसा रोना जो सिर्फ़ औरतें रो सकती हैं — जब वो एक साथ बहू, माँ और पत्नी होती हैं और तीनों को कभी एक साथ रोने का मौक़ा नहीं मिलता। उनके कंधे हिल रहे थे। उन्होंने अपना आँचल मुँह पर रख लिया, पर आवाज़ फिर भी बाहर आ रही थी।
मैंने उन्हें छुआ नहीं। मैं बस वहीं बैठा रहा।
कुछ देर बाद उन्होंने आँचल नीचे किया। उनकी आँखें सूज गई थीं, नाक लाल थी।
"मुझे शक था," उन्होंने कहा। आवाज़ फटी हुई थी, जैसे दूर से आ रही हो। "पहले-पहले तो सब कुछ आसान था। मैं सोचती थी — जो मर गया, वो मर गया। पर जब तू बड़ा होने लगा, जब तेरे कंधे चौड़े होने लगे, तब मुझे लगने लगा जैसे कोई मेरी तरफ़ देख रहा है। मुझे लगा — अगर वो ज़िंदा है, तो मुझे बताना चाहिए। पर फिर मैंने खुद को समझा लिया।"
"क्यों, माँ?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो बात थी जो मैंने कभी नहीं देखी थी — शर्म।
"क्योंकि अगर मैंने सच मान लिया कि वो ज़िंदा है," उन्होंने धीरे से कहा, "तो मुझे ये भी मानना पड़ता कि मैंने तुझे बीस साल तक उस आदमी से नहीं मिलाया। मैंने तुझे उससे दूर रखा। मैंने तुझे यतीम बनाकर पाला। वो ग़लती मेरी थी, वीर। मेरी।"
वो फिर रोईं। इस बार मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।
"माँ," मैंने कहा, "तूने मुझे बचाया। तूने मुझे ज़िंदा रखा। अगर तूने बताया होता, तो मैं बीस साल पहले उस रास्ते पर निकल पड़ता और वो आदमी मुझे उसी तरह मार देता जैसे उसने शांति के पति को मारा।"
"पर मैं खुश नहीं हूँ," उन्होंने कहा। "मुझे लग रहा है जैसे मैंने तेरे पापा को तेरी नज़रों से मरवा दिया। और आज तुझे वो ज़िंदा मिल रहा है, तो मुझे पता नहीं मैं खुश हूँ या डरी हुई।"
मैंने उनके पैर छुए। मेरे आँसू उनके पैरों पर गिरे।
तभी मुझे दरवाज़े पर एक छोटी परछाई दिखी। गुड़िया। वो चुपचाप खड़ी थी, उसकी उँगली उसके मुँह में थी। उसने सब सुन लिया था।
वो दौड़कर आई और मुझसे चिपक गई। उसने मेरी कमर में अपनी छोटी बाँहें लपेट लीं, और उसका चेहरा मेरे पेट में गड़ गया।
"भैया," वो फुसफुसाई, "तो पापा मरे नहीं हैं?"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। उसके बाल गीले थे — शायद वो रो रही थी।
"नहीं, गुड़िया," मैंने कहा। "वो मरे नहीं हैं। और अब सच छुपाना नहीं है। किसी से भी नहीं।"
वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराई — वो प्यारी-सी मुस्कान जो बच्चे तब देते हैं जब उन्हें कुछ अच्छा पता चलता है। फिर वो माँ की गोद में जा बैठी।
कुछ देर बाद टिंकू आया। उसके हाथ में गुड़ की चाय थी — चार गिलास, एक ट्रे में। उसने कुछ नहीं पूछा। बस एक-एक गिलास सबके हाथ में रख दिया। और चौथा गिलास खुद उठाकर पीने लगा।
"टिंकू," माँ ने कहा, "तूने इतनी जल्दी चाय कैसे बना दी?"
"माँ," टिंकू ने कहा, "मैं आज सुबह से चाय बनाने की तैयारी में था।"
मैं हँसा। पहली बार उस रात में मेरी हँसी असली थी।
चाय पीते-पीते माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "वीर, एक बात सुन।"
"क्या?"
"तेरे पापा ने कहा था कि जब तू जीतेगा, तो वो खुद सामने आएँगे। पर मैं तुझे एक बात बताना चाहती हूँ — वो आदमी जो तुझे रोज़ देखता है, वो तेरा पिता है, पर वो अब वही नहीं है जो बीस साल पहले था। उस आदमी ने भैरव के लिए बहुत कुछ किया है। तुझे उसे अपना पिता मानने से पहले उसके किए हुए कामों का हिसाब सुनना पड़ेगा।"
मेरे हाथ में गिलास रुक गया। "तू क्या कह रही है, माँ?"
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