Spirit of a Fighter – Chapter 419
मैंने कुर्सी देखी। वो मंच के ठीक नीचे रखी थी — एक पुरानी, चमड़े वाली कुर्सी, जिसकी एक टाँग में लकड़ी का टुकड़ा ठोका हुआ था। मेरे पेट में एक ठंडी सी चीज़ चली। ये कुर्सी कोई नई नहीं थी। ये रणवीर सिंह की पुरानी कुर्सी थी, जो अखाड़े में रहती थी, जिस पर वो बैठकर अपने पहलवानों को देखते थे।
माधव सिंह ने मेरी नज़र फ़ॉलो की।
"हाँ, वो तुम्हारी ही कुर्सी है, रणवीर," उन्होंने कहा। "मैंने सोचा, तुम्हें अपनी जगह पर बैठाकर बात करूँ। पुरानी यादें ताज़ा हो जाएँगी।"
ये ताना था, और सबने सुना।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा पत्थर जैसा था, पर उसकी उँगलियाँ अपनी साड़ी के पल्लू को ऐंठ रही थीं, जैसे उस कपड़े में उसने अपना सारा गुस्सा भर दिया हो।
मैं आगे बढ़ा। एक कदम, दो कदम। मेरे जूते की आवाज़ मिट्टी पर साफ़ सुनाई दी।
"सरपंच साहब," मैंने कहा। मेरी आवाज़ काँपी, पर मैं रुका नहीं। "फ़ाइल पढ़ने से पहले एक बात कह दूँ?"
माधव सिंह मुस्कुराए। "बोलो, ईंट ढोने वाले।"
भीड़ में कुछ लोग हँसे। मेरे कान जले, पर मैंने गर्दन नीची नहीं की।
"अगर ये ज़मीन भैरव के नाम है, तो भैरव कहाँ है? अपनी ज़मीन का मालिक अपने आँगन में नहीं, और सरपंच साहब मंच पर? अजीब बात है।"
हँसी रुक गई। माधव सिंह की आँखें सिकुड़ीं। एक पल के लिए उनका चेहरा बदला, जैसे किसी ने परदा हटा दिया हो, और फिर वो वापस मुस्कुरा दिए।
"भैरव अपने काम पर है," उन्होंने कहा। "और मैं यहाँ पंचायत के काम पर हूँ। ये ज़मीन पंचायत की नज़र में है, क्योंकि इस पर एक खून हुआ था।"
"किसका खून?" मैंने पूछा।
"तुम्हारे पापा का," रणवीर सिंह ने कहा।
सब चुप हो गए। मैंने पलटकर देखा। रणवीर सिंह की आँखें अब मंच पर नहीं थीं — वो मुझे देख रहे थे। और उनकी आवाज़ साफ़ थी, काँपती नहीं।
"माधव," वो बोले, कुर्सी से आगे झुककर, "ये बात तूने चालीस साल पहले भी कही थी। उस दिन तू मेरे पास आया था, और बोला था कि मेरे पिता की मौत का कागज़ पंचायत में दर्ज है। और मैंने तुझे क्या कहा था, याद है?"
माधव सिंह ने फ़ाइल बंद कर दी। धीरे से। जैसे कोई ताला बंद करता है।
"रणवीर," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार कोई झिझक आई, "पुरानी बातें मिट्टी में दबी रहने दे। आज हम नए कागज़ पर बात करें।"
"नहीं," रणवीर सिंह ने कहा। "आज हम पुरानी बात पर ही बात करेंगे। क्योंकि ये फ़ाइल"—उन्होंने फ़ाइल की तरफ़ उँगली उठाई—"मेरे पापा की मेज़ से गायब हुई थी, उसी रात जब उनकी लाश अखाड़े में मिली थी। और उस रात तू मेरे घर आया था, माधव। तूने मेरी माँ को चाय पिलाई थी।"
अखाड़े में हवा रुक गई।
माधव सिंह ने कुछ कहना चाहा, पर रणवीर सिंह ने हाथ उठा दिया।
"मैं आज यहाँ अपने पापा की ज़मीन माँगने नहीं आया," वो बोले। "मैं अपने पापा का नाम माँगने आया हूँ। और ये नाम तेरी उस फ़ाइल से नहीं, इस अखाड़े की मिट्टी से निकलेगा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"वीर," वो बोले, "मुझे मिट्टी लाकर दो।"
मैंने मंच की तरफ़ नहीं देखा। मैं झुका, और मुट्ठी भर मिट्टी उठाई। वो गर्म थी, दोपहर की धूप से तपी हुई, और उसमें वो गंध थी जो मैं बचपन से जानता था — पसीना, हल्दी, और पुराने पत्थरों की नमी।
मैंने वो मिट्टी उनकी हथेली पर रख दी।
रणवीर सिंह ने उसे दोनों हाथों में भरा, आँखों के पास ले गए, और गहरी साँस ली। उनकी आँखें बंद हो गईं। उनके होठ हिले, कुछ ऐसा जो किसी ने नहीं सुना। और फिर उन्होंने आँखें खोलीं, और मैंने देखा — उनकी आँखों में पानी था, पर वो चेहरे पर मुस्कान थी।
"अब ठीक है," वो बोले। "अब मैं बोल सकता हूँ।"
मीरा ने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। मैंने पलटकर देखा। उसकी आँखों में भी पानी था, पर उसने पोंछने की कोशिश नहीं की।
"तुमने ठीक किया," उसने धीरे से कहा। "पापा को मिट्टी चाहिए थी।"
उसकी आवाज़ में वो नरमी थी जो मैंने पहली बार सुनी। मेरे अंदर कुछ हिला — वो वाला ज़ख़्म फिर से, और इस बार वो भरता हुआ लगा।
माधव सिंह ने मंच से नीचे घूरा।
"ये नाटक बहुत हो गया," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ठंडक अब गुस्से में बदल रही थी। "रणवीर सिंह, मैं तुम्हें आख़िरी बार कहता हूँ — ये ज़मीन पंचायत की है, और तुम यहाँ किसी और के हक़ की बात नहीं करोगे। तुम्हारे पास कागज़ नहीं है, गवाह नहीं है, और तुम्हारे पैर तो चलते भी नहीं।"
वो रुके। फिर मुस्कुराए, और अपनी फ़ाइल फिर खोली।
"पर मैं दिलदार हूँ," वो बोले। "मैं तुम्हें एक मौका देता हूँ। ये फ़ाइल मैं तुम्हें दे दूँगा — पढ़ने के लिए। बस एक शर्त है। तुम अपने इस लड़के को यहाँ से भेज दो। मुझे इसकी सूरत पसंद नहीं।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी नज़र में वो चीज़ थी जो मुझे अखाड़े के बाहर वाले दो आदमियों की आँखों में दिखी थी। पहचान। जैसे उन्होंने मुझे कहीं देखा है, और वो जगह मुझे याद नहीं।
"मैं नहीं जाऊँगा," मैंने कहा।
"वीर," मीरा ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ा। "चुप रहो।"
"नहीं," मैंने कहा, और अपना हाथ नहीं छुड़ाया। "मैं इसीलिए आया हूँ।"
माधव सिंह हँसे। ज़ोर से।
"अच्छा?" उन्होंने कहा। "तो बताओ, ईंट ढोने वाले। तुम इस अखाड़े के बारे में क्या जानते हो?"
मैंने एक साँस ली। मेरे अंदर जो डर था, वो मेरे हाथों में काँप रहा था, पर मेरी आवाज़ साफ़ निकली।
"मैं जानता हूँ कि पिछले एक साल में ग्यारह पहलवान इस अखाड़े से निकले," मैंने कहा, "और उन ग्यारह की गंध बदल गई थी। उनके पसीने में वही कड़वाहट आ गई थी जो उस पानी में है जो यहाँ पिलाया जाता है। मैं जानता हूँ कि वो पानी कहाँ से आता है।"
माधव सिंह की मुस्कान एक पल के लिए रुकी।
"और मैं जानता हूँ," मैंने कहा, "कि वो पानी तुम्हारे घर से आता है।"
सन्नाटा। इतना गहरा कि मुझे अपनी साँस सुनाई दी।
माधव सिंह ने फ़ाइल बंद की। इस बार ज़ोर से। और उन्होंने मंच के किनारे पर कदम रखा।
"ये लड़का," उन्होंने रणवीर सिंह से कहा, पर उनकी आँखें मुझ पर थीं, "तुम्हारे साथ कहाँ से आ गया?"
"ये मेरा बेटा है," रणवीर सिंह ने कहा।
मेरा दिल एक पल को रुक गया।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
॥
मैंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी सूख चुका था, पर उसकी जगह अब कुछ और था। कुछ ठंडा। कुछ जो बीस साल से दबा बैठा था और आज बाहर आ रहा था।
"मेरा बेटा है," उन्होंने फिर कहा, इस बार ज़ोर से, ताकि पूरा अखाड़ा सुन ले। "रघुवीर का बेटा। और उसका हक़ है यहाँ बोलने का।"
माधव सिंह की उँगलियाँ फ़ाइल पर कस गईं। मैंने उनकी आँखों में वो हिसाब देखा जो हर बुरा आदमी आख़िरी घड़ी में करता है — कितना सच बोलूँ, कितना छिपाऊँ, कहाँ से हमला करूँ।
तभी मंच के पीछे से भैरव सिंह निकला। उसने माधव सिंह के कान में कुछ कहा। माधव सिंह की उँगलियाँ ढीली हुईं। उन्होंने फ़ाइल बगल में दबा ली और मंच के आगे आ गए।
"आज यहाँ फ़ैसला होगा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो मिठास लौट आई थी जो सरपंचों के पास होती है। "अखाड़े का काग़ज़ किसका है, ये आज सबके सामने तय होगा।"
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