Spirit of a Fighter – Chapter 388
गुरुजी ने मेरी आँखों में देखा। "मैंने बताया नहीं। मैं डर गया था।" उनकी आवाज़ टूटी। "और यही मेरा सबसे बड़ा पाप है।"
मैंने सिर हिलाया। "तो अब आप उसे ठीक कर सकते हैं।" मैंने लाल कपड़े वाली गोली जेब से निकाली। "ये टीका — ये कितने लोगों को बचा सकता है?"
गुरुजी की आँखें चमकीं। "जितना तू चाहे। पर बनाना पड़ेगा। एक गोली से काम नहीं चलेगा।"
"कितना वक़्त?"
"तीन घंटे। अगर सामान हो।"
मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। "क्या आप सामान ला सकते हैं? नीम की राल, सोंठ, और तहखाने की मिट्टी?"
कालू काका उठ खड़े हुए, उम्र के बावजूद। "मैं लाता हूँ।" वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। "पर वीर, भैरव को रोकना पड़ेगा। वो सीधे यहाँ नहीं आएगा। वो पहले पूरा अखाड़ा जगाएगा। सबको इकट्ठा करेगा। और फिर कहेगा — 'देखो, वीर ने मेरे कुएँ का ढक्कन तोड़ा।'"
"तो हम उसे पहले ही सबके सामने लाएँगे," मैंने कहा। "टिंकू कहाँ है?"
"दुकान पर।"
"उसे बुलाइए। और मीरा को भी।"
कालू काका रुके। "मीरा? वो तो शहर गई थी अपने पापा की दवा लेने।"
मेरा दिल धक् से रह गया। "शहर? कब?"
"आज सुबह। टिंकू ने बताया था।"
मैंने गुरुजी की तरफ़ देखा। उनका चेहरा कठोर हो गया।
"वो रास्ता," गुरुजी ने धीरे से कहा, "जो नहर के पुल से जाता है। उस पर भैरव के आदमी पहरा देते हैं।"
मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा। बाहर से आवाज़ें आ रही थीं — कई पैरों की।
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "अब क्या?"
मैंने गोली को अपनी जेब में रखा, पापा की धोती कसी, और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
"पहले मीरा," मैंने कहा। "फिर भैरव।"
गुरुजी ने मेरा हाथ पकड़ा। "वीर, एक बात। भैरव जब आए, तो उसे कभी अपनी आँखों में मत देखने देना। वो आँखों से डराता है।"
मैंने सिर हिलाया। फिर मैंने कुंडी खोली और बाहर कदम रखा।
अखाड़े के मैदान में मशालें जल रही थीं। और उन मशालों के बीच, दूर, भैरव सिंह खड़ा था — लाल धोती, चौड़ी छाती, और मुँह पर वो मुस्कान जो गुड़ जैसी मीठी और कुएँ जैसी ठंडी थी।
उसके पीछे कम से कम बीस आदमी थे।
मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा। और मैंने अपनी जेब में टूटी घड़ी मसली।
"देखा," भैरव ने अपनी मीठी आवाज़ में कहा, "मैंने कहा था न — तीन दिन बाद एक ही आदमी खड़ा होगा। पर लगता है तूने मेरी बात नहीं मानी।"
मैंने उसकी आँखों में नहीं देखा। मैंने उसके कंधों पर देखा। और मैंने धीरे से कहा, "भैरव सिंह, आज रात यहाँ एक और आदमी खड़ा है जिसे तू बीस साल से मरा हुआ समझता है।"
भैरव की मुस्कान एक पल के लिए हिली।
और उसी पल, मेरे पीछे, कमरे के अंधेरे दरवाज़े से एक बूढ़ी आवाज़ आई — धीमी, पर साफ़, बिलकुल वैसी जैसे किसी पुरानी किताब का पन्ना पलटा जा रहा हो।
"मोहन," गुरुजी ने कहा, "अब भी वक़्त है।"
भैरव का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसके हाथ की मशाल काँपी। और उसके पीछे खड़े बीस आदमियों ने एक साथ पीछे कदम खींचा — जैसे किसी ने उनके सामने से पर्दा हटा दिया हो।
मैंने गुरुजी की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े में खड़े थे, सफ़ेद दाढ़ी, लालटेन हाथ में, और आँखों में बीस साल का सन्नाटा।
और मैंने मन ही मन कहा — मीरा, बस थोड़ी देर और। मैं आ रहा हूँ।
पर तभी भैरव ने अपनी मशाल उठाई और चिल्लाया, "ये आदमी मेरे कुएँ से भागा है! पकड़ो इसे!"
और बीस आदमी आगे बढ़े।
मैंने गुरुजी का हाथ पकड़ा और पीछे धकेला। "कालू काका, दरवाज़ा बंद कीजिए!"
पर कालू काका ने दरवाज़ा नहीं बंद किया। उन्होंने अपनी लाठी उठाई और मेरे बगल में खड़े हो गए।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मिट्टी झूठ नहीं बोलती। और आज ये मिट्टी गवाही देगी।"
मैंने अपनी मुट्ठियाँ कसीं। सामने बीस आदमी थे। और मेरे पीछे एक बूढ़ा, एक और बूढ़ा, और एक टूटी हुई घड़ी।
पर मेरे अंदर कुछ था जो कह रहा था — तू अकेला नहीं है।
और तभी दूर, नहर के पुल की तरफ़ से, एक औरत की आवाज़ आई — तेज़, साफ़, और गुस्से से भरी।
"भैरव सिंह! मेरे पापा की दवा में ज़हर मिलाने की हिम्मत कैसे हुई तुझे?"
मैं पलटा। पुल की तरफ़ देखा।
मीरा खड़ी थी — कुर्ता-सलवार, कंधे पर बैग, और हाथ में एक काँच की शीशी जो मशालों की रौशनी में चमक रही थी।
और उसके पीछे, व्हीलचेयर पर, रणवीर सिंह थे — आँखों में आग, और हाथ में एक लोहे की छड़ी।
भैरव ने पलटकर देखा। और उसका चेहरा, जो अभी सफ़ेद पड़ा था, अब लाल हो गया — गुस्से से।
"तूने मेरी बेटी को कैसे…" वो फुसफुसाया।
"मैं तेरी बेटी नहीं हूँ," मीरा ने कहा और आगे बढ़ी। "और ये शीशी — ये तेरे कमरे से है। इसमें वही ज़हर है जो तू मेरे पापा की दवा में मिलाता रहा। और इस पर तेरे हाथ के निशान हैं।"
मैंने अपनी साँस रोकी। मेरे आगे मीरा खड़ी थी, बीस आदमियों के सामने, अकेली।
पर वो अकेली नहीं थी।
क्योंकि उसके पीछे रणवीर सिंह थे। और रणवीर सिंह के पीछे, अंधेरे में, दर्जनों चेहरे उभर रहे थे — गाँव के लोग, मशालें हाथ में, सुक्खी बुआ सबसे आगे।
सुक्खी बुआ ने अपना पान का बीड़ा थूका और बोलीं, "अरे मैंने तो सुना है कि आज रात अखाड़े में सच बोला जाएगा। तो मैं पूरे रामपुर को बुला लाई।"
भैरव के बीस आदमी रुक गए। उन्होंने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।
और भैरव सिंह ने अपनी मशाल नीचे की।
पर उसकी आँखों में वो आग अभी बुझी नहीं थी।
"अच्छा," उसने धीरे से कहा। "तो आज सब इकट्ठे हो गए।" उसने मशाल ज़मीन पर पटकी और अपनी धोती झाड़ी। "तो ठीक है। आज ही हिसाब हो जाए।"
उसने अपनी कमर से चाबी निकाली — वही चाबी जो हमेशा उसकी कमर में बंधी रहती थी।
"कल सुबह," उसने कहा, "इसी अखाड़े में, सबके सामने, मैं अपनी अलमारी खोलूँगा। और तुम सब देखोगे कि उसमें क्या है।"
वो मुड़ा और अपने आदमियों के साथ अंधेरे में चला गया।
और मैं वहीं खड़ा रहा, मीरा की तरफ़ देखता हुआ, और सोचता हुआ — कल सुबह जब वो अलमारी खुलेगी, तो उसमें सिर्फ़ उसके काग़ज़ नहीं होंगे।
उसमें मेरे पापा का सच होगा।
और मैं उसे अकेले नहीं खोलने दूँगा।
॥
कालू काका ने गुरुजी को अपने कंधे पर टिकाया और मेरी तरफ़ देखा।
"बेटा, अब यहाँ एक पल भी मत रुक। भैरव ने मशाल पटकी है, मतलब उसने मन बना लिया है। वो कल सुबह तक कुछ न कुछ करेगा।"
मैंने गुरुजी की सफ़ेद दाढ़ी देखी, उनके सूखे होंठ देखे। बीस साल कुएँ में। बीस साल। मेरा दिल कह रहा था कि पहले इन्हें पानी पिलाऊँ, इन्हें बैठाऊँ, इनके हाथ पकड़कर रोऊँ। पर सामने गाँव खड़ा था और पीछे भैरव के बीस आदमी अंधेरे में घुले जा रहे थे।
"गुरुजी," मैंने धीरे से कहा, "आप चल सकते हैं?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। आँखें धँसी हुई थीं, पर उनमें वो चमक थी जो कैद में भी नहीं बुझी थी।
"बेटा, मैं बीस साल से चलने की तैयारी में था। बस कोई हाथ पकड़ने वाला नहीं था।"
मेरा गला भर आया। मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनकी हथेली सूखी थी, ठंडी थी, पर उसमें एक ज़ोर था जो मेरी हथेली में उतर आया।
कालू काका ने आगे बढ़कर कहा, "सुनो, सब सुनो।" उन्होंने गाँव वालों की तरफ़ मुँह किया। "ये गुरुजी हैं। रघुवीर के गुरु। भैरव ने इन्हें बीस साल कुएँ में बंद रखा। जो इन्हें देख रहा है, वो गवाह है। अब कोई इन्हें छूने की कोशिश भी करे, तो ये मेरी लाठी पहले बोलेगी।"
सुक्खी बुआ ने पान का बीड़ा फेंका और बोलीं, "अरे मैंने तो सुना है कि भैरव ने अपनी ही माँ को कुएँ में…" वो रुकीं। उनका चेहरा पहली बार सफ़ेद पड़ा। "ये… ये सच है?"
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