Spirit of a Fighter410 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 410

7 min read November 5, 2026

तीसरी बार में मेरी कलाई का जला निशान चिल्ला उठा। लोहे की चटक की आवाज़ आई, और दीवार हिली। मिट्टी झड़ने लगी — सूखी, बारीक, जैसे कोई बहुत सालों पुरानी चादर झाड़ रहा हो। और फिर मेरी आँखों के सामने एक दरवाज़ा बना — छोटा, चौड़ा, लकड़ी का, जिस पर लोहे के पत्ते जड़े थे।

"ये…" टिंकू ने मशाल आगे की, "ये तो मिट्टी के अंदर बना है। ऊपर से देखकर कोई नहीं बता सकता था।"

"कोई बताना भी नहीं चाहता था," हरनाम बोला। उसने रूमाल से अपना चश्मा पोंछा। "जो इसे छिपाता है, वो जानता है इसके अंदर क्या है।"

मैंने दरवाज़े पर हाथ रखा। लकड़ी सील से फूली हुई थी, कहीं-कहीं से कीड़े लगे थे। पर लोहे के पत्ते साफ़ थे — जैसे किसी ने उन्हें बार-बार छुआ हो।

"धक्का दो," मैंने कहा।

हम तीनों ने एक साथ ज़ोर लगाया। पहली बार में कुछ नहीं हुआ। दूसरी बार में दरवाज़े की जगह से हवा निकली — ठंडी, सीलन भरी, और उसके साथ एक गंध आई। मैंने नाक खींची। ताज़ी खोदी मिट्टी। और उसके नीचे… धुआँ। वही धुआँ जो मैंने नहर के मोड़ पर सूँघा था।

"रुको," मैंने कहा। "अंदर कोई है।"

टिंकू ने मशाल पीछे की। "कौन?"

"पता नहीं। पर मिट्टी ताज़ी है। और धुआँ भी।" मैंने हरनाम की तरफ़ देखा। "भैरव यहाँ से गुज़रा है। आज रात।"

हरनाम का चेहरा पीला पड़ गया। "तो वो हमसे पहले पहुँच गया?"

"नहीं।" मैंने दरवाज़े को फिर धक्का दिया, और इस बार वो ज़ोर से चरचराकर खुला। "वो अभी भी यहीं कहीं है।"

अंदर का अंधेरा ऊपर से अलग था। मशाल की रोशनी अंदर घुसी, तो लगा जैसे कोई गहरी कुएँ में पत्थर डाल रहा हो — रोशनी दूर तक नहीं पहुँची। एक सुरंग थी, सीधी आगे जाती हुई। दीवारें काली पड़ी थीं, पर कहीं-कहीं पर दीये के निशान थे — कालिख के गोल घेरे, जैसे उन पर सैकड़ों साल तक आग जली हो।

टिंकू ने पहला कदम रखा और तुरंत रुक गया। "भाई, यहाँ हवा चल रही है।"

"हवा मतलब रास्ता," हरनाम बोला। "सुरंग बंद नहीं है। इसका दूसरा मुँह भी है।"

मैं आगे बढ़ा। मेरे पैरों के नीचे की मिट्टी नरम थी, जैसे किसी ने अभी-अभी उसे गूंधा हो। मैंने नीचे देखा। पैरों के निशान थे — बड़े, भारी, चौड़े। भैरव के। और उनके साथ छोटे निशान भी — जैसे कोई घसीटता हुआ चल रहा हो।

"हरनाम भाई," मैंने धीरे से कहा। "इन निशानों में कोई घसीटा जा रहा है।"

हरनाम ने लालटेन नीचे की। उसकी साँस रुक गई। "या कोई खुद घसीटकर जा रहा है।"

टिंकू ने मेरी बाँह पकड़ ली। "भाई, मैं तो यहाँ से…" वो रुका, गला साफ़ किया, और फिर वो बात बोली जो उसने कभी नहीं बोली थी। "मैं तो यहाँ से भाग जाना चाहता हूँ। सच कह रहा हूँ। मेरे पैर नहीं चल रहे।"

मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा। "तो मेरी कमीज़ पकड़। मैं चलूँगा।"

"तू नहीं समझ रहा।" उसकी आवाज़ भर्राई। "मैं डरा हुआ हूँ। ऐसा डरा हुआ कि मेरे हाथ काम नहीं कर रहे। मैं मिठाई वाला हूँ, वीर। मैंने कभी किसी को मारा नहीं, कभी किसी की जान नहीं बचाई। मैं सिर्फ़ खीर बना सकता हूँ।"

मैं रुका। मैंने मशाल हरनाम को दी और टिंकू की तरफ़ मुड़ा। उसका चेहरा मशाल की पीली रोशनी में गीला दिख रहा था।

"टिंकू," मैंने कहा, "तूने आज तक जो सबसे बड़ा काम किया है, वो ये है कि तू मेरे साथ यहाँ उतरा। डर के बावजूद। मैं जानता हूँ तेरे पैर काँप रहे हैं — मेरे भी काँप रहे हैं। देख।" मैंने अपना हाथ आगे किया। काँप रहा था। "पर अगर हम आज यहाँ से भाग गए, तो कल कोई और माँ अपने बेटे को मिट्टी में लिपटा देखेगी। और मैं वो नहीं सह सकता। तू सह सकता है?"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने आँखें मलीं, और अपनी टोपी ठीक की। "खीर ठंडी हो रही होगी," वो बोला।

"होगी।"

"तो चल, जल्दी निकल। मुझे घर जाना है।"

हम आगे बढ़े। सुरंग थोड़ी ढलान पर थी, जैसे ज़मीन के नीचे उतर रही हो। दीवारों पर कुछ खुदा हुआ था — छोटे-छोटे चिह्न, कुछ संकेत। हरनाम ने लालटेन उनके पास लाई और अपनी उँगली उन पर फिराई।

"ये तो…" उसकी आवाज़ में एक अजीब सी घबराहट थी, "ये तो बहुत पुराने चिह्न हैं, वीर। मेरे पिता बताते थे कि हमारे इलाक़े में साधु लोग ज़मीन के नीचे रास्ते बनाते थे। एक गाँव से दूसरे गाँव तक। ऐसे रास्तों से वो डाकुओं से बचते थे, बीमार लोगों को ले जाते थे।"

"तो ये सुरंग दूसरे गाँव तक जाती है?"

"पता नहीं। पर ये सैकड़ों साल पुरानी है। इसका होना ही मतलब है कि यहाँ कोई बहुत पहले से आता-जाता रहा है।"

मैं चलता रहा। सुरंग की हवा ठंडी थी, पर अब मुझे उसमें कुछ और महसूस हुआ — नमी के नीचे एक हल्की सी मिठास। जैसे कोई बहुत पुरानी लकड़ी जल रही हो। मैंने नाक खींची और रुक गया।

"हरनाम भाई, तुम्हारे घर में क्या कोई बीमार था?"

हरनाम ठिठक गया। "क्यों?"

"क्योंकि तुम्हारी साँस में आज कुछ अलग है।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "जैसे तुमने कुछ पिया हो। कुछ गर्म।"

वो एक पल चुप रहा। फिर वो दीवार के सहारे बैठ गया — सीधे मिट्टी पर, अपने साफ़ कपड़े की परवाह किए बिना। लालटेन उसके हाथ में थी, और उसकी रोशनी में उसका चेहरा दिख रहा था — जैसे किसी ने उससे दस साल छीन लिए हों।

"मुझे तुझसे एक बात कहनी है," वो बोला। "जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई। न अपनी बीवी को, न अपनी बेटी को।"

मैं उसके सामने बैठ गया। टिंकू भी पास आकर खड़ा हो गया।

"बोलो।"

हरनाम ने चश्मा उतारा। उसके बिना उसकी आँखें छोटी लग रही थीं, सूजी हुई, जैसे बहुत रातों से सोई न हों। उसने चश्मे को अपनी कमीज़ पर रगड़ा, फिर उसे वापस नहीं पहना।

"बारह साल पहले," वो बोला, "मेरा बेटा बीमार पड़ा। छोटा था, पाँच साल का। बुखार ऐसा चढ़ा कि रातभर वो बकबक करता रहा। डॉक्टर ने कहा — शहर ले जाओ, वरना हाथ से निकल जाएगा। मेरे पास उतने पैसे नहीं थे। तब मैं यहाँ नया-नया हिसाब रखने आया था। भैरव ने मुझे बुलाया और पूछा — क्या बात है, हरनाम? मैंने सब बता दिया।"

वो रुका। उसकी उँगलियाँ चश्मे पर कसने लगीं।

"उसने मेरे हाथ में पैसों का लिफ़ाफ़ा रख दिया। बिना कुछ पूछे। और कहा — जा, बेटे का इलाज करा। मैं उस वक़्त रो पड़ा था। सच में, वीर। मैं उसके पैरों पर गिर गया था। मैंने सोचा — भगवान ने मुझे भैरव के रूप में कोई फरिश्ता भेजा है।"

उसकी आवाज़ टूटी। उसने एक लंबी साँस ली।

"बेटा बच गया। दो हफ़्ते बाद भैरव ने मुझे बुलाया। एक काग़ज़ रखा सामने। बोला — इस पर दस्तख़त कर दे। मैंने पढ़ा। एक पहलवान का नाम था, और उसके सामने लिखा था — बीमारी से मौत। मैंने कहा, सर, ये आदमी तो कल तक अखाड़े में कुश्ती लड़ रहा था। तो वो हँसा। बोला — हरनाम, तूने मेरे पैसे लिए थे, या भूल गया?"

हरनाम ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"मैंने दस्तख़त कर दिए। मैं उस वक़्त सोचता था, ये तो बस एक काग़ज़ है। एक काग़ज़ किसी की जान कैसे ले सकता है? पर वो काग़ज़ नहीं था, वीर। वो एक आदमी की जान थी। उस पहलवान की बूढ़ी माँ आज भी गाँव के बाहर भीख माँगती है। मैं उसे देखता हूँ, और मैं मुँह फेर लेता हूँ।"

टिंकू ने धीरे से कहा, "हरनाम भाई…"

"नहीं, सुनो।" हरनाम ने आँखें खोलीं। उनमें पानी था, और पानी के नीचे कुछ और भी — एक अजीब सी शांति, जैसे कोई बहुत दिनों से बाँधी हुई गाँठ खोल रहा हो। "मेरी बेटी आज भी मुझसे पूछती है — पापा, तुम इतने पैसे कमाते कहाँ से हो? इतने काग़ज़, इतनी फाइलें, इतना हिसाब — पर हमारे घर में इतना क्यों नहीं? मैं उसे जवाब नहीं देता। मैं मुँह फेर लेता हूँ। आज बारह साल से मैं अपनी बेटी के सवाल से भाग रहा हूँ।"

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