Spirit of a Fighter – Chapter 408
उसके नीचे एक गड्ढा था। छोटा सा। मैंने हाथ अंदर डाला। मेरी उँगलियों को कुछ लिपटा हुआ मिला। कपड़ा। मोटा, खुरदुरा। मैंने उसे खींचा। वो मिट्टी से चिपका हुआ था, पर मैंने खींचा।
और मेरे हाथ में एक पोटली आ गई।
"क्या है?" हरनाम ने पूछा। उसकी आवाज़ में फिर वो डर था।
मैंने पोटली खोली। कपड़ा भीगा था, भारी था। अंदर से कुछ सख़्त चीज़ें निकलीं। मैंने उँगली से टटोला। चाकू? नहीं। कुछ और।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर इसे साथ लेकर जाना होगा।"
"कैसे जाएँगे?" हरनाम की आवाज़ फिर टूटी। "ढक्कन बंद है।"
मैंने ऊपर देखा। अंधेरा। बस अंधेरा। पर फिर मैंने अपना हाथ ज़मीन पर टिकाया, उस गीली मिट्टी पर, और मेरी उँगलियों में एक झटका आया। जैसे कोई मेरा हाथ पकड़कर खींच रहा हो। नीचे की तरफ़।
मैंने मिट्टी को खुरचा। मेरी हथेली के नीचे कुछ और था। कोई ढक्कन। पत्थर का। गोल। बड़ा। मैंने उसे खींचा। वो हिला। थोड़ा सा। पर हिला।
"हरनाम," मैंने कहा। "मेरा हाथ पकड़ो। यहाँ कुछ और है।"
"क्या?"
"यहाँ नीचे।" मेरी आवाज़ में जो था, वो मैं खुद समझ नहीं रहा था। डर? उम्मीद? "एक और रास्ता।"
हरनाम मेरे पास आया। उसने मेरा हाथ पकड़ा। और तभी, उसी पल, ऊपर से आवाज़ आई।
नहीं, आवाज़ नहीं। धमाका। भारी धमाका। जैसे किसी ने ऊपर से पत्थर गिराया हो।
हरनाम ने मेरा हाथ कसकर पकड़ा। "वो लौट आया," वो फुसफुसाया। "वो हमें यहीं मार डालेगा।"
"चुप," मैंने कहा।
ऊपर से आवाज़ आई। भैरव की आवाज़। पर इस बार वो अलग थी। घबराई हुई।
"वीर!" वो चिल्लाया। "वीर, सुन! तेरी माँ यहाँ है! अगर तू ऊपर आया तो मैं उसे छोड़ दूँगा!"
मेरा खून जम गया।
"वीर, जवाब दे!"
मैंने ऊपर देखा। अंधेरे में कुछ नहीं दिख रहा था, पर मैंने अपनी आवाज़ पर काबू रखा।
"झूठ बोल रहा है," मैंने धीरे से कहा। "माँ घर पर हैं।"
"वीर!" भैरव की आवाज़ फिर आई। "तेरी माँ के हाथ में लाल धोती है! मैंने देखा है! अगर तू नहीं आया तो—"
और फिर आवाज़ रुकी। कुछ धक्का-मुक्की की आवाज़ आई। और फिर एक और आवाज़ आई। पतली। तेज़। जानी-पहचानी।
"भैया!"
गुड़िया।
हरनाम ने मेरी कलाई दबाई। "वीर, ये… ये तेरी बहन है?"
मेरा दिमाग़ चकरा गया। मैंने सोचा — गुड़िया घर पर क्यों नहीं है? रात को कैसे यहाँ आई?
"भैया, मैं यहाँ हूँ! कालू काका मेरे साथ हैं!"
कालू काका?
"वीर!" भैरव फिर चिल्लाया। "देख, तेरी बहन यहाँ है। और मैं इसे अपने साथ ले जाऊँगा। तू ऊपर आ, या मैं इसे ले जाऊँगा।"
मैंने पोटली अपनी कमर में बाँधी। मैंने पत्थर का ढक्कन दोनों हाथों से पकड़ा और पूरी ताकत से खींचा। वो सरका। और फिर मैंने झाँका। नीचे अंधेरा था, पर हवा आ रही थी। तेज़ हवा। जैसे बाहर का रास्ता हो।
"हरनाम," मैंने कहा। "तू नीचे जा। मैं ऊपर जा रहा हूँ।"
"ऊपर?" वो हकलाया। "पर वो तेरी बहन को—"
"मैं जानता हूँ।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। अंधेरे में उसका चेहरा नहीं दिख रहा था, पर मैंने उसकी आवाज़ पहचानी। "तू नीचे जा। अगर मैं वापस न आया तो… तो काग़ज़ लेकर बाहर जा। गाँव में जा। मेरी माँ को बता।"
"वीर—"
"जा!"
हरनाम कुछ बुदबुदाया। फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा और दबाया। एक पल के लिए। फिर छोड़ दिया। मैंने उसे ढक्कन में उतरते सुना। पत्थर सरका। फिर उसकी आवाज़ दूर से आई — "वीर, संभलकर।"
और फिर मैं अकेला था।
मैं सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। अंधेरे में हाथ से रास्ता टटोलता हुआ। पहला पायदान। दूसरा। मेरी बाँह में दर्द था। मेरी साँस तेज़ थी। पर मेरा दिमाग़ ठंडा था।
मैं ढक्कन के नीचे पहुँचा। मैंने उसे दोनों हाथों से धक्का दिया। भारी था। हिला नहीं।
"गुड़िया!" मैंने चिल्लाया। "गुड़िया, सुन!"
ऊपर से आवाज़ आई। "भैया! भैया, मैं यहाँ हूँ!"
"गुड़िया, भैरव से दूर रह! कालू काका कहाँ हैं?"
"मैं यहाँ हूँ, बेटा!" कालू काका की आवाज़ आई। धीमी, पर साफ़। "भैरव के दो आदमी हैं। तीन। पर हम दरवाज़े पर हैं। वो तुझे बाहर बुलाना चाहता है। मत आ।"
"तो मैं क्या करूँ?"
"मिट्टी," कालू काका ने कहा। "जो तूने नीचे देखा, वो मिट्टी से बना है। उसी से ढक्कन को ढीला कर।"
मैं समझ नहीं पाया। "क्या?"
"मिट्टी, बेटा! नीचे जो मिट्टी है, वो तेरे हाथ में है! उसे ढक्कन के किनारे डाल! वो अपने आप खुलेगा!"
मैं झुका। मेरे हाथ में अभी भी मिट्टी थी। गीली, ठंडी। मैंने उसे ढक्कन के किनारे डाला। और फिर मैंने अपना कान ढक्कन पर रखा। मुझे कुछ सुनाई दिया। चरचराहट। जैसे लोहा मिट्टी में घुल रहा हो।
और फिर, धीरे-धीरे, ढक्कन एक तरफ़ झुक गया। रोशनी अंदर आई। पहली बार। मेरी आँखें चौंधिया गईं। मैंने हाथ से आँखें ढकीं और ऊपर देखा।
और वहाँ, रोशनी में, मुझे भैरव दिखा। वो ढक्कन के किनारे पर खड़ा था, हाथ में लाठी, और उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
और उसके पीछे, दूर, गुड़िया खड़ी थी। कालू काका उसके सामने। और उनके पीछे, अंधेरे में, कई साये। मशालें। आवाज़ें।
गाँव आ गया था।
"तू आ गया," भैरव ने फुसफुसाया। "फिर भी आ गया।"
मैंने पोटली को अपनी कमर से खोला। मेरे हाथ में वो कपड़ा था, जो मिट्टी में लिपटा था। मैंने उसे ऊपर उठाया।
"ये तुम्हारा है," मैंने कहा। "मेरे पापा ने इसे तुमसे छिपाया था। और आज मैं इसे पूरे गाँव के सामने खोलूँगा।"
भैरव ने लाठी उठाई। पर उसके हाथ काँप रहे थे।
"वो क्या है?" वो बोला। "वो क्या है जो तूने निकाला?"
"यही तो देखने वाली बात है," मैंने कहा। और मैंने ढक्कन को और धक्का दिया।
रोशनी और बढ़ी। मैं बाहर निकला। मेरे कपड़े मिट्टी से लथपथ थे। मेरी बाँह से खून बह रहा था। पर मैं खड़ा था।
और मेरे सामने, मशालों की रोशनी में, पूरा रामपुर खड़ा था। सरस्वती। टिंकू। मीरा। रणवीर सिंह। और सबसे आगे, हाथ में लालटेन लिए, गुड़िया।
गुड़िया दौड़कर मेरे पास आई और मेरी कमर से चिपक गई। उसकी आँखों में आँसू थे, पर उसकी आवाज़ में गुस्सा था।
"भैया," वो बोली, "मैंने कहा था ना, मैं तुम्हें अकेले नहीं छोड़ूँगी।"
मैंने उसका सिर सहलाया। मेरे हाथ में मिट्टी थी, जो उसके बालों में लग गई।
"पता है," मैंने कहा। "तू मेरी बहन है। तेरी बात कौन टाल सकता है?"
और फिर मैंने भैरव की तरफ़ देखा। वो ढक्कन के पास खड़ा था, लाठी हाथ में, पर उसकी आँखें उस पोटली पर टिकी थीं। उस कपड़े पर, जो मेरे हाथ में था।
"ये क्या है?" उसने दोबारा पूछा। इस बार उसकी आवाज़ में वो मिठास नहीं थी। सिर्फ़ खुरदुरापन था।
मैंने पोटली खोली। कपड़ा गिरा। और मेरी हथेली में जो आया, वो देखकर पूरे गाँव की साँस रुक गई।
एक छोटी सी किताब। जिल्द फटी हुई। पन्ने गीले। और उसके साथ, एक चाँदी की अंगूठी। वही अंगूठी जो माँ ने पहचानी थी।
"ये पापा की डायरी है," मैंने कहा। "और ये अंगूठी। जो उन्होंने इस तहखाने में छोड़ी थी। जानबूझकर। ताकि कोई उन्हें ढूँढ सके।"
मैंने किताब खोली। पहला पन्ना। पीला। मिट्टी से सना। पर लिखाई साफ़ थी। मेरे पापा की लिखाई।
और मैंने पढ़ा।
"अगर कोई इसे पढ़ रहा है, तो समझ ले कि मैं अब नहीं हूँ। मेरा नाम रघुवीर है। और मुझे भैरव ने मारा है। पर उससे पहले, उसने मुझे वो दिया जो उसने हर पहलवान को दिया — उसके कुएँ का पानी। पानी नहीं। ज़हर।"
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