Spirit of a Fighter – Chapter 474
"पर बेटा…" सुक्खी बुआ का पल्लू फिर खिसका। "अगर उस मिट्टी में कुछ है तो? हम तो गाँव के लोग हैं, हमें क्या पता—"
"मिट्टी में कुछ नहीं है।" ये मीरा ने कहा। वो मेरे पीछे आकर खड़ी हो गई थी। "मैंने उस मिट्टी के सैंपल लिए हैं। आप चाहें तो मेरे साथ चलकर देख लीजिए।"
किसी ने कुछ नहीं कहा।
तभी रणवीर सिंह की आवाज़ आई। वो अब भी वहीं खड़े थे, अपने पैरों पर, सहारे के लिए लाठी पकड़े। उनका चेहरा पसीने से भीगा था।
"सुनो सब," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर वो टूटी नहीं थी। "आज मैं अपने पैरों पर खड़ा हूँ। बीस साल बाद। और मैं आप सबसे एक बात कहना चाहता हूँ।"
लोग रुक गए।
"मैंने भी उस डर को जिया है," उन्होंने कहा। "बीस साल। हर रात सोचता था कि मेरे पानी में कोई कुछ डाल देगा। हर सुबह जागता था तो लगता था कि आज मेरे बेटे के साथ कुछ हो जाएगा। और मैं चुप रहा। क्योंकि डर मुझे अंदर से खा रहा था।"
वो रुके। उन्होंने अपनी मूँछों को पोंछा।
"आज भैरव जा रहा है," उन्होंने कहा। "और मैं आप सबसे वादा करता हूँ — जो मिट्टी मेरे पैरों ने जानी है, वो किसी का हिसाब नहीं लिखती। वो सिर्फ़ ताकत देती है। उन लोगों को, जो उसमें पसीना डालते हैं।"
लोगों में कुछ फुसफुसाहट हुई।
फिर बसंता का बूढ़ा बाप आगे आया। उसकी आँखें लाल थीं, हाथ काँप रहे थे।
"रणवीर," उसने कहा। "मेरा बसंत भी मरा था। तेरे अखाड़े में। और मैंने अपने बेटे की मौत को बुखार कहकर गला घोंट लिया था।"
रणवीर सिंह ने उसकी तरफ़ देखा।
"आज तू खड़ा है," बूढ़े ने कहा। उसकी आवाज़ भर्रा गई। "मेरा बेटा नहीं खड़ा है। पर मैं तुझे गलियाँ नहीं दूँगा। क्योंकि तूने भी अपने बीस साल खोए हैं।"
वो थोड़ा रुका।
"बस एक बात कहूँगा," उसने कहा। "तू जब अखाड़ा खोले, तो उसमें मेरे बेटे की तस्वीर दीवार पर टाँग दे। उसे सबको याद रहे कि वहाँ कोई बसंत भी आता था।"
रणवीर सिंह ने अपनी लाठी के सहारे सिर झुकाया।
"टाँग दूँगा," वो बोले। "दीवार पर। और उसके नीचे लिखूँगा — यहाँ कोई ज़हर नहीं घुलेगा।"
बूढ़ा रोने लगा। और उसके साथ दो और औरतें रोने लगीं। फिर चार और। कोई किसी को नहीं रोक रहा था। इतना दुख मेरे सामने खुला खड़ा था और मैं उसे देख सकता था।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। माँ चबूतरे के किनारे खड़ी थीं। पीतल का ढक्कन अब भी उनके हाथ में था। उनकी आँखें भरी हुई थीं, पर वो रो नहीं रहीं थीं। वो बस देख रही थीं।
और मैंने उन्हें पहली बार इतनी थकी देखा।
मेरे पैर अपने आप उनकी तरफ़ बढ़ गए। मैंने उनके सामने घुटने टेके। मेरी आवाज़ थी ही नहीं, सिर्फ़ हवा निकल रही थी।
"माँ," मैंने कहा। "घर चलिए।"
उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा। उनकी हथेली में चक्की वाली गरमी थी, और उस गरमी में उन सब सुबहों की गंध थी जो उन्होंने मेरे लिए सही थीं।
"पहले तहखाना," उन्होंने कहा।
मैंने ऊपर देखा।
"माँ—"
"अभी भी वो मिट्टी वहीं रखी है," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, पर एक भी शब्द कमज़ोर नहीं था। "और भैरव ने जाते वक़्त उसका नाम लिया। जब तक वो मिट्टी शांत नहीं होगी, मुझे नींद नहीं आएगी।"
कालू काका पीछे खड़े थे। उन्होंने अपना कुबड़ा शरीर सीधा करने की कोशिश की।
"मैं चलूँगा," उन्होंने कहा। "मेरी मिट्टी है। मेरा हिसाब है।"
तो हम चले। मैं, माँ, मीरा, कालू काका और टिंकू। टिंकू ने अपनी दुकान का शटर बंद किया और अपनी मिठाई की डिब्बी उठा ली — जैसे उसे पता हो कि वहाँ जाकर किसी को कुछ खाने की ज़रूरत पड़ेगी।
लुट्टन भी साथ आया। वो अब भी घायल था, पर उसने कहा कि लंगड़ाकर भी चलेगा।
रास्ते में मीरा मेरे पास आई।
"तुम ठीक हो?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"झूठ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। धूप उसके छोटे बालों पर पड़ रही थी और उसकी आँखों के नीचे वो गहरे घेरे थे जो मुझे कल रात से याद थे।
"तुम्हारी नाक?" उसने पूछा। "तुम सुबह से अजीब गंध सूँघ रहे हो। मैं देख रही हूँ। तुम बार-बार अपने हाथ सूँघते हो।"
मैं रुक गया।
"तुम कैसे जानती हो?"
"क्योंकि मैं तुम्हें देखती हूँ," उसने कहा। "और तुम्हारे हाथों पर स्याही लगी है। तुमने काग़ज़ पढ़े हैं। और उनमें कुछ ऐसा लिखा है जो तुम्हें खा रहा है।"
मैंने सामने देखा। टिंकू आगे चल रहा था और वो मुझे नहीं सुन सकता था।
"मीरा," मैंने कहा। "जब भैरव गया, तो उसने कहा कि तहखाने की मिट्टी सबका हिसाब लिखेगी। और मुझे तब से वही गंध आ रही है। जली मिट्टी की। पर ये गंध कुएँ से नहीं आ रही। ये मुझसे आ रही है।"
वो चुप हो गई।
फिर उसने मेरी बाँह पकड़ी और मुझे रोका।
"वीर।" उसकी आवाज़ वो आवाज़ नहीं थी जो कोर्ट में बहस करती थी। वो धीमी थी। "तुमने कल क्या किया था?"
"क्या?"
"तहखाने में। उस मिट्टी के साथ।"
मैंने याद किया। कल रात मैंने उस मिट्टी में हाथ डाले थे। मैंने उसे हथेलियों में भरा था। मैंने उससे माँ को ढक्कन दिलाया था। और उससे पहले, उससे बहुत पहले, मैंने उसमें अपना पसीना गिराया था — जब पहली बार कुएँ की सीढ़ियाँ उतरा था।
"मैंने उसे छुआ था," मैंने कहा। "बहुत बार।"
"तो फिर ये तुम्हारी गंध है," मीरा ने कहा। "तुम्हारा पसीना उस मिट्टी से मिला है। तुम उसे सूँघ रहे हो। तुम उसे सूँघ रहे हो क्योंकि तुम्हें लग रहा है कि तुमने कुछ ग़लत किया।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मैंने क्या ग़लत किया?"
उसने मेरी बाँह छोड़ी।
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "पर तुम्हें पता है। और तुम मुझे नहीं बताओगे, तो मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकती।"
वो मेरे सामने खड़ी हो गई। सड़क के बीच। धूल में। और वो मुझे देख रही थी, बिना पलक झपके।
"मीरा—"
"तुम कल मुझसे कह रहे थे कि तुम्हारी नाक सबसे बड़ी सच्चाई है," उसने कहा। "और आज तुम अपनी ही नाक से झूठ बोल रहे हो।"
मैं हँसा। बिना मतलब। ऐसे हँसी जो बाहर निकल भागती है जब अंदर सब कुछ टाइट हो।
"तुमने भैरव की बात मान ली," मैंने कहा। "उसने कहा कि सच बोलने वाला अकेला मरता है, और तुम सोच रही हो कि कहीं वो सच बोल गया।"
वो रुकी।
"हाँ," उसने कहा। "मैं सोच रही हूँ।"
"तो?"
"तो?" उसने भौंहें चढ़ाईं। "तो ये है कि तुम मुझे क्यों नहीं बता रहे? तुम्हारे साथ कोई और है जो तुम्हें बता सकता है? तुम्हारे साथ मैं हूँ, टिंकू है, कालू काका हैं। और तुम फिर भी अपने हाथ सूँघते चल रहे हो। तुम अकेले मरने की तैयारी कर रहे हो।"
उसका गला भर आया। उसने जल्दी से मुँह फेर लिया।
"मैंने तुम्हारे पापा की टूटी घड़ी दी थी," उसने कहा। उसकी आवाज़ में अब वो कोर्ट वाली सख्ती नहीं थी। "जिस दिन सच खुलेगा, चलती हुई लौटाना। और मैंने वो घड़ी इसलिए नहीं दी थी कि तुम अकेले लड़ो। मैंने इसलिए दी थी कि मैं तुम्हारे साथ चलूँ।"
मेरे अंदर कुछ टूटा। मैंने उसे रोका नहीं। पर जो टूटा वो बुरा नहीं था। वो ऐसा था जैसे किसी गाँठ को उँगली से खोल दिया जाए।
"मुझे डर है," मैंने कहा।
वो मेरी तरफ़ मुड़ी।
"भैरव ने जो कहा, वो मैं मानता हूँ," मैंने कहा। "इसीलिए डर है। क्योंकि मैंने आज देखा — सब सच बोल रहे थे, और सब रो रहे थे। बसंता का बाप रोया। सुक्खी बुआ रोई। तुम्हारे पापा की आवाज़ काँप रही थी। और मेरी माँ—"
मैं रुका।
"माँ ने आज पहली बार मुझे थका हुआ देखा," मैंने कहा। "और मेरे अंदर ये आया कि मैंने इन सबको खींच लिया। मैंने चबूतरे पर सबके सामने सच खोला, और सच ने सबको तोड़ दिया। अगर यही सच है, तो मैं इसे और क्यों खोलूँ?"
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