Spirit of a Fighter – Chapter 612
उनकी आवाज़ टूटी।
"और मैंने," माँ ने कहा, "अपने हाथ से वो गिलास उन्हें थमा दिया।"
कमरे में सब सन्न रह गया।
"दो दिन में," माँ ने कहा, "तेरे पापा चल बसे।"
मैंने अपनी मुट्ठियाँ कस लीं। मेरे हाथ काँप रहे थे और मैं उन्हें रोक नहीं पा रहा था।
"तूने मुझे बीस साल झूठ बोला?" मेरी आवाज़ मेरी ही नहीं लगी। "तू जानती थी कि पापा को ज़हर मिला? और तू चुप रही?"
"वीर—"
"बीस साल, माँ!" मैं खड़ा हो गया। "मैं बड़ा होता रहा, तू देखती रही, और तू कुछ नहीं बोली?"
माँ ने अपना सिर उठाया। उनकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ में नहीं।
"अगर बता देती," उन्होंने कहा, "तो तू उसी दिन भैरव के घर जाता। और मैं तेरी लाश उठाती।"
मैं रुक गया।
"मैंने एक बार एक बेटा खोया है," माँ ने कहा। "दूसरी बार नहीं खो सकती थी।"
मैंने दीवार से अपना सिर टिका दिया। दीवार ठंडी थी। मेरी आँखें जल रही थीं, पर मैं रोया नहीं। मैं रो नहीं सकता था, क्योंकि अगर रोता तो शायद रुक नहीं पाता।
"जो ज़हर मैंने अपने हाथ से दिया," माँ ने धीरे से कहा, "वो मैंने बीस साल हर रात पीया है, बेटा। हर रात। तेरे पापा का चेहरा आता है, और मैं जागती रहती हूँ।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। वो फ़र्श पर बैठी थीं, छोटी लग रही थीं, जैसे बीस साल में सूख गई हों।
दरवाज़े की तरफ़ कदमों की आवाज़ आई। टिंकू बाहर से आया, हाथ में दो गिलास। उसने कुछ नहीं कहा। बस मेरे पास एक रख दिया, माँ के पास एक, और चुपचाप दरवाज़े के पास खड़ा हो गया।
मैंने गिलास उठाया। चाय ठंडी हो चुकी थी, पर मैंने पी ली। गला जल गया, पर अंदर की आग बुझी नहीं।
तभी कोने से एक आवाज़ आई।
"रुको।"
हम तीनों ने पलटकर देखा।
दीनू उठ रहा था। उसकी आँखें लाल थीं, पर नींद से नहीं। वो खड़ा हुआ, दीवार का सहारा लेकर, और उसकी आवाज़ में वो बात थी जो अब तक नहीं थी।
"तुम सब शेर सिंह की मौत पर रो रहे हो," उसने कहा। "पर शेर सिंह तो सिर्फ़ एक कड़ी है।"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा।
"असली शुरुआत," दीनू ने कहा, "भैरव का बाप है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरे हाथ से गिलास फिसलने लगा।
"और वो," दीनू ने धीरे से कहा, "अभी भी ज़िंदा है।"
॥
"अभी भी ज़िंदा है।"
दीनू की आवाज़ कमरे में गूँजती रही। मैंने गिलास मेज़ पर रखा। मेरे हाथ की उँगलियाँ ठंडी हो गई थीं, जैसे किसी ने उनमें बर्फ़ की डली रख दी हो।
"कौन?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ सूखी थी।
दीनू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक नहीं थी जो बहादुर आदमी की आँखों में होती है। उसमें कुछ और था — पुराना डर, जो सालों से दबाया हुआ था और अब फूट रहा था।
"तू सुन तो रहा है," उसने कहा। "पर सुनकर समझ नहीं रहा।"
"मैं समझ रहा हूँ," मैंने कहा। "तू बता — कौन है वो?"
दीनू ने माँ की तरफ़ देखा। माँ ने अपना सिर धीरे से हिलाया — जैसे कह रही हो, अब बोल दे, अब छुपाने का वक़्त नहीं है।
दीनू ने एक लंबी साँस ली।
"बाबा हरिदास," उसने कहा।
नाम कमरे में गिरा, और माँ के चेहरे का रंग उड़ गया। उन्होंने अपनी उँगलियाँ अपनी साड़ी में गड़ा दीं। मैंने बीस साल में माँ को इतना डरा हुआ कभी नहीं देखा था।
"कौन है ये बाबा हरिदास?" मैंने पूछा।
दीनू ने अपने दाँत निकाले — न हँसी थी वो, न मुस्कान। जैसे कोई पुराना ज़ख़्म फिर से खुल गया हो।
"जिसने इस पूरे खेल को शुरू किया," उसने कहा। "तेरे पापा को ज़हर देना सिखाया। माधव सिंह को ज़हर बनाना सिखाया। रघुवीर को बोतल भरना सिखाया। भैरव को पानी में घोलना सिखाया। जो आज तक किसी की नज़र में नहीं आया, क्योंकि उसने हमेशा अपने हाथ साफ़ रखे।"
मेरे कान में एक शब्द गूँजा — वो बूढ़ा।
"वो… वो जो अखाड़े में आया था?" मैंने कहा। "वो बूढ़ा, जिसने कहा था कि रघुवीर की लाश उसने दफ़नाई? जिसने कहा था कि पहली खुराक मेरे पापा ने दी थी?"
दीनू ने सिर हिलाया।
"वही।"
"तो वो मुंशीजी का गुरु है?"
"हाँ।" दीनू ने कहा। "मुंशीजी को ज़हर बनाना उसी ने सिखाया था। मुंशीजी ने रघुवीर को सिखाया। रघुवीर ने भैरव को। और भैरव ने माधव के पैसे से पूरे इलाक़े में बाँट दिया। ये सब एक ही जड़ से निकला है, वीर। और वो जड़ ज़मीन के नीचे है — गहरी, बहुत गहरी।"
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरी कुर्सी पीछे खिसक गई और उसकी टाँगें ज़मीन पर खरोंच पैदा कर गईं।
"वो कहाँ मिलेगा?"
दीनू ने मेरी आँखों में देखा।
"तू अभी नहीं जा सकता," उसने कहा।
"मैंने पूछा — कहाँ मिलेगा?"
"वीर—"
"दीनू चाचा!" मेरी आवाज़ ऊँची हो गई। "मैंने आज रात तहखाने देखे, माँ को बंद देखा, भैरव को रोते देखा, माधव को हथकड़ी में जाते देखा। तू मुझे अब ये मत सिखा कि मैं क्या कर सकता हूँ और क्या नहीं। बता — कहाँ है वो?"
कमरे में सन्नाटा छा गया। टिंकू ने अपना गिलास धीरे से रखा और मेरे पास आकर खड़ा हो गया। माँ ने अपना मुँह नहीं उठाया।
दीनू ने बहुत देर तक मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने धीरे से कहा —
"तहखाने के नीचे एक और तहखाना है।"
मेरा दिल धड़कना भूल गया।
"क्या?"
"उस तहखाने में जो मिट्टी थी — जिसे सैकड़ों साल पहले साधु-संतों ने तैयार किया था — उसके नीचे एक और परत है। कोई उसे नहीं जानता। सिर्फ़ तीन लोग जानते थे। एक — रघुवीर। दूसरा — मुंशीजी। तीसरा — बाबा हरिदास। और अब चौथा — मैं।"
"तू कैसे जानता है?" मैंने पूछा।
दीनू ने अपना हाथ उठाया और अपनी कमीज़ का कॉलर खोला। उसकी गर्दन पर, बाएँ कंधे के पास, एक निशान था — जला हुआ, पुराना, चमड़ी सिकुड़ी हुई। मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
"मुझे उसने जलाया था," उसने कहा। "जब मैंने उसका राज़ जान लिया। बीस साल पहले, एक रात मैं उसके पीछे-पीछे उतर गया था। मैंने देखा — वो उस नीचे वाले तहखाने में क्या करता है। वो मिट्टी के नीचे से कुछ निकालता है। और उस कुछ से बोतलें भरता है।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"क्या निकालता है?"
"मैं नहीं जानता," दीनू ने कहा। "मैंने सिर्फ़ इतना देखा कि वो नीचे उतरता है और घंटों बाद ऊपर आता है, और उसके हाथ काँपते हैं। और उसके हाथ से एक अजीब गंध आती है। मीठी, पर कड़वी।"
मैंने आँखें बंद कर लीं। मेरी नाक में वो गंध आई — हरी शीशी वाली, तहखाने की मिट्टी वाली, उस गुड़ जैसी मिठास वाली, जिसे मैंने हरनाम की लाश के मुँह से भी सूँघा था।
"मैं उसे सूँघ सकता हूँ," मैंने धीरे से कहा।
दीनू मेरी तरफ़ झुका।
"क्या?"
"वो जगह," मैंने कहा। "मैं उसे सूँघकर पहचान सकता हूँ। मुझे रास्ता नहीं चाहिए। मुझे बस एक बार उस गंध के पास जाना है।"
दीनू ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ बदला।
"तू सच में…" वो रुक गया। "सच में सूँघ सकता है? माँ ने बताया था, पर मैंने सोचा—"
"मैं सूँघ सकता हूँ," मैंने कहा। "मेरी नाक जानवर जैसी है। बचपन में लोग कुत्ता कहकर चिढ़ाते थे। पर आज मुझे इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता। आज यही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।"
माँ ने अपना सिर उठाया। उनकी आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रही थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनके होंठ काँप रहे थे।
"बेटा," उन्होंने कहा। "वो आदमी… वो आदमी आम आदमी नहीं है। जिसने उसे एक बार देख लिया, वो लौटकर नहीं आया।"
"माँ," मैंने कहा। "मैं भी आम आदमी नहीं हूँ।"
टिंकू ने तभी अपना गला साफ़ किया।
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