Spirit of a Fighter – Chapter 347
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था। मेरे पास जवाब नहीं था।
"हम तीनों — मैं, रणवीर और जगदीश — उसे अपना छोटा भाई मानते थे। सच में। मैं उसे अपने साथ तहखाने ले जाता था। वो मिट्टी में लेटता और कहता — 'दादा, ये मिट्टी गरम है। जैसे किसी की साँस।' मैं हँसता था। वो सच कहता था। पता नहीं। अब पता चलता है कि वो सच कहता था।"
मेरा गला सूखने लगा। मैंने गिलास उठाया, पानी पिया, और पढ़ता रहा।
"मोहन बड़ा होता गया और उसका हाथ तेज़ होता गया। वो कुश्ती में सबको पछाड़ने लगा। एक दिन उसने रणवीर को मैदान में गिरा दिया। रणवीर हँसा। मैंने थप्पड़ मारकर उसे उठाया और कहा — 'मोहन, ये तो खेल है।' वो मुस्कुराया। मुझे तब पता नहीं चला कि वो मुस्कुराहट नहीं थी। वो चाकू था, जिसे उसने छिपाकर रखा।"
मैं रुका। मीरा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"पढ़ते जा," वो बोली।
"पर वो सबसे बड़ी बात ये थी कि मोहन के अंदर एक और आदमी बैठा था। जो दिन में हँसता था, रात में ज़हर बनाता था। मुझे पहली बार शक हुआ जब मैंने उसे तहखाने में अकेले देखा — रात को, लालटेन लेकर। वो मिट्टी में कुछ डाल रहा था। मैंने पूछा — 'ये क्या है?' वो बोला — 'दादा, ताकत। ताकत का पानी।' मैंने उसका हाथ पकड़ा और बोला — 'इसे फेंक दे।' उसने फेंका नहीं। उसने कहा — 'दादा, तुम भी पियोगे, तब समझोगे।'"
मेरे हाथ काँपने लगे।
"फिर एक दिन रणवीर की कुश्ती थी। बड़ा मुकाबला। मोहन ने रणवीर के पानी में कुछ डाल दिया। मुझे खेल के बीच गंध आई — वो गंध जो आज तक भूलता नहीं। मैंने रणवीर का गिलास छीन लिया। मोहन को अलग बुलाया। उसने मेरी आँखों में देखकर कहा — 'दादा, तुमने हमेशा सब कुछ मुझसे पहले पाया है। अब मैं लूँगा।'"
मैंने डायरी से नज़र उठाई। कमरे में सन्नाटा था। बाहर कबूतर फड़फड़ाए, पर अंदर कोई हिला नहीं।
"उस रात मैंने उसे माफ़ कर दिया," मैंने पढ़ा, आवाज़ भारी हो रही थी। "ये मेरी सबसे बड़ी भूल थी। मैंने सोचा — बच्चा है। सुधर जाएगा। पर मोहन सुधरा नहीं। मोहन ने उस दिन मेरी माफ़ी को अपनी जीत समझ लिया। वो मुस्कुराया और बोला — 'दादा, तुमने मुझे माफ़ कर दिया। अब मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूँगा।'"
मीरा ने अपनी साँस रोक ली। रणवीर सिंह की आँखों से पानी बह रहा था, वो पोंछ भी नहीं रहे थे।
मैंने अगला पन्ना पलटा।
"मोहन गायब हो गया। कुछ महीने बाद खबर आई कि कहीं शहर में एक पहलवान मर गया — पानी पीकर। फिर दूसरा। फिर तीसरा। मैं उन मौतों की तरफ़ भागा। रास्ते में जगदीश मिला। वो रो रहा था। उसने कहा — 'भाई, मोहन अब भैरव है। उसने नाम बदल लिया। और वो अब भी मुझे बुलाता है। मुझे डर है।'"
मैं रुका। मेरे हाथ ठंडे हो गए थे। मैंने डायरी को दोनों हाथों से पकड़ लिया।
"जगदीश ने उस रात मुझे अपने घर बुलाया। वो बीमार था — उसका चेहरा पीला था और होंठ फटे हुए। उसने मेरा हाथ पकड़ा और बोला — 'भाई, मुझे माफ़ कर देना। मैंने मोहन को पहचान लिया था, पर डर के मारे चुप रहा। अब जब मैं मरने को हूँ, तो सच बता रहा हूँ। मोहन ने ज़हर मुझे भी दिया। धीरे-धीरे। छोटी-छोटी खुराक। मैं खुद नहीं जानता कि मैं अब कितने दिन का हूँ।' मैंने उसका हाथ छोड़ा और पूछा — 'क्या तुम उसे पकड़वा सकते हो?' वो बोला — 'नहीं। पर एक बात कहो। मोहन को माफ़ कर देना। वो हमारा ही हिस्सा है। वो हमारे अखाड़े की मिट्टी में पला है। उस मिट्टी में कहीं वो भी है।'"
मेरी आवाज़ टूट गई।
मैंने डायरी नीचे कर ली।
मीरा ने मेरा हाथ थाम लिया। "वीर?"
"मेरे पापा ने उसे माफ़ कर दिया था," मैंने कहा। मेरी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी और की हो। "अपनी मौत से पहले। उस आदमी ने उन्हें ज़हर दिया, और उन्होंने कहा — माफ़ कर देना। मोहन को। वो हमारा ही हिस्सा है।"
मेरी आँखें जलने लगीं। मैंने पीछे हटकर दीवार को टेक लिया।
"और वो मोहन," मैंने कहा, "वो इन बीस सालों में हमारे अखाड़े में बैठा रहा। हमारे ही कुएँ का पानी पीता रहा। हमारे ही पहलवानों को ज़हर देता रहा। और मेरे पापा ने उसे माफ़ कर दिया था।"
मेरा गला भर आया। मैं चुप हो गया।
मीरा मेरे पास आई। उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में भी पानी था, पर वो रोई नहीं। उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ा।
"तेरे पापा ने उसे माफ़ किया," वो बोली, "पर माफ़ करना भूलना नहीं होता। तेरे पापा ने उसे माफ़ किया, पर उन्होंने उसे रोका भी नहीं। और यही उनकी सबसे बड़ी गलती थी।" वो रुकी। "हमें वो गलती नहीं करनी है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर पसीना था, पर आँखें साफ़ थीं।
"तू ठीक कह रही है," मैंने कहा। "माफ़ी उनके हिस्से की। सच हमारे हिस्से का।"
रणवीर सिंह ने कराहते हुए कहा — "वीर। आगे पढ़।"
मैंने डायरी फिर उठाई।
डायरी के कुछ पन्ने खाली थे। फिर कुछ पन्नों पर बस लाइनें लिखी थीं, आधी अधूरी — जैसे लिखते-लिखते हाथ रुक गया हो। फिर आख़िरी दो पन्ने। दोनों तरफ़ मोटी लिखाई, दबी हुई कलम से। जैसे लिखने वाले को जल्दी थी।
"रामदीन ने मुझे बताया कि भैरव ने उसे कुएँ में बंद कर दिया। रामदीन ने मुझसे कहा — 'रघुवीर, जो तुम्हारे अखाड़े में बैठा है, वो भैरव नहीं। भैरव सिर्फ़ हाथ है। असली दिमाग़ कोई और है। जो हर बात में भैरव से ऊपर बैठता है, पर कभी सामने नहीं आता।' मैंने पूछा — 'कौन?' वो बोला — 'जिसे तुम अपना भाई मानते हो।' मैंने सोचा — रामदीन पागल हो गया है। जगदीश तो मर चुका। रामदीन नहीं मरा था, वो जानता था। मैंने उसे ऐसे ही छोड़ दिया।"
मैंने पन्ना पलटा।
आख़िरी पन्ना। बस एक लाइन। बीच में थोड़ी जगह छोड़कर।
"भैरव के पास एक तीसरा आदमी है, जो अखाड़े के अंदर बैठा है और हम सबको देखता है — वो पंचायत का मुखिया है।"
मेरा हाथ जम गया।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।
"सरपंच," वो धीरे से बोली।
"सरपंच," मैंने दोहराया।
कमरे में सन्नाटा छा गया। रणवीर सिंह ने आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी।
"पर सरपंच तो—" मीरा रुकी। "सरपंच तो गाँव के सबसे ईमानदार आदमी माने जाते हैं। वो हर पंचायत में सबके सामने खड़े होकर भैरव के खिलाफ़ बोलते हैं।"
"और यही उनका सबसे बड़ा हथियार है," मैंने कहा। "जो आदमी सबके सामने भैरव को गाली देता है, उस पर किसी को शक नहीं होता।"
मीरा ने अपना बैग उठाया। उसने अंदर से एक फ़ाइल निकाली — पुरानी, भूरी, कोने से मुड़ी हुई।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"तीन पहलवानों की रिपोर्ट," वो बोली। "नीले धब्बे वाली। मैंने इन्हें तीन महीने पहले निकाला था। इनमें एक बात है जो मैंने तुझे नहीं बताई।" उसने फ़ाइल खोली। "हर रिपोर्ट पर एक हस्ताक्षर है। मेडिकल बोर्ड के।"
उसने उँगली रखी।
"इन तीनों को मौत प्रमाणपत्र देने वाला एक ही डॉक्टर है। और वो डॉक्टर—"
वो रुकी। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"वो सरपंच का भांजा है।"
मैंने फ़ाइल अपने हाथ में ली और उन हस्ताक्षरों को देखा। मेरी नाक में एक गंध आई — काग़ज़ की, स्याही की। पर उसके नीचे कुछ और भी था। हल्की सी, कड़वी।
"ये काग़ज़ कहाँ रखा था?" मैंने पूछा।
"अपने कमरे में। बक्से में। ताले के अंदर।"
"ताले के अंदर," मैंने दोहराया। "तो ये गंध ऊपर से नहीं आ रही। ये अंदर से आ रही है।"
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