Spirit of a Fighter – Chapter 406
"मुझे नहीं पता," हरनाम ने कहा। उसकी आवाज़ में पहले से ज़्यादा डर था। "पर अगर इसे तेरे पापा ने यहाँ रखा, तो वो इस तहखाने के बारे में जानते थे। और भैरव को ये पता था। इसीलिए उन्हें मारा गया।"
मेरे हाथ काँपने लगे। तस्वीर मेरी उँगलियों से फिसलने लगी। मैंने उसे कसकर पकड़ा।
"तो ये सब जो संदूक में है," मैंने कहा, "ये सब भैरव के पापा का है?"
"हाँ। और इसके नीचे जो है, वो सब भैरव का है। बीस साल का हिसाब। कितने आदमी मरे, कैसे मरे, किसने पैसा दिया।"
मैंने तस्वीर को एक तरफ़ रखा और संदूक के अंदर देखा। तस्वीर के नीचे एक मोटी रजिस्टर थी, जिसका कवर लाल था। उसके नीचे काग़ज़ों के बंडल, कुछ चीज़ें लिपटी हुई।
और तभी दीवारों ने कुछ कहा।
नहीं, दीवारों ने नहीं कहा। ऊपर से आवाज़ आई। पहले दूर, फिर पास। जूतों की आवाज़। एक, दो, तीन। सीढ़ियों पर कोई उतर रहा था। और साथ में लालटेन की रोशनी थी, जो तहखाने की दीवारों पर काँपती पड़ रही थी।
हरनाम की आँखें फट गईं। उसने जल्दी से ढक्कन गिराया, पर आवाज़ हो गई। भारी धातु की गूँज तहखाने में फैल गई।
"कौन है?" ऊपर से आवाज़ आई। भैरव की आवाज़। मोटी, धीमी, जैसे कोई पत्थर घसीट रहा हो।
हरनाम मेरी तरफ़ देखने लगा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी।
"हरनाम," भैरव की आवाज़ अब और पास से आई। "मैं जानता था तू कमज़ोर है।"
हरनाम का शरीर काँपने लगा। उसने मेरा हाथ पकड़ा और फुसफुसाया, "वो आ रहा है। वो हमें यहाँ मार देगा।"
मैंने उसका हाथ पकड़कर दबाया। मेरी साँस तेज़ थी, पर मेरा दिमाग़ ठंडा था। मैंने संदूक की तरफ़ देखा। मेरे पापा की तस्वीर। उस पर लिखा नाम। मुझे लगा जैसे शेर सिंह की आँखें मुझसे कह रही हों — "खड़ा रह।"
"हरनाम," मैंने धीरे से कहा, "तुम मेरे पीछे रहो।"
"क्या करेगा तू?" वो हकलाया। "वो अकेला नहीं आया होगा।"
लालटेन की रोशनी दरवाज़े पर पड़ी। भैरव की परछाईं दीवार पर बड़ी हो गई। उसके हाथ में लाठी थी, जो ज़मीन पर घिसट रही थी।
"अंदर आओ," मैंने कहा। मेरी आवाज़ गूँजी। "तुम्हारा ही तहखाना है।"
लालटेन रुकी। भैरव की आवाज़ आई, जिसमें पहली बार कुछ और था — हैरानी।
"कौन है ये?" वो बोला। "हरनाम, तूने किसे अंदर बुला लिया?"
हरनाम ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसकी कलाई नहीं छोड़ी। मैंने आगे कदम बढ़ाया, और लालटेन की रोशनी में अपना चेहरा दिखाया।
"मैं वीर हूँ," मैंने कहा। "रघुवीर का बेटा।"
लालटेन काँपी। भैरव की परछाईं दीवार पर हिल गई। और फिर, तहखाने के ठंडे अंधेरे में, भैरव की आवाज़ आई — धीमी, कड़वी, जैसे कोई ज़हर घोल रहा हो।
"तो तू ज़िंदा है," उसने कहा। "मुझे लगा तू भी अपने बाप के साथ मिट्टी में मिल गया।"
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"तो तू ज़िंदा है," भैरव ने कहा। "मुझे लगा तू भी अपने बाप के साथ मिट्टी में मिल गया।"
उसकी आवाज़ में जो कड़वाहट थी, वो ज़हर की गंध से भी तेज़ थी। लालटेन उसके हाथ में हिल रही थी, और उसकी परछाईं दीवार पर ऐसे नाच रही थी जैसे कोई बूढ़ा भूत।
मैंने हरनाम की कलाई नहीं छोड़ी। मेरे पैरों के नीचे मिट्टी ठंडी थी, पर मेरी हथेलियों में पसीना था।
"अंदर आओ," मैंने दोबारा कहा। "दूर से बात करके क्या फ़ायदा?"
भैरव हँसा। वो हँसी नहीं थी, किसी पुराने दरवाज़े की चरचराहट थी। वो सीढ़ी से उतरने लगा। एक पायदान, दूसरा, तीसरा। हर कदम पर लालटेन की रोशनी मेरे चेहरे पर पड़ती और हट जाती।
हरनाम मेरे पीछे से खिसककर आगे आया। और फिर वो घुटनों के बल गिर पड़ा। मिट्टी उसके घुटनों से चिपक गई।
"सर," वो रोया। "सर, माफ़ कर दो। मैं सब भूल जाऊँगा। कसम से, सब भूल जाऊँगा। मेरी बेटी है सर, नौ साल की। उसके सिवा कोई नहीं है।"
उसकी आवाज़ टूट रही थी। उसके चश्मे पर धूल जम गई थी और वो उसे पोंछना भूल गया था। मैंने उसे पहले कभी ऐसा नहीं देखा था। वो आदमी जो हर काग़ज़ पर सफ़ाई से हस्ताक्षर करता था, आज अपने ही आँसुओं में डूबा था।
भैरव ने लाठी की नोक संदूक की तरफ़ कर दी। धातु की नोक लकड़ी से टकराई और खट की आवाज़ पूरे तहखाने में फैल गई।
"हाँ," भैरव ने धीरे से कहा। "तू सब भूल जाएगा। हमेशा के लिए।"
वो उतरता रहा। अब वो मुझसे चार कदम दूर था। मैं उसकी मूँछों में लगा तेल सूँघ सकता था, उसकी धोती में लगी मिट्टी की गंध सूँघ सकता था। पर उसके पसीने में कुछ और था। डर नहीं। कुछ और। जैसे जानवर जब कोने में घिर जाए, तो उसकी गंध बदल जाती है।
"हरनाम," भैरव ने कहा, "तू ने मेरे साथ बीस साल किए। बीस साल। और आज तू इस लड़के के पीछे चला गया।"
"सर, वो मुझे धमका रहा था—"
"धमका रहा था?" भैरव हँसा। "तू वो काग़ज़ लेकर आया था जो मैंने जलाने को कहा था। तू ने मुझसे झूठ बोला। और अब तू मेरे ही तहखाने में, मेरे ही संदूक के पास, इसके साथ खड़ा है।"
लाठी उठी। मैंने हरनाम को पीछे धकेला और आगे कूद गया। लाठी मेरे कंधे के पास से निकली, हवा काटती हुई, और दीवार से टकराई। ईंट का टुकड़ा गिरा। मैंने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, पर वो मिट्टी पर फिसल गया और दूर जा गिरा।
मेरी कोहनी में झनझनाहट हुई। मैं उठा। मेरे हाथ में मिट्टी थी, मुँह में मिट्टी का स्वाद था। उस मिट्टी में एक अलग ही ताकत थी, जैसे वो मेरे शरीर में उतर रही हो।
भैरव फिर लाठी लेकर बढ़ा। इस बार मैंने बचने के बजाय उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया। लाठी मेरी बाँह पर पड़ी। दर्द की लहर कंधे से उँगलियों तक गई, पर मैंने हाथ नहीं छोड़ा। मैंने लाठी को पकड़ लिया और खींचा।
भैरव का भारी शरीर आगे झुका। उसकी पकड़ ढीली पड़ी। मैंने पूरी ताकत से खींचा और लाठी उसके हाथ से छूट गई। वो पीछे हटा। उसका पैर मिट्टी की ढीली परत पर पड़ा और वो लड़खड़ाया। उसने दीवार का सहारा लिया।
लालटेन उसके हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिरी, पर बुझी नहीं। उसकी रोशनी में मैंने पहली बार भैरव की आँखों में कुछ और देखा। डर नहीं। हैरानी। जैसे किसी ने उसके हिसाब की किताब में एक गलत जोड़ कर दिया हो।
"तू मुझे छू नहीं सकता," वो फुसफुसाया। "मैंने तेरे पापा को छुआ था। तू मुझे नहीं छू सकता।"
"मेरे पापा ने भी तुझे छुआ था," मैंने कहा। मेरी आवाज़ मेरी अपनी नहीं लग रही थी। "और देख, तू आज भी उनकी मिट्टी से डर रहा है।"
भैरव की नज़र संदूक पर गई। एक पल के लिए उसकी आँखें मेरी तरफ़ से हटीं। वो झुका और संदूक से एक बंडल उठाने की कोशिश करने लगा। मैंने लाठी आगे कर दी।
"उसे छोड़," मैंने कहा।
"ये काग़ज़ तेरे पापा की मौत नहीं बदल देंगे," भैरव ने मुस्कुराते हुए कहा। वो मुस्कान उसके होंठों पर चिपकी थी, पर आँखों तक नहीं पहुँची। "तेरे पापा मर गए। मिट्टी में मिल गए। और तू… तू आज यहाँ मरेगा। बस तेरे साथ एक फ़र्क़ होगा। तेरे पापा मरे तो किसी को पता भी नहीं चला। तेरे लिए पूरा गाँव रोएगा।"
वो पीछे हटा। सीढ़ियों की तरफ़।
मैं उसके पीछे दौड़ा। मेरी बाँह में दर्द था, पर मैंने उसकी धोती का कोना पकड़ लिया। वो झटका देकर छूटा और सीढ़ियों पर चढ़ने लगा। हरनाम वहीं मिट्टी में बैठा रो रहा था।
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