Spirit of a Fighter543 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 543

7 min read November 5, 2026

मैंने उस टुकड़े को लालटेन की रोशनी में पलटा। जला हुआ हिस्सा नीचे था, और ऊपर के कोने पर कुछ अक्षर बचे थे — "रणवीर सिंह" और उसके नीचे तारीख़। पर तारीख़ जल चुकी थी, सिर्फ़ साल बचा था — बीस साल पहले का।

"ये हस्ताक्षर वाला पन्ना है," मीरा ने कहा। "जो काग़ज़ ठाकुर के आदमी ले गए, वो कॉपी थी। असली यहीं था, अलमारी के पीछे। पर अब जल गया।"

"सब नहीं जला," मैंने कहा। "अभी कुछ बचा है।"

और फिर मैंने उसे वो काग़ज़ दिखाया जो गुड़िया के अंदर से निकला था। मीरा ने उसे पढ़ा, और उसका चेहरा बदल गया। उसने दो बार पढ़ा। फिर तीसरी बार, धीरे-धीरे, जैसे किसी ज़हर को पहचान रही हो।

"अमर सिंह," उसने धीरे से कहा। "ये नाम मैंने कहीं सुना है।"

"कहाँ?"

"मेरे पिता के पुराने काग़ज़ात में।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "जब मैं छोटी थी, पिता की अलमारी में एक फ़ाइल देखी थी जिस पर ये नाम लिखा था। और उस फ़ाइल में एक तस्वीर थी — दो लड़के, अखाड़े की मिट्टी में खड़े। एक मेरे पिता थे, जवान। और दूसरा…"

"कौन?"

"दूसरा तू था," उसने कहा। "या तेरे जैसा कोई। मैंने उस वक़्त सोचा था कि ये कोई पुराना पहलवान होगा। पर अब लगता है — वो तेरा भाई था।"

टिंकू ने हमारे बीच आकर खड़ा हो गया।

"तो अब क्या?" उसने पूछा। "हमारे पास आधा जला काग़ज़ है, एक गुड़िया है, और एक भाई है जो बीस साल से छुपा बैठा है। इससे भैरव का जाल नहीं टूटेगा।"

"नहीं टूटेगा," मैंने कहा। "पर एक रास्ता है।"

मैंने उन दोनों को वो बात बताई जो भाई ने कही थी — कि ठाकुर के आदमी काग़ज़ लेकर शहर जा रहे हैं, और सुबह तक सब कुछ मिटा देंगे। मीरा ने सुना, और उसकी आँखें सिकुड़ गईं।

"अगर वो काग़ज़ शहर पहुँच गए," उसने कहा, "तो ठाकुर उन्हें जला देगा। और फिर हमारे पास सिर्फ़ गवाह बचेंगे। और गवाह — गवाह तो वो खरीद लेता है।"

"इसलिए हमें काग़ज़ से पहले पहुँचना है," मैंने कहा।

"कैसे? वो गाड़ी से गए होंगे।"

"नहर के किनारे-किनारे एक पगडंडी जाती है," मैंने कहा। "कालू काका ने बताया था। वो पगडंडी गाँव के बाहर पुराने मंदिर तक जाती है, और वहाँ से शहर का रास्ता छोटा पड़ता है। अगर वो गाड़ी से गए हैं, तो उन्हें मंदिर के पास से गुज़रना पड़ेगा।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"तू कैसे जानता है कि वो उसी रास्ते से गए?"

"क्योंकि मैंने उनके पैरों के निशान सूँघे हैं," मैंने कहा। "अखाड़े में। वो चमड़े के जूते पहने थे। और उन जूतों पर नहर की गीली मिट्टी लगी थी। मतलब वो नहर के किनारे से गए।"

टिंकू ने अपनी टोपी ठीक की।

"तो चल," उसने कहा। "पर एक बात — अगर वहाँ ठाकुर के आदमी हमसे ज़्यादा हों, तो हम क्या करेंगे?"

"हम उनसे लड़ेंगे नहीं," मैंने कहा। "हम उनसे पहले पहुँचेंगे।"

हम निकले। रात के तीसरे पहर की ठंडी हवा चल रही थी, और नहर के किनारे की मिट्टी पैरों के नीचे दबकर चरमरा रही थी। मैं आगे था, और मेरी नाक हवा में थी।

पहले निशान मुझे नहर के मोड़ पर मिले। चमड़े के जूते के, गहरे, जल्दी में उठाए हुए। फिर दूसरे, फिर तीसरे। तीन आदमी। शायद चार। वो जल्दी में थे, इसलिए उन्होंने निशान मिटाने की कोशिश नहीं की।

"तीन," मैंने कहा। "शायद चार। और उनमें से एक के पैर में चोट है — वो घसीटकर चल रहा है।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"तू ये कैसे…"

"उसके निशान गहरे हैं," मैंने कहा। "और बाएँ पैर का निशान दाएँ से छोटा है। वो अपना वज़न एक तरफ़ डाल रहा है।"

वो कुछ नहीं बोली। पर उसकी आँखों में वो बात आई जो पहले नहीं थी — भरोसा।

हम चलते रहे। मंदिर दूर नहीं था, पर रास्ता पथरीला था, और अँधेरे में हर पत्थर पैर के नीचे चलता लगता था। टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ रखा था, और मीरा मेरे बगल में चल रही थी।

फिर मुझे एक गंध आई। जले हुए कपड़े की। और उसके नीचे — तेल की, वही तेल जो ठाकुर के आदमी के जूतों पर था।

मैं रुका।

"आगे," मैंने धीरे से कहा। "मंदिर के पीछे कुछ जल रहा है।"

हम मंदिर के पीछे पहुँचे, तो पहले कुछ नहीं दिखा। सिर्फ़ अँधेरा और पेड़ों की आवाज़। पर फिर मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी और एक तरफ़ इशारा किया।

वहाँ, एक पुराने पीपल के पेड़ के नीचे, एक जली हुई बोरी पड़ी थी। बोरी का आधा हिस्सा जल चुका था, और बाकी से धुआँ उठ रहा था। उसके चारों तरफ़ राख फैली थी, और उस राख में काग़ज़ के जले हुए टुकड़े पड़े थे।

मैं दौड़कर गया। घुटनों के बल बैठकर मैंने बोरी खोली। अंदर एक रजिस्टर था — मोटा, चमड़े के कवर वाला। आधा जल चुका था, पर कुछ पन्ने बचे थे। उन पन्नों के किनारे भूरे थे, और स्याही कहीं-कहीं पिघल गई थी, पर अक्षर पढ़े जा सकते थे।

मैंने रजिस्टर उठाया। वो गरम था, और उसकी गंध — जले काग़ज़ की, पुरानी स्याही की, और उसके नीचे कुछ और — मेरे गले में अटक गई।

मीरा मेरे पास बैठ गई। टिंकू ने लालटेन पास रखी।

मैंने पन्ने पलटे। पहले पन्ने पर तारीख़ें थीं, और नाम — कुछ नाम मैं जानता था, कुछ नहीं। हर नाम के आगे रकम लिखी थी, और कुछ के आगे "खरीदा" लिखा था।

फिर मेरी नज़र एक पन्ने पर रुकी, जो आधा जला था, पर जिस पर रणवीर सिंह के हस्ताक्षर बचे थे। उनके नीचे लिखा था — "गवाह — कमला। ज़िंदा।"

मैंने उँगली उस नाम पर रखी।

"कमला," मैंने धीरे से पढ़ा। "ये कौन है?"

मीरा ने पन्ने को ध्यान से देखा। उसका चेहरा कठोर हो गया।

"कमला," उसने कहा, "भैरव की माँ है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"क्या?"

"वो औरत जो तेरे घर के पीछे वाले कमरे में रहती है," मीरा ने कहा। "जिसे सब पागल समझते हैं। जो कभी बाहर नहीं आती। वो कमला है — भैरव की माँ। और अगर ये रजिस्टर कहता है कि वो ज़िंदा गवाह है, तो इसका मतलब…"

"मतलब ये है," मैंने कहा, "कि वो बीस साल से जो जानती है, वो किसी को नहीं बता पाई।"

मैं उठा। रजिस्टर अपने सीने से लगाया, और पलटकर गाँव की तरफ़ देखा।

"चल," मैंने कहा। "पहले कमला के पास।"

हम भागे। रास्ते में मेरे फेफड़े जल रहे थे, और मेरी टाँगें भारी हो रही थीं, पर मैं रुका नहीं। टिंकू पीछे था, और मीरा मेरे साथ।

जब हम गाँव पहुँचे, तो सुबह की पहली किरण आसमान पर फैल रही थी। मुर्गे बाँग दे रहे थे, और किसी के घर से चूल्हे का धुआँ उठ रहा था। पर मेरे घर के पीछे वाला कमरा — वो चुप था। बिलकुल चुप।

मैंने दरवाज़ा खटखटाया। कोई जवाब नहीं।

"कमला दादी," मैंने कहा। "मैं वीर हूँ। सरस्वती का बेटा।"

अंदर से कोई हलचल नहीं हुई।

मैंने दरवाज़ा धक्का दिया। वो खुल गया।

अंदर अँधेरा था, और हवा में धुएँ की गंध थी। मैंने अंदर कदम रखा। कमरे के कोने में एक चारपाई थी, और उस पर कोई बैठा था — एक बूढ़ी औरत, सफ़ेद बाल, झुकी हुई कमर। उसके हाथ में एक छोटा-सा दीया था, जो बुझा हुआ था।

वो मेरी तरफ़ देखकर नहीं हिली। सिर्फ़ उसकी आँखें मेरी तरफ़ उठीं।

"तू आ गया," उसने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ सूखी थी, जैसे बरसों से बोली न हो। "मैं जानती थी तू आएगा। तेरी माँ ने बताया था।"

"तुमने माँ से बात की?"

"वो रोज़ आती है," कमला ने कहा। "रोज़ मेरे लिए रोटी रख जाती है। बीस साल से। और मैं रोज़ उसे देखती हूँ, और कुछ नहीं बोलती। क्योंकि अगर बोल दिया, तो माधव मुझे मार देगा।"

मैं उसके पास बैठ गया।

"मैं तुम्हें मारने नहीं आया," मैंने कहा। "मैं तुमसे सच पूछने आया हूँ।"

मैंने रजिस्टर खोला और उस पन्ने को उसकी तरफ़ किया जिस पर उसका नाम लिखा था — "गवाह — कमला। ज़िंदा।"

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