Spirit of a Fighter – Chapter 357
"तेरी माँ भी डरती थी, भाई," टिंकू ने कहा। "अगर वो खुद बताती और पता चल जाता, तो तेरे और गुड़िया के लिए भी ख़तरा हो जाता।"
मैंने आँखें बंद कर लीं। पीछे से बच्चों की आवाज़ आई — श्यामू काका के भतीजे-भतीजी, जो अभी झोपड़ी के सहारे खड़े थे। छोटी बच्ची अपनी उँगली मुँह में डाले मुझे देख रही थी।
"चल," टिंकू ने कहा। "पहले इन्हें माँ के पास छोड़ आते हैं। फिर सोचेंगे।"
रात का अंधेरा गाढ़ा था। हम दोनों चल रहे थे और बच्चे बीच में। छोटा लड़का, जिसका नाम टिंकू ने बताया — मुन्ना — डर के मारे मेरी उँगली पकड़े हुए था। बच्ची, जिसे वो गुड़िया कहकर बुला रहा था, थोड़ी बड़ी थी, पर उसकी भी साँस तेज़ चल रही थी।
रास्ते में कुत्ते भौंकने लगे। मुन्ना मेरी टाँगों से चिपक गया।
"डरो मत," टिंकू ने कहा और झुककर मुन्ना को गोद में उठा लिया। "मैं पहलवान हूँ।"
गुड़िया ने उसकी तरफ़ देखा और अपनी नाक सिकोड़ ली। "तुम तो दुबले हो। इतने दुबले तो हमारे गाँव का बकरा भी नहीं है।"
टिंकू हँस पड़ा। मेरे भीतर भी कुछ पिघला। "दुबला हूँ, पर खीर खाता हूँ," उसने कहा। "खीर खाने वाला कभी कमज़ोर नहीं होता।"
"अच्छा?" गुड़िया ने कहा। "तो कल हमें भी खीर खिलाओ।"
"कल?" टिंकू ने मुन्ना को कंधे पर बिठाया। "कल तो मैं बड़ा काम करने वाला हूँ। परसों आना, मैं तुम दोनों को इतनी खीर खिलाऊँगा कि पेट निकल आएगा।"
मुन्ना उसके कंधे पर बैठकर हँसने लगा। बच्ची ने भी मुस्कुरा दिया। मैंने देखा — टिंकू के चेहरे पर वो मुस्कान थी जो हमेशा होती थी, पर इस बार उसमें कुछ और भी था। एक आदमी जो अपने डर को बच्चों के हँसने में छुपा रहा था।
टिंकू की माँ का घर गाँव के किनारे था। छोटा-सा, मिट्टी का, दरवाज़े पर पुरानी चटाई बिछी थी। अंदर से हल्की रोशनी आ रही थी। टिंकू ने दरवाज़ा खटखटाया।
अंदर से आवाज़ आई — "कौन है? इतनी रात को?"
"माँ, मैं हूँ," टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ में अचानक वो बड़ी-बड़ी बातें नहीं थीं। सिर्फ़ एक बेटा, जो अपनी माँ से बोल रहा था।
दरवाज़ा खुला। भीतर से एक औरत निकली — दुबली, पचास के आस-पास, सिर पर चोटी लिपटी हुई, हाथ में छोटा-सा दीया। उसने पहले टिंकू को देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर बच्चों को।
उसके हाथ का दीया काँपा।
"ये कौन है?" उसने धीरे से पूछा। "टिंकू, तूने ये बच्चे कहाँ से उठाए? और ये लड़का…" उसकी आँखें मेरी तरफ़ उठीं, "ये तो वही है न? वीर?"
"हाँ, माँ," टिंकू ने कहा। "ये वीर है।"
उसकी माँ ने दीया नीचे रखा। उसके हाथ अब भी काँप रहे थे। "तू जानता है ना, इसका पापा क्या था? इसका नाम सुनकर ही…" वो रुक गई। उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में डर था, पर दया भी।
"माँ," टिंकू ने कहा। उसने बच्चों को नीचे उतारा और दो कदम आगे बढ़ा।
फिर उसने वो किया जो मैंने उसे पहले कभी करते नहीं देखा था। वो सीधा खड़ा हुआ। कमर सीधी की। कंधे पीछे किए। जो हमेशा झुका-झुका, हँसता-हँसाता टिंकू था, वो कहीं चला गया।
"माँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो हिचक नहीं थी जो हमेशा होती थी,"भाई सही काम कर रहा है। इस गाँव में बीस साल से ज़हर बिक रहा है। और जो लोग मर रहे हैं, वो बीमार नहीं हैं। उन्हें मारा जा रहा है। वीर उस ज़हर का सच खोल रहा है। और मैं उसके साथ हूँ।"
उसकी माँ चुप खड़ी रही।
"तू जानता है ये क्या बोल रहा है?" उसने धीरे से कहा। "भैरव सिंह से पंगा लेना क्या होता है, तूने देखा नहीं? श्यामू को देख — बीस साल से लंगड़ा घूम रहा है। रामदीन — कुएँ में। और तू…"
"माँ," टिंकू ने कहा। "मैं डरता हूँ। बहुत डरता हूँ। मेरे हाथ ठंडे हो रहे हैं अभी, देखो।" उसने अपनी हथेलियाँ दिखाईं। "पर आज दिन में जब ये मिठाई में पुड़िया डालने वाले का नाम पता चला, तो मुझे अपने ऊपर शर्म आई। इतने साल मैंने दुकान चलाई और मुझे पता भी नहीं चला कि मेरी ही मिठाई में किसी ने ज़हर घोल दिया। मेरी मिठाई, माँ। जो मैं अपने हाथ से बनाता हूँ।"
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
"वो मिठाई जिसके लिए तूने मुझे पहला तवा दिलाया था। याद है? तेरी साड़ी बेचकर।"
माँ की आँखें भर आईं।
टिंकू ने एक गहरी साँस ली। "आज पंचायत में मैं अपनी मिठाई का डिब्बा लेकर जाऊँगा। और जो उसमें पुड़िया डालता था, उसे ही पहले खिलाऊँगा। माँ, अगर मैं आज चुप रहा, तो कल तेरी मिठाई का नाम भी ज़हर के साथ जुड़ जाएगा। फिर कोई हमारी दुकान पर नहीं आएगा। और मैं वो नहीं चाहता।"
उसकी माँ ने उसकी तरफ़ देखा। फिर उसने धीरे से हाथ बढ़ाया। उसका हाथ टिंकू के सिर पर रखा। मैंने देखा — उसके हाथ की उँगलियाँ टिंकू के बालों में धँस गईं, जैसे किसी पुरानी आदत की तरह।
"मेरा बेटा डरपोक नहीं है," उसने कहा।
टिंकू ने एक झटके में उसके गले लग लिया। वो रो रहा था। मैंने सुना — उसकी साँस फूल रही थी, जैसे बच्चा रोता है, जैसे कई दिन की रुकी हुई चीज़ एक साथ निकलती है। उसकी माँ ने उसकी पीठ पर हाथ फेरा।
"चुप, चुप," वो बोली। "बच्चे देख रहे हैं।"
पर उसकी आवाज़ भी भर्राई हुई थी।
मैं दूर खड़ा था। मुन्ना मेरे पैर के पास बैठ गया था और उसकी बहन मेरे हाथ की तरफ़ देख रही थी। मेरा गला भर आया और मुझे पता नहीं चला कब।
माँ ने टिंकू के कंधे पकड़कर उसे अपने से दूर किया और उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया।
"दुकान का डिब्बा ले जाना," उसने कहा। "पर सुन — मिठाई में ज़हर मत डालना। हम ज़हर वाले नहीं हैं। सच बोलना, और बस।"
टिंकू ने सिर हिलाया। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, नाक बह रही थी। उसने जेब से रूमाल निकाला और मुँह पोंछा।
"भाई," उसने कहा, और आवाज़ फिर उसकी अपनी हो गई, थोड़ी खुरदुरी, थोड़ी हँसी वाली। "मैंने कहा था न — मेरी मिठाई जीतने वाले पहलवान के मुँह में जाएगी। आज का दिन भी आ गया।"
"तू तो खुद पहलवान बन गया," मैंने कहा।
"ना भाई," टिंकू ने कहा और मुन्ना के सिर पर हाथ रखा। "पहलवान तो तू है। मैं तो बस उसका रसोइया हूँ। पर आज रसोइया भी लड़ेगा।"
उसकी माँ ने हमें अंदर बुलाया। उसने बच्चों को पानी पिलाया, उनके हाथ-मुँह धुलाए और उन्हें अपने चारपाई पर सुला दिया। मुन्ना सोते-सोते भी टिंकू की उँगली पकड़े था।
"जाओ," उसकी माँ ने दरवाज़े पर कहा। "और टिंकू — अगर कोई तुझे छेड़े, तो खीर वाली बात याद रखना। तू खीर खाता है, कमज़ोर नहीं।"
टिंकू हँसा। फिर वो मुड़ा और कुछ सोचकर उसने माँ के पैर छुए। माँ ने उसका सिर सहलाया और अंदर चली गई।
रास्ते में टिंकू चुप था। मैं भी। चाँद आसमान पर था, पर बादल उसे बीच-बीच में ढक लेते थे। जब भी बादल हटता, रास्ता चाँदनी से भर जाता।
"भाई," टिंकू ने अचानक कहा।
"हूँ।"
"मुंशीजी… मतलब जगदीश। तेरा पापा।" वो रुका। "तू उससे क्या पूछेगा पंचायत में?"
मैंने सोचा। पंचायत में मैं खड़ा होऊँगा, सबके सामने, और वो सामने बैठा होगा। मेरा पापा। जिसने मुझे गोद में खिलाया होगा। जिसकी धोती मैंने जलाई थी। जिसके नाम पर माँ ने मुझे पूरा जीवन सिखाया।
"मैं उससे पूछूँगा," मैंने कहा, "कि जब वो मेरी मिठाई में ज़हर डालता था, तो उसके हाथ काँपते नहीं थे?"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
"और अगर वो कहे कि काँपते थे?"
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