Spirit of a Fighter – Chapter 376
मेरा गला भर आया। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"तू पागल है।"
"हाँ।" वो हँसा। "पर तेरा दोस्त हूँ। इसलिए पागल हूँ।"
रात गहरी हो चली थी जब हम निकले। आसमान पर बादल थे, चाँद छिपा हुआ था। हम तीन थे — मैं, टिंकू और लुट्टन। कालू काका झोपड़ी में रुके, रामदीन के पास।
अखाड़े के पीछे, नीम के पेड़ के नीचे, वो पुरानी जड़ थी — कालू काका ने ठीक बताया था। मैंने जड़ के पीछे की मिट्टी हटाई तो एक छोटा-सा मुँह खुला — किसी जानवर के बिल जैसा, पर अंदर जाकर चौड़ा होता हुआ।
"मैं पहले," टिंकू ने कहा।
"नहीं —"
"भाई, मैं दुबला हूँ। अगर मैं फँसा, तो तुम खींच लोगे। तुम फँसे, तो मैं नहीं खींच पाऊँगा।" उसने मुस्कुराकर कहा और मुँह बंद करके अंदर घुस गया।
मैं उसके पीछे गया। अंदर अंधेरा घना था — हाथ को हाथ नहीं दिख रहा था। मिट्टी की गंध, नमी, और दूर से कुएँ की कड़वी बदबू आ रही थी।
सुरंग ने मोड़ लिया, फिर सीधी नीचे उतरी। मेरे घुटने मिट्टी से छिल रहे थे। फिर सामने रोशनी दिखी — हल्की, पीली, कुएँ के अंदर जलती लकड़ी की।
हम कुएँ की दीवार के पास पहुँचे। कालू काका ने बताया था — ईंटें ढीली हैं, एक तरफ़। मैंने हाथ लगाया और तीन ईंटें अपने आप खिसक गईं।
रामदीन वहीं बैठा था। उसने सिर उठाया और मुझे देखा — और उसकी आँखों में वो डर नहीं था जो पहले था। कुछ और था।
"तू लौट आया," उसने कहा।
"मैंने कहा था।" मैंने टिंकू की डिब्बी से थैली निकाली और उसकी तरफ़ बढ़ाई। "ये खा लो। सुबह तक धुएँ में टिकाएगी।"
उसने थैली ली, खोली, और पुड़िया मुँह में डाली। फिर वो मेरी तरफ़ देखकर हँसा — कमज़ोर, टूटी हँसी।
"तेरे हाथ में मिठाई की गंध है," उसने कहा।
"टिंकू की है। वो ऊपर है।"
रामदीन ने सिर हिलाया। फिर उसकी आवाज़ धीमी हो गई।
"कल सुबह," मैंने कहा, "जब भैरव कुआँ खोलेगा, मैं तुम्हें बाहर निकालूँगा। और तुम सबके सामने सच बोलोगे। पूरा सच।"
"पूरा सच," उसने दोहराया, और उसकी आवाज़ में वो भारीपन था जो बीस साल के चुप्पी के बाद आता है। "बेटा, तू जानता है पूरा सच क्या है?"
"थोड़ा-थोड़ा।"
"तो सुन।" उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं — कमज़ोरी से नहीं, किसी और चीज़ से। "मैंने भैरव को ज़हर बनाना सिखाया था। पर मैंने उसे ये नहीं सिखाया कि उसे किस पर इस्तेमाल करना है। वो खुद समझ गया। और जब मैंने मना किया, तो उसने मुझे रात में यहाँ बुलाया — कहा, कुआँ साफ़ करना है। मैं आया। और उसने मेरे सिर पर वार किया।" उसने अपनी खोपड़ी पर हाथ रखा, जहाँ बाल के बीच एक गड्ढा था। "जब मैं उठा, तो अंदर था। और ऊपर ढक्कन बंद था।"
मेरी साँस रुक गई।
"मैंने सोचा था मर जाऊँगा। पर मैं मरा नहीं। क्योंकि मैंने खुद को ज़हर सिखाया था — थोड़ा-थोड़ा, सालों में, ताकि शरीर सह ले। उसी आदत ने मुझे ज़िंदा रखा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पर तुझे ये आदत मत डालनी। समझा?"
"समझा।"
"अब जा।" उसने मेरा हाथ छोड़ा। "सुबह के लिए तैयार हो। और बेटा —"
मैं रुका।
"तेरी माँ को मेरी तरफ़ से कहना — मैंने उसके पति को बचाने की कोशिश की थी। नहीं बचा पाया। पर आज मैं उसके बेटे को बचाऊँगा।"
मेरी आँखें जल गईं। मैंने सिर हिलाया, और पत्थरों को वापस रखकर, ईंटें जमाकर, मैं पीछे हटा।
बाहर निकलते वक़्त मेरी छाती फट रही थी। टिंकू और लुट्टन पहले से बाहर थे, झाड़ी के पीछे छिपे।
मैं आख़िरी ईंट लगाकर पलटा — और मेरे पैर जम गए।
आसमान लाल था।
अखाड़े की तरफ़ से धुआँ उठ रहा था — मोटा, काला, और उसके नीचे एक लाल चमक, जो धीरे-धीरे बढ़ रही थी।
"ये…" टिंकू की आवाज़ फट गई। "ये तो…"
कालू काका की आवाज़ दूर से आई — वो भागते हुए आ रहे थे, लालटेन हाथ में, और उनका चेहरा लाल रोशनी में और भी डरावना लग रहा था।
"वीर!" वो चिल्लाए। "अखाड़े में आग लगी है!"
मेरा दिल धड़ से रह गया।
"कहाँ?"
"रसोई में! और…" वो हाँफते हुए रुके। "और तेरे घर की तरफ़ भी धुआँ जा रहा है। हवा का रुख उधर है।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
मेरी माँ। गुड़िया।
मैंने एक बार भी पीछे देखे बिना दौड़ लगाई।
॥
पैरों में जूते ही नहीं थे। काँटे लग रहे थे, पर मैं रुका नहीं। सुबह की ठंडी ज़मीन पैरों को काट रही थी और मैं भाग रहा था — जैसे कोई मुझे अंदर से धक्का दे रहा हो।
पीछे से टिंकू हाँफ रहा था — "वीर! रुक… रुक जा, मेरी साँस…"
मैं नहीं रुका।
अखाड़े की दीवार दूर से लाल दिख रही थी। आसमान का लाल और दीवार का लाल, दोनों मिलकर एक ही रंग बन गए थे। और धुआँ — मोटा, काला, नीचे से ऊपर की तरफ़ उठता हुआ, जैसे कोई ज़मीन से गुस्सा निकाल रहा हो।
लुट्टन मेरे साथ दौड़ रहा था। कमज़ोर शरीर, धँसी आँखें, पर पैर नहीं रुक रहे थे। वो कल तक भैरव का कुत्ता था। आज वो मेरे साथ भाग रहा था — और उसके मुँह से एक भी शिकायत नहीं निकली।
"रसोई की तरफ़ से उठ रहा है," वो बोला। "देख, धुआँ झुका हुआ है। मतलब आग नीचे है।"
मैंने देखा। सही कह रहा था। धुआँ अखाड़े की पीछे वाली दीवार के पास से निकल रहा था — वहीं जहाँ पुरानी तस्वीरें टँगी थीं, जहाँ काग़ज़ों के बंडल रखे थे, जहाँ कालू काका रोज़ झाड़ू लगाते थे।
और उसी के पीछे, दूर — मेरे घर की छत।
मैंने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं। माँ का चेहरा आया — चूल्हे के पास बैठी, हल्दी का टीका माथे पर, हाथ में लकड़ी। और गुड़िया — कॉपी लिए, चोटियाँ हिलाती हुई।
"भगवान," मैंने धीरे से कहा। "बस एक बार।"
अखाड़े का गेट खुला था। ताला टूटा पड़ा था। कोई अंदर गया था — ज़बरदस्ती।
अंदर घुसते ही गर्मी ने मुँह पर थप्पड़ मारा। आँखों में पानी आ गया। पीछे वाला हिस्सा जल रहा था — दीवार पर लगी पुरानी तस्वीरें मुड़ रही थीं, काली होकर गिर रही थीं, और उनके नीचे रखे काग़ज़ों के बंडल से छोटी-छोटी लपटें निकल रही थीं।
कालू काका वहीं थे। एक हाथ में लालटेन, दूसरे में बाल्टी। उनकी सफ़ेद दाढ़ी पर कालिख लगी थी और वो लड़खड़ा रहे थे — बुढ़ापा और धुआँ, दोनों एक साथ।
"बाल्टी!" मैं चिल्लाया। "कुआँ कहाँ है? पानी!"
"कुआँ बंद है, बेटा!" उनकी आवाज़ फटी हुई थी। "भैरव ने ढक्कन पर पत्थर रखवा दिए! पानी नहीं निकलेगा!"
मेरा दिमाग़ एक पल के लिए ठहर गया।
फिर मैंने देखा — अखाड़े के कोने में पानी का बड़ा मटका, वो जिससे पहलवान कसरत के बाद मुँह धोते थे। और उसके पास ही, ज़मीन पर, टूटी हुई मिट्टी के घड़े की तीन-चार बाल्टियाँ।
"टिंकू!" मैं दौड़ा। "ये बाल्टियाँ उठा। लुट्टन, तू मटके से भर। मैं अंदर जा रहा हूँ।"
"अंदर?!" टिंकू की आवाज़ काँपी। "पागल हो गया है? अंदर छत गिर रही है!"
"माँ है अंदर।"
वो एक पल चुप हुआ। फिर उसने बाल्टी उठाई और बोला — "जा। मैं पानी पहुँचाता रहूँगा।"
मैंने अपनी धोती का पल्ला मुँह पर बाँधा और आग की तरफ़ बढ़ा।
गर्मी ऐसी थी जैसे कोई सूरज को नीचे उतारकर रख दे। मेरी भौंहों के बाल जलने लगे। पैरों के नीचे फर्श तवे जैसा गरम था। मैंने देखा — रसोई का दरवाज़ा खुला था और अंदर से धुआँ ऐसा निकल रहा था जैसे किसी जानवर की साँस।
"माँ!" मैं चिल्लाया। "माँ!"
कोई जवाब नहीं।
"गुड़िया!"
फिर सुना — खाँसी। छोटी, दबी हुई, किसी बच्चे की खाँसी। दीवार के उस पार से।
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