Spirit of a Fighter – Chapter 362
मैंने सिर हिलाया। फिर आगे बढ़ा।
पुल के नीचे पानी की आवाज़ तेज़ थी। और ऊपर, परछाई हिल गई। भैरव ने अपना हाथ उठाया।
उसके हाथ में एक लोहे का डिब्बा था। और डिब्बे से धुआँ उठ रहा था।
मैं रुक गया।
डिब्बे की गंध पहचान ली। वो गंध मैंने पहले भी सूँघी थी।
तहखाने की मिट्टी।
भैरव तहखाने की मिट्टी जला रहा था।
"वीर सिंह!" उसकी आवाज़ पानी के ऊपर से आई। मीठी। ज़हरीली। "आ जा! आज तेरी मिट्टी की परीक्षा है!"
॥
पुल के नीचे पानी की आवाज़ तेज़ थी। मैंने एक कदम आगे रखा, फिर रुक गया।
भैरव ने लोहे का डिब्बा ऊपर उठाया। उसमें से धुआँ उठ रहा था — काला, घना, और उसमें वो गंध थी जो मैं भूल नहीं सकता था। गीली मिट्टी की गंध, पर जली हुई। तहखाने की मिट्टी। जिस मिट्टी में मैंने अपना सीना रखा था, वो जल रही थी।
"तेरी मिट्टी, वीर सिंह!" भैरव की आवाज़ पुल से उतरकर पानी पर फैल रही थी। "ये मिट्टी बीस साल से मेरी गुलाम थी। आज से ये राख है। और जब ये राख हो गई, तो तू क्या रह जाएगा? एक मज़दूर। जो ईंट ढोता है।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए। मैंने एक और कदम बढ़ाया।
भैरव हँसा। फिर उसने डिब्बा पानी में उलट दिया।
धुआँ उठा, फिर बुझ गया। नहर ने सब निगल लिया।
"आज नहीं," उसने कहा। "तीन दिन बाद। मैं तुझे मैदान में बुलाऊँगा, और सब देखेंगे कि मिट्टी किसकी है।"
वो पलटा और चला गया। बिना पीछे देखे। उसके कदम पुल पर गूँज रहे थे, धीरे-धीरे दूर होते हुए।
मैं वहीं खड़ा रहा। साँस लेना भूल गया था।
मीरा मेरे पास आई। उसने मेरी बाँह पकड़ी।
"वो चला गया," उसने धीरे से कहा।
"हाँ।"
"बिना लड़े।"
"हाँ।"
वो मेरे सामने आई और मेरी आँखों में देखा।
"वीर, ये चुप्पी ख़तरनाक है। भैरव जब चिल्लाता है, तब मैं डरती नहीं। जब वो चुप हो जाता है, तब डर लगता है।"
मैंने पानी की तरफ़ देखा। जहाँ डिब्बा गिरा था, वहाँ पानी का रंग थोड़ा काला हो गया था। फिर वो बह गया।
"उसने मिट्टी जलाई," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी नहीं लग रही थी। "तहखाने की मिट्टी। जो मेरे सीने से लगी थी।"
"वो डराने के लिए कर रहा है।"
"नहीं," मैंने कहा। "वो जानता है कि मिट्टी मेरी ताकत है। इसलिए वो पहले मेरी ताकत मार रहा है। फिर मुझे।"
मीरा कुछ देर चुप रही। फिर उसने मेरा हाथ थामा।
"घर चलो," उसने कहा। "आज रात कोई योजना नहीं। आज रात बस सो जाओ।"
"मैं सो नहीं सकता।"
"तो मत सो। पर लेट जाओ। शरीर को आराम दे। कल तुम्हें तीन दिन की लड़ाई के लिए तैयार होना है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके बाल बारिश की हवा से बिखरे हुए थे। आँखों में वो ज़िद थी जो पहली बार देखी थी — अखाड़े में, जब वो मुझे जूते पहनकर मिट्टी में घुसने पर धक्के से बाहर कर रही थी।
"तुम घर जाओ," मैंने कहा। "पापा अकेले हैं।"
"पापा सो रहे हैं। मैं कालू काका को बुलाकर आई हूँ। वो तुम्हें लेने आ रहे हैं।"
मैंने सिर हिलाया। मेरे भीतर वो जगह अब भी जल रही थी जहाँ कालू दीवार के छेद से ये बता रहे थे — भैरव तीन रात में तहखाने की मिट्टी उठाकर अपने पास रख लेगा। और आज उसने एक डिब्बा जला दिया। मतलब उसने शुरू कर दिया है।
कालू काका आए। उन्होंने मुझे देखा और कुछ नहीं बोले। बस मेरे कंधे पर हाथ रखा और साथ चलने का इशारा किया। रास्ते में वो बोले नहीं। मैं भी नहीं बोला।
घर पहुँचा तो माँ आँगन में बैठी थीं, चक्की के पास। चूल्हा बुझा हुआ था। उन्होंने मुझे देखा और उठकर मेरे पास आईं।
"क्या हुआ?"
"कुछ नहीं, माँ।"
"वीर।"
मैंने उनकी आँखों में देखा। उनमें वो बात थी जो वो बोलकर नहीं कह रही थीं — कि वो जानती हैं, कि मैं झूठ बोल रहा हूँ, और कि वो फिर भी मेरा झूठ सह लेंगी।
"भैरव ने तहखाने की मिट्टी जला दी," मैंने कहा। "एक डिब्बा भर।"
माँ रुकीं। फिर उन्होंने मेरा हाथ थामा और मुझे आँगन की चौकी पर बैठा दिया।
"मिट्टी कितनी थी?"
"एक डिब्बा। शायद दो।"
"तहखाने में कितनी है?"
मैंने सोचा। कालू काका ने बताया था — सैकड़ों साल की परत। कमर भर गहरी।
"बहुत ज़्यादा," मैंने कहा।
"तो वो दो डिब्बे में क्या जलाएगा?" माँ ने कहा। "वो तुझे डरा रहा है, वीर। और तू डर गया, इसलिए उसे लगा कि उसका डर काम कर गया।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"तीन दिन बाद लड़ाई है, माँ। उसने खुद कहा।"
"तो तीन दिन तक सो। खा। मिट्टी में बैठ। और फिर उतरना।"
"और अगर—"
"अगर क्या?" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "अगर वो जीत गया, तो क्या? तू मर जाएगा, और मैं तेरे पीछे रोऊँगी। बस इतना ही होगा। पर तू अभी ज़िंदा है। और ज़िंदा आदमी के पास आज भी कुछ न कुछ होता है। सो जा।"
वो उठकर गईं। मैं आँगन में बैठा रहा।
तभी मेरे पीछे से आवाज़ आई।
"भैया।"
गुड़िया दरवाज़े पर खड़ी थी। उसके हाथ में कॉपी थी। मैंने उसे पास बुलाया।
"क्या लिखा है?"
"कुछ नहीं," उसने कहा। "पर मैंने आज स्कूल में एक बात सीखी।"
"क्या?"
"मास्टर जी ने कहा — जब बड़ा आदमी छोटे आदमी को डराए, तो इसका मतलब बड़ा आदमी खुद डरा हुआ है।"
मैंने उसे देखा। बारह साल की लड़की, दो चोटियाँ, आँखों में वो चमक।
"तेरी मास्टर जी को कभी मिलना है मुझे," मैंने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि वो सही बोलते हैं।"
गुड़िया मुस्कुराई। फिर उसने मेरी कलाई पर वो लाल धागा देखा जो उसने सुबह बाँधा था।
"अभी भी बँधा है," उसने कहा, जैसे हैरान हो।
"हाँ। तेरा धागा है। टूटेगा नहीं।"
वो खुश होकर अंदर चली गई।
सुबह मैं अखाड़े पहुँचा तो गेट खुला था। कल का ताला गायब था, और नोटिस भी नहीं था। अंदर पहलवान जमा थे — पच्चीस-तीस आदमी। मैदान के बीच वो गड्ढा अब भर दिया गया था, और ताज़ी मिट्टी चमक रही थी।
भैरव मंच पर खड़ा था। लाल धोती, सोने की चेन, बड़ी तेल लगी मूँछें। उसके पीछे हरनाम खड़ा था, हाथ में फ़ाइलें।
"भाइयों!" भैरव की आवाज़ मैदान में गूँजी। "आज मैं एक ऐलान करने आया हूँ जो रणवीर अखाड़े के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ।"
पहलवानों में सन्नाटा छा गया।
"तीन दिन बाद यहाँ बड़ा मुकाबला होगा। खुला मुकाबला। जो जीतेगा — उसे इनाम मिलेगा।"
किसी ने पूछा, "कितना इनाम, सर?"
भैरव मुस्कुराया। वो मुस्कान जो मैंने सुनी थी — कालू काका की बात याद आई। जब भैरव मुस्कुराता है, तब कुछ मरता है।
"इनाम पैसा नहीं है," भैरव ने कहा। "इनाम है — रणवीर अखाड़े की आधी ज़मीन।"
मैदान में शोर मच गया। पहलवान एक-दूसरे को देखने लगे। किसी ने सीटी बजाई। कोई ताली बजाने लगा।
"आधी ज़मीन?" किसी ने कहा। "सर, ये तो—"
"हाँ," भैरव ने कहा। "जो जीतेगा, वो अखाड़े का हिस्सेदार होगा। मेरे बराबर।"
मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई।
मैं भीड़ में खड़ा था। मेरे पास टिंकू आया, आँखें बड़ी।
"सुना तूने?" उसने फुसफुसाया। "आधी ज़मीन!"
"सुना।"
"ये तो—"
"टिंकू," मैंने कहा। "भैरव कभी कुछ मुफ़्त नहीं देता।"
टिंकू मेरी तरफ़ देखने लगा। उसकी मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ गई।
"तो फिर?"
"मुझे नहीं पता। पर कुछ तो है।"
भैरव ने भीड़ पर नज़र घुमाई। मेरे ऊपर आई। रुकी। फिर आगे बढ़ गई।
"जो लड़ना चाहता है, आज शाम तक नाम लिखवा दे। हरनाम के पास।"
वो मंच से उतरा और अपने कमरे की तरफ़ चला गया। हरनाम उसके पीछे-पीछे गया।
मैं कालू काका की तरफ़ बढ़ा। वो दीवार के कोने में बैठे थे, हाथ में सींक, और कुछ सोच रहे थे।
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