Spirit of a Fighter – Chapter 417
फिर वो हँसा। पर हँसी में वो दम नहीं थी जो अभी थी।
"तो तू वो बच्चा है," उसने धीरे से कहा। "जो उस रात गायब हो गया था। मैंने सोचा तुझे कोई उठा ले गया। पर तू तो बड़ा होकर लौटा है।" उसने चिट्ठी ऊपर उठाई। "अच्छा ही हुआ। आज दोपहर सबके सामने तेरे पापा की चिट्ठी पढ़ूँगा। फिर देखते हैं तेरे पापा की इज़्ज़त में कितना दम है।"
"पढ़ लेना," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो आग से भी ज़्यादा जलाती है। "पर पढ़ने से पहले एक बात सुन ले। मैंने बीस साल सोचा कि मेरी जीत ने शेर सिंह को तोड़ दिया। आज सुबह इस लड़के ने मुझे बताया कि शेर सिंह का पानी में ज़हर था। और ज़हर किसने दिया, वो मुझे पता है।"
भैरव की मुस्कान गायब हो गई।
"तू झूठ बोल रहा है," वो बोला, पर उसकी आवाज़ में पहली बार काँपन आया।
रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा, और फिर उन्होंने अपनी कुर्सी के हत्थे पर हाथ रखा। और फिर, जैसे कोई बीस साल की नींद से जाग रहा हो, वो उठने लगे। उनकी टाँगें काँपी। मीरा दौड़कर आई, पर उन्होंने हाथ उठाकर उसे रोका। वो खड़े हुए — एक पल के लिए। फिर गिर पड़े।
मीरा चीखी और उन्हें सहारा दिया। पर रणवीर सिंह ज़मीन पर बैठे हुए हँसने लगे। पहले धीरे, फिर ज़ोर से। और उस हँसी में बीस साल का दर्द था।
"देख, भैरव," वो बोले, आँसू उनके चेहरे पर बह रहे थे, "मैं अब भी नहीं उठ सकता। पर मेरी मिट्टी में जो आदमी खड़ा है, वो तेरे सारे काग़ज़ जला देगा।"
फिर उन्होंने मेरी कलाई पकड़ी। उनकी पकड़ में वो ताकत थी जो कुर्सी में नहीं, आँखों में थी।
"तू उसका बेटा है ना? मुझे तेरी आँखों में शेर सिंह दिखता है।"
और फिर वो फूट-फूटकर रोए। बीस साल का दबा हुआ आँसू, जैसे टूटा हुआ बाँध। मीरा ने उनका सिर अपनी गोद में रखा और उनके बालों में हाथ फेरने लगी, और उसकी अपनी आँखों से भी पानी बह रहा था। मेरा गला भर आया। मैं चुपचाप खड़ा रहा, और मेरे सीने में एक ही बात थी — पापा, देखो, आपका दोस्त अब भी आपके लिए रो रहा है।
तभी बाहर से सुक्खी बुआ की चिल्लाहट आई, जैसे किसी ने आग लगा दी हो।
"अरे मीरा! तेरे घर के बाहर भैरव के आदमी खड़े हैं, कह रहे हैं आज दोपहर तक तेरे पापा अखाड़े आएँ, वरना अखाड़े की ज़मीन के कागज़ ज़ब्त हो जाएँगे!"
रणवीर सिंह ने मेरी कलाई और कसकर पकड़ी। मीरा ने सिर उठाया। और भैरव, जो अब तक सन्न खड़ा था, धीरे से मुस्कुराया।
"सुन लिया?" उसने कहा। "खेल शुरू हो गया है। अब देखते हैं, तेरे पापा का बेटा कितना बड़ा शेर है।"
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"सुन लिया?" भैरव ने कहा। "खेल शुरू हो गया है। अब देखते हैं, तेरे पापा का बेटा कितना बड़ा शेर है।"
और फिर वो पलटा और अपने आदमियों के साथ अखाड़े के अंदर की तरफ़ चला गया। उसके कदमों की आवाज़ मिट्टी पर ऐसी गिर रही थी जैसे किसी ने ढोल पर चोट मारी हो। मैं उसके पीछे देखता रहा, और मेरे अंदर एक चीज़ जल रही थी।
मीरा ने अपने पापा का सिर धीरे से उठाया। रणवीर सिंह के चेहरे पर अब भी पानी था, पर आँखें साफ़ थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली।
"अंदर चलिए," मीरा ने कहा। "यहाँ खड़े रहना ठीक नहीं।"
हम लोग रणवीर सिंह को सहारा देकर अंदर ले गए। उनका घर अखाड़े से सटा हुआ था — एक पुराना मकान, जिसकी दीवारों पर कुश्ती के पुराने फोटो लगे थे। फोटो में एक लंबा, चौड़ा आदमी मिट्टी में खड़ा हँस रहा था। पैरों के नीचे मिट्टी, और आँखों में वो चमक जो अब रणवीर सिंह की आँखों में सिर्फ़ झलक कर रह गई थी।
जैसे ही हम अंदर पहुँचे, बाहर गेट पर ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ें आने लगीं।
"रणवीर सिंह! बाहर आओ! भैरव सिंह का हुक्म है!"
मीरा की मुट्ठी भिंच गई। वो उठी, और मैंने उसके चेहरे पर वो ज़िद देखी जो मैं पहले भी देख चुका था — जब वो अखाड़े में मेरे जूतों पर झगड़ी थी।
"मैं देखती हूँ," वो बोली और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी।
मैं उसके पीछे चला।
गेट पर दो आदमी खड़े थे। एक मोटा, जिसकी गर्दन पर सोने की चेन थी, और दूसरा पतला, जिसके हाथ में एक काग़ज़ था। पतले वाले ने काग़ज़ आगे बढ़ाया।
"ये अखाड़े की ज़मीन का काग़ज़ है," वो बोला। "भैरव सिंह का हस्ताक्षर है। आज दोपहर तक रणवीर सिंह अखाड़े आकर ये काग़ज़ मानें, वरना ज़मीन सरकार के नाम।"
मीरा ने काग़ज़ पढ़ा। उसका चेहरा एक पल के लिए सफ़ेद पड़ गया, फिर लाल। उसने हाथ बढ़ाया — काग़ज़ छीनने के लिए, फाड़ने के लिए।
मैंने उसकी कलाई पकड़ ली।
"मैडम," मैंने धीरे से कहा, "सबूत मत फाड़ो। यही तो हमारा हथियार है।"
वो रुक गई। मेरी तरफ़ देखा। और उसकी आँखों में पहले तो गुस्सा आया — जैसे कह रही हो, तू मुझे क्यों रोकता है। पर फिर कुछ बदला। उसने एक गहरी साँस ली, हाथ नीचे किया, और धीरे से मुस्कुरा दी।
ये पहली बार था जब उसने बिना झगड़े के मेरी बात मानी।
मेरे अंदर कुछ हिला। उस मुस्कान में जो बात थी, वो मैं कभी नहीं भूलूँगा। ऐसा लगा जैसे सूखी ज़मीन पर पहली बारिश की एक बूँद गिरी हो।
मैं उन दोनों आदमियों के सामने गया।
"जाकर भैरव से कहो," मैंने कहा। "रणवीर सिंह आएँगे। पर उनके साथ मैं भी आऊँगा।"
मोटे वाले ने मुझे ऊपर से नीचे देखा। "तू कौन है?"
"जो उसकी अलमारी खोल देगा।"
दोनों एक-दूसरे को देखकर हँसे। पर उनकी हँसी में वो मज़ा नहीं था जो पहले था। पतले वाले ने काग़ज़ समेटा और दोनों बिना कुछ बोले चले गए।
मैं अंदर लौटा। मीरा मुझे देख रही थी, और उसकी आँखों में कुछ नया था।
"तुमने सही किया," वो बोली।
"क्या?"
"रोका। अगर मैंने काग़ज़ फाड़ दिया होता, तो आज उनके पास एक और हथियार आ जाता — 'देखो, रणवीर सिंह की बेटी ने काग़ज़ फाड़ दिया।'"
मैं मुस्कुरा दिया। "मैडम, मुझे लगा तुम हमेशा झगड़ने के लिए तैयार रहती हो।"
"मैं हूँ," वो बोली, और इस बार उसकी आवाज़ में हल्की हँसी थी। "पर सबूत के सामने नहीं।"
अंदर रणवीर सिंह कुर्सी पर बैठे थे। उनके हाथ काँप रहे थे — बुढ़ापे से नहीं, किसी और चीज़ से। उन्होंने मुझे देखा।
"मैं जाऊँगा," उन्होंने कहा। आवाज़ धीमी थी, पर पक्की।
"पापा," मीरा ने कहा, "आप इस हालत में कैसे जाएँगे? वो लोग…"
"व्हीलचेयर पर।" मैंने कहा।
दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।
"अखाड़ा उनका घर है," मैंने कहा। "वो अपना घर देखेंगे। चलकर नहीं तो बैठकर — पर देखेंगे।"
रणवीर सिंह की आँखों में पहली बार चमक आई। वो चमक जो पुराने फोटो में थी। उन्होंने अपना सिर हिलाया, फिर धीरे से एक हाथ उठाया और मेरे कंधे पर रखा।
"तू जानता है," वो बोले, "मैंने बीस साल में एक बार भी उस अखाड़े का रास्ता नहीं देखा। रोज़ सुबह मैं यहाँ बैठकर उस दीवार को देखता हूँ, और मुझे वो मिट्टी याद आती है। वो लाल मिट्टी, जो मेरे पैरों से चिपकती थी।"
उनकी आवाज़ रुक गई। मीरा ने अपना हाथ उनके कंधे पर रखा।
"मैं तुम्हें नहीं रोकूँगी," वो बोली। "पर एक शर्त है — तुम बीच में कुछ नहीं बोलोगे। बस देखोगे।"
रणवीर सिंह हँसे। "बेटी, जिस आदमी के पैर न चलते हों, उससे क्या बोलना।"
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