Spirit of a Fighter – Chapter 350
"भैरव के पास एक तीसरा आदमी है, जो अखाड़े के अंदर बैठा है और हम सबको देखता है — वो पंचायत का मुखिया है।"
मीरा ने डायरी बंद कर दी। रात अंधेरी हो चुकी थी और नहर का पानी काला दिख रहा था।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"सरपंच?" मैंने कहा।
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"सरपंच?" मैंने कहा।
शब्द मुँह से निकला और हवा में लटक गया। मीरा ने डायरी अपनी गोद में रखी और आँखें बंद कर लीं, जैसे किसी चीज़ को अंदर तक जाने दे रही हो।
"माधव सिंह," उसने धीरे से कहा। "गाँव का मुखिया। जिसके हाथ में पंचायत है, ज़मीन के काग़ज़ हैं, और वो कुर्सी है जिस पर मेरे पापा बैठे हैं।"
टिंकू ने रजिस्टर अपनी छाती से चिपका लिया, जैसे उसे भी ठंड लग रही हो। "मतलब… जिस आदमी के पास गाँव का पूरा हिसाब है, वही सबसे बड़ा…"
"हाँ," मीरा ने कहा। "और कल मैंने उसके सामने अलमारी का काग़ज़ रखकर कहा था — 'सरपंच जी, ये सब सच है।' मैंने उससे इंसाफ़ माँगा था।"
उसकी आवाज़ में जो पछतावा था, वो मेरे सीने में लगा। मैंने उसकी तरफ़ देखा। चाँद नहर के पानी में काँप रहा था और उसका चेहरा आधा अंधेरे में था।
"तूने क्या किया," मैंने कहा, "वो ग़लत नहीं था। ग़लत वो है जो उसने किया।"
"पर वीर," उसने मेरी तरफ़ मुड़कर कहा, "अगर सरपंच भी भैरव का आदमी है, तो पंचायत में सच कहने का मतलब क्या? हम सबूत लेकर जाएँगे, वो उन्हें मेज़ के नीचे दबा देगा। हम गवाह लाएँगे, वो उन्हें डरा देगा। पंचायत उसकी है, वीर। पंचायत का चबूतरा, पंचायत की छत, पंचायत की आवाज़ — सब उसकी।"
टिंकू ने सूखी हँसी हँसी। "और मैं सोच रहा था कि मेरा रजिस्टर सबसे बड़ा सबूत है।"
"वो है," मैंने कहा। "पर सिर्फ़ तब, जब उसे सुनने वाला कोई हो जो सरपंच के डर से न काँपे।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ जगी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी — जैसे किसी ने अंधेरे कमरे में दीया जलाया हो।
"तो हमें ऐसा सबूत चाहिए जो पंचायत से ऊपर हो," उसने कहा। "पुलिस। मजिस्ट्रेट। कोई ऐसा जिसके सामने सरपंच की कुर्सी भी छोटी हो जाए।"
"पुलिस?" टिंकू ने कहा। "वो जिसमें भैरव के आदमी बैठे हैं?"
"इसीलिए तो बाहर की पुलिस चाहिए," मीरा ने कहा। "किसी दूसरे ज़िले की। और साथ में एक डॉक्टर का हस्ताक्षर — जो लैब रिपोर्ट देखकर कहे कि ये पानी ज़हर है। बस एक हस्ताक्षर, और सरपंच की पूरी कुर्सी हिल जाएगी।"
"कौन डॉक्टर?" मैंने पूछा।
मीरा ने अपना बैग खोला। उसमें किताबों के बीच एक पुरानी स्लिप थी, फटी, मुड़ी हुई। उसने उसे निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"मेरे कॉलेज के प्रोफ़ेसर," उसने कहा। "डॉक्टर भारद्वाज। मैंने उनके साथ तीन साल आयुर्वेद की पढ़ाई की है। वो ऐसे आदमी हैं जो किसी पैसे के लिए हस्ताक्षर नहीं करते। एक बार मैंने उनसे पूछा था — 'सर, आप इतने कड़े क्यों हैं?' तो वो बोले थे — 'क्योंकि जब मैं हस्ताक्षर करता हूँ, तो मेरी माँ समझती है कि किसी का हक़ नहीं मारा गया।'"
मेरे हाथ में वो स्लिप थी। काग़ज़ पर उनका नाम और एक पुराना पता लिखा था। मैंने उसे ध्यान से मोड़कर अपनी धोती की कमर में खोंस लिया।
"तो तय है," मैंने कहा। "पहले सारे काग़ज़ जमा करेंगे — तेरी लैब रिपोर्ट, टिंकू का रजिस्टर, हरनाम की हरी कॉपी, रघुवीर पापा की डायरी। फिर सब एक साथ बाहर ले जाएँगे। किसी को भनक भी नहीं लगने देंगे।"
"और सरपंच?" टिंकू ने पूछा।
"सरपंच को हम पंचायत में वो देंगे जो वो सबसे ज़्यादा डरता है," मीरा ने कहा। "सबूत, सबके सामने।"
टिंकू ने अपना रजिस्टर उठाया। "मेरा तो काम ही यही है।" फिर वो रुका और हम दोनों की तरफ़ देखा। "पर एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"अगर सरपंच सब जानता है… तो उसने अब तक हमें क्यों नहीं रोका? हम तीन लोग, उसके गाँव में, उसकी ज़मीन पर, उसके ख़िलाफ़ काग़ज़ जमा कर रहे हैं। वो हमें रोक क्यों नहीं रहा?"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने नहर के पानी की तरफ़ देखा। पानी अंधेरे में बह रहा था, और मुझे अचानक लगा कि वो हमें देख रहा है।
"क्योंकि वो चाहता है," मैंने कहा, "कि हम सब जमा कर लें। ताकि एक ही बार में सब मिटा सके।"
रात ख़त्म होने को आई थी जब मैं घर पहुँचा। आँगन में चूल्हे की लाल रोशनी काँप रही थी। माँ बैठी थीं, सामने तवा रखा था, पर रोटी नहीं बन रही थी। सिर्फ़ हाथ तवे पर टिका था और आँखें आग में।
मैंने दरवाज़े पर पैर रखा तो उन्होंने सिर नहीं उठाया। बस कहा — "आ जा। हाथ धो ले।"
मैंने हाथ धोए। पानी ठंडा था और उँगलियों के छाले जल रहे थे। मैं उनके पास बैठ गया। चूल्हे की आग मेरे चेहरे पर लग रही थी।
"माँ," मैंने कहा। "आज रात…"
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। और फिर वो चुप हो गईं। बस आग देखती रहीं।
मैंने देखा कि उनके हाथ काँप रहे हैं। वो हमेशा काँपते हैं, पर आज अलग तरह से — जैसे किसी चीज़ को पकड़े हुए हों और छोड़ने से डर रही हों।
"माँ," मैंने धीरे से कहा। "सरपंच।"
उन्होंने आग से नज़र हटाई। मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चमक थी जो सिर्फ़ उनके चेहरे पर आती है — जो न डर है, न गुस्सा, बस एक ठंडा सा यकीन।
"माधव सिंह," उन्होंने कहा। "हाँ। मैं जानती हूँ।"
"तू जानती है?"
"बेटा, जिस आदमी ने तेरे दोनों पापाओं को मिट्टी में मिलाया, उसका नाम मैं बीस साल से अपने दिल में रखे हुए हूँ।" उन्होंने तवे की तरफ़ देखा। "रघुवीर की आख़िरी रात… मैं उनके पास बैठी थी। उन्होंने मुझसे कहा था — 'सरस्वती, इस घर की दीवारें कुछ ज़्यादा ही ऊँची हैं। इनमें एक आदमी छिपा है।' मैंने पूछा — 'कौन?' तो वो बोले — 'जो अपने हाथ साफ़ रखता है और हमारे हाथ गंदे करता है।' उस रात के बाद रघुवीर तीन दिन में चले गए।"
मेरे गले में कुछ अटक गया। मैंने आग में लकड़ी डाली। चिंगारी उठी और फिर बुझ गई।
"और जगदीश पापा?" मैंने कहा।
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने अपनी साड़ी का छोर उठाया — वही पुरानी, फीकी पड़ चुकी लाल साड़ी जो वो हर रविवार पहनती हैं। छोर में एक गाँठ थी। उन्होंने धीरे-धीरे खोली।
मैंने देखा।
एक छोटी पोटली थी — कपड़े में बँधी हुई, जैसे कोई बच्चा अपना खज़ाना बाँधता है। उन्होंने उसे खोला। अंदर से निकला — सूखी हल्दी की एक गाँठ, जो हाथ लगाते ही टूट गई और उँगलियों पर पीली धूल छोड़ गई; एक कंगन, टूटा हुआ, बीच से चटका; और एक तस्वीर, चारों कोनों से फटी, जिसमें एक आदमी खड़ा था — दुबला, लंबा, धोती में, सिर पर बाल घुंघराले। तस्वीर में उसकी आँखें आधी बंद थीं, जैसे वो हँस रहा हो और किसी ने बीच में फोटो खींच ली हो।
"ये…" मेरी आवाज़ फट गई।
"तेरे पापा जगदीश," माँ ने कहा। "ये तस्वीर उस दिन खींची गई थी जिस दिन उन्होंने अखाड़े में पहली बार जीत जीती थी।" उन्होंने उँगली तस्वीर पर रखी। "और ये कंगन — ये मेरा था। उन्होंने जीत के बाद मुझे पहनाया था, और कहा था — 'सरस्वती, ये तो टूटेगा, पर मेरा वादा नहीं टूटेगा।'"
"कब टूटा?"
"उसी रात जब उन्हें ज़हर दिया गया।" उन्होंने कंगन उठाया और रोशनी में देखा। "मैं अस्पताल भागी। वहाँ उनका हाथ पकड़ा तो कंगन हाथ से फिसला और गिरकर टूट गया। डॉक्टर बोले — 'इन्हें बचाया नहीं जा सकता।' और जगदीश ने मेरी तरफ़ देखा। बस देखा। कुछ नहीं कहा। मुझे लगा वो कह रहे हैं — 'सरस्वती, अब तू सँभाल।'"
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