Spirit of a Fighter – Chapter 345
फिर रणवीर सिंह का शरीर ऐंठा। उनकी छाती उठी और वो करवट लेकर काँपने लगे। मैंने उन्हें सँभाला। मीरा ने उनका सिर पकड़ा और वो उल्टी करने लगे — पीला, कड़वा पानी, जिसकी गंध से मेरा अपना पेट पलट गया।
मैंने मुँह फेर लिया।
पर मीरा नहीं फेरी। वो उनका सिर सहलाती रही, उनकी पीठ थपथपाती रही, और उसके होंठ लगातार हिलते रहे — कुछ मंत्र, कुछ दुआ, कोई बात जो सिर्फ़ बाप-बेटी के बीच की होती है।
उल्टी रुकी। रणवीर सिंह फिर लेट गए। उनका चेहरा सफ़ेद था, पर साँस अब गहरी थी — जैसे किसी ने गले से कोई गाँठ खोल दी हो।
मीरा ने उनका मुँह पानी से धोया। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, पर होठों पर कुछ और।
"तुमने सही वक़्त पर पहचाना," उसने कहा। "अगर तुम न होते, तो मैं… मैं उन्हें और ये दवा पिला देती।"
"वो दवा नहीं थी," मैंने कहा।
"मुझे पता है।" उसकी आवाज़ टूटी। "पर मैंने उन्हें पिलाई थी, वीर। कल रात। एक चम्मच। उस आदमी ने कहा था कि ये नई दवा है और—"
"मीरा।"
वो चुप हो गई। उसने अपने हाथ देखे, जैसे उन पर कोई दाग़ हो जो धुल नहीं रहा।
"मैंने अपने पापा को ज़हर पिलाया," वो बोली, बहुत धीरे। "अपने हाथों से।"
मैंने उसके हाथ पकड़े। उसके हाथ ठंडे थे — बर्फ़ जैसे। और काँप रहे थे।
"उसने पिया नहीं," मैंने कहा। "तूने नहीं पिलाया। उस आदमी ने पिलाने की कोशिश की, और तेरे पापा ने गिलास पटक दिया। इसीलिए फ़र्श पर पानी था। इसीलिए गिलास टूटा था। तेरे पापा ने खुद को बचाया। उन्होंने वो ज़हर नहीं पिया।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
तभी नीचे से एक आवाज़ आई — खुरखुरी, धीमी, जैसे सूखी लकड़ी चटके।
"पानी…"
मीरा घुटनों के बल बैठ गई। "पापा!"
रणवीर सिंह की आँखें खुल रही थीं। धीरे-धीरे, जैसे कोई भारी दरवाज़ा खुलता हो। उन्होंने पलकें झपकाईं। फिर उनकी नज़र मीरा पर पड़ी और उनके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — डर नहीं, गुस्सा नहीं। कुछ और। जैसे किसी ने उन्हें बहुत दूर से लौटाया हो।
"पानी," उन्होंने फिर कहा।
मीरा ने कटोरी में पानी लिया और उनके होंठों से लगाई। वो पीने लगे — धीरे, घूँट-घूँट। पानी उनकी ठुड्डी से बह गया। मीरा ने उसे अपनी आस्तीन से पोंछा।
"बस," उन्होंने कहा। "बस इतना।"
वो कुछ देर चुप लेटे रहे। छत को देखते रहे। मैंने देखा कि उनके होंठ हिल रहे थे — जैसे कोई चीज़ गिन रहे हों। या कोई चीज़ याद कर रहे हों।
फिर उन्होंने धीरे से कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे, "मैंने पिया नहीं।"
मीरा की साँस रुक गई।
"मैंने गिलास पटक दिया था।" उनकी आवाज़ अब भी धीमी थी, पर साफ़। "वो आदमी आया। कहने लगा कि नई दवा है, डॉक्टर साहब ने भेजी है। मैंने कहा रख जा मेज़ पर। वो रखकर गया। फिर मैंने खिड़की से देखा कि वो गली के मोड़ पर रुककर किसी का इंतज़ार कर रहा है। और मुझे वो गंध आ गई।"
वो रुके। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें थकी थीं, पर उनमें वो चमक अब भी थी जो अखाड़े के मालिक की आँखों में होती है।
"मैंने वो गिलास उठाया," उन्होंने कहा, "और फ़र्श पर पटक दिया। जान-बूझकर। ताकि जब वो आदमी वापस आकर देखे, तो उसे पता चले कि मैंने पिया नहीं। ताकि वो भैरव को जाकर बताए कि मुझे पता चल गया।"
मीरा उनके पास और पास आ गई। "आपने जान-बूझकर किया?"
"मैंने सोचा," वो बोले, "कि अगर वो समझेगा कि मैंने पिया है, तो वो अगली बार और आएगा, और अगली बार शायद मैं न बचूँ। पर अगर वो समझेगा कि मैंने पकड़ लिया, तो वो जल्दबाज़ी करेगा। और जल्दबाज़ी में आदमी ग़लती करता है।"
उन्होंने साँस भरी। छाती फूली और फिर गिरी।
"पर जब मैंने गिलास पटका," उन्होंने धीरे से कहा, "तो कुछ पानी मेरे होंठों पर छिटक गया। और मुझे लगा… मुझे लगा मेरी छाती जल रही है। और फिर सब अंधेरा हो गया।"
मीरा का सिर उनकी छाती पर गिर गया। वो रोई — पहली बार खुलकर। उसके कंधे हिल रहे थे और उसकी उँगलियाँ उनकी कमीज़ की क़मीज़ पकड़े हुए थीं।
रणवीर सिंह ने धीरे से अपना हाथ उठाया। वो हिल रहा था — कमज़ोर, काँपता, जैसे हवा में कोई सूखा पत्ता। उन्होंने वो हाथ मीरा के सिर पर रखा।
"रो मत," वो बोले।
मीरा और रोई।
"मैंने बीस साल तुम्हारी माँ से वादा किया था," उनकी आवाज़ भारी हो गई, "कि तुम्हें बचाऊँगा। और आज मैं खुद गिर गया। अपनी बेटी की नज़रों के सामने, अपने ही घर में।"
मीरा ने सिर उठाया। उसका चेहरा लाल था, आँखें सूजी हुईं, पर उसकी आवाज़ में वो सीधापन था जो हमेशा उसके बोलने में होता है।
"आप गिरे नहीं, पापा।" उसने उनका हाथ पकड़ा और अपने गालों से लगाया। "आपने गिलास पटककर हमें बचा लिया। अगर आपने वो गिलास न पटका होता, तो वो ज़हर आपके पेट में होता, और… और मुझे पता भी न चलता। मैं आपको वो पिला देती।"
उसकी आवाज़ फिर टूटी। "मैं अपने पापा को ज़हर पिला देती।"
"पर तूने नहीं पिलाया," रणवीर सिंह ने कहा। "मैंने नहीं पीया। हम दोनों ने मिलकर उसे धोखा दिया।"
उन्होंने मीरा के गालों को हाथों से पकड़ा और उसका सिर अपनी तरफ़ किया। उनकी आँखों में पानी था। मैंने पहली बार देखा कि रणवीर सिंह रो रहे थे — चुपचाप, बिना आवाज़।
"तू मेरी बेटा है," वो बोले, "बेटी नहीं। समझी?"
मीरा ने सिर हिलाया। उसके होंठ काँप रहे थे।
"अगर मैं आज मर भी गया होता," रणवीर सिंह ने कहा, "तो मरते वक़्त यही जानकर मरता कि मेरी बेटी ने मेरे लिए गिलास पटकवा दिया। ये बहुत है। इससे ज़्यादा किसी बाप को क्या चाहिए?"
मेरे गले में कुछ अटक गया। मैंने मुँह फेर लिया। मेरी अपनी माँ याद आई — चक्की पर बैठी, कमर का दर्द छुपाती, मेरे लिए नमक कम डालती।
कुछ देर हम तीनों चुप रहे। सिर्फ़ रणवीर सिंह की साँस सुनाई दे रही थी — अब गहरी, अब साफ़।
फिर उन्होंने करवट बदली और मेरी तरफ़ देखा।
"वीर।"
मैं उनके पास आया। "हाँ, सर।"
"तूने क्या वो पन्ना पढ़ा जो नहर के किनारे मिला था?"
मैंने जेब से वो फटा पन्ना निकाला। मेरा हाथ काँपा नहीं, पर मैंने इसे धीरे से खोला।
"पढ़ो," उन्होंने कहा।
मैंने पढ़ा। "…दिन कम हैं। उसका बेटा अब समझ रहा है। उसे रोकना होगा। तरीका वही पुराना है — दवा। पहले बूढ़ा, फिर बेटा।"
रणवीर सिंह की आँखें बंद हो गईं। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, पर उनकी उँगलियाँ चादर को ऐसे पकड़े हुई थीं जैसे किसी की गर्दन पकड़ रही हों।
"पहले बूढ़ा," उन्होंने धीरे से दोहराया। "मतलब मैं। और फिर बेटा — मतलब तू।"
"सर—"
"वो मुझे मारकर तुझे तोड़ना चाहता है," उन्होंने कहा। "सोचता है कि मेरे जाने से मीरा टूट जाएगी और तू अकेला पड़ जाएगा।" उन्होंने आँखें खोलीं। "वो ग़लत है। पर उसे ये बात समझानी पड़ेगी।"
"कैसे?"
रनवीर सिंह कुछ देर छत को देखते रहे। फिर उन्होंने मीरा की तरफ़ देखा और फिर मेरी तरफ़।
"वो पन्ना जेब में रख," उन्होंने कहा। "और मेरी डायरी ला।"
मेरे पैर रुक गए।
"कौन-सी डायरी, सर?"
"जो मैंने तुझे दी थी। रघुवीर की डायरी।" उनकी आवाज़ में अब वो गरज लौट रही थी जो पहलवानों की आवाज़ में होती है — कमज़ोर शरीर में भी। "उसके आख़िरी पन्ने पलट। जो पन्ने मैंने तुझे पहले नहीं पढ़ने दिए थे।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो उठकर ताक पर रखी डायरी ले आई। उसका कवर चमड़े का था और कोना मुड़ा हुआ। वो मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
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