Spirit of a Fighter – Chapter 334
दूर से आवाज़ आई — रसोई की तरफ़ से। बर्तन गिरने की। फिर किसी के चिल्लाने की। पर वो चिल्लाहट गुस्से की नहीं थी। हँसी की थी।
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "चल, यहाँ से।"
हम पीछे के रास्ते से निकले। नीम के पेड़ के नीचे, जहाँ ज़मीन पर पुरानी पत्तियाँ दबी पड़ी थीं। मैंने पैर रखा तो सूखी पत्तियाँ चटकीं — और वो आवाज़ उस रात में ऐसी फटी कि मैंने अपनी साँस रोक ली।
कालू काका ने लालटेन बुझा दी।
"यहाँ से आगे अंधेरे में," उन्होंने कहा।
हम अंधेरे में चले। मेरा हाथ धोती पर था — बोतल की गोलाई पर। और मेरा दिल ऐसे धड़क रहा था जैसे कोई दूर का ढोल बज रहा हो।
नीम के पेड़ के पीछे एक झोपड़ी थी। पुरानी, टूटी। जिसका छप्पर आधा गिर चुका था और जिसकी दीवारें मिट्टी से लिपी थीं। कालू काका ने दरवाज़ा खोला और मुझे अंदर जाने का इशारा किया।
अंदर एक छोटा-सा चूल्हा था। बुझा हुआ। और एक चारपाई। और चारपाई के नीचे एक लोहे का डिब्बा।
"बैठ," उन्होंने कहा।
मैं बैठा। चारपाई चरमराई।
कालू काका मेरे सामने ज़मीन पर बैठ गए। उनकी घुटनों से आवाज़ आई — जैसे कोई पुराना दरवाज़ा खुल रहा हो।
"अब बता," उन्होंने कहा। "सुक्खी ने क्या कहा?"
मैंने उन्हें वो सब बताया जो सुक्खी बुआ ने कहा था। पहले वो चुगलखोर लय में नहीं बोली थी। और फिर वो फुसफुसाई थी।
कालू काका सुनते रहे। उनका चेहरा पत्थर जैसा था। जब मैंने "तीसरा आदमी" वाली बात कही, तो उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
"काका?"
"सुक्खी झूठ नहीं बोली," उन्होंने धीरे से कहा। "तीसरा आदमी सच में है।"
मेरी साँस रुक गई।
"कौन है?"
उन्होंने आँखें खोलीं। और उनकी आँखों में वो पानी था जो बूढ़े लोगों की आँखों में तब आता है जब वो बहुत पुरानी बात याद करते हैं।
"मैं नहीं जानता कि वो कौन है," उन्होंने कहा। "पर मैं जानता हूँ कि वो क्या है।"
"क्या?"
"वो हाथ है।" कालू काका ने अपना हाथ उठाया और हवा में पकड़ा। "जो भैरव की पीठ के पीछे है। जो उसे गिराता है, उठाता है, और जिसका नाम कभी किसी काग़ज़ पर नहीं आता।"
"तो भैरव भी…"
"भैरव खुद किसी का हाथ है, बेटा।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तू सोचता है भैरव सबसे बड़ा है? भैरव सिर्फ़ वो चेहरा है जो दिखता है। असली आदमी वो है जिसने भैरव को बनाया।"
झोपड़ी के बाहर हवा चली। छप्पर से सूखी घास गिरी।
"कब से?" मैंने पूछा। "ये सब कब से?"
कालू काका ने अपना हाथ नीचे किया।
"जब से अखाड़ा बना," उन्होंने कहा। "अखाड़ा पहले एक ज़मीन का टुकड़ा था। फिर एक मिट्टी का मैदान बना। फिर एक नाम बना — रणवीर अखाड़ा। और जिस दिन इसका नाम पड़ा, उसी दिन से एक आदमी इसकी मिट्टी में अपने पैरों के निशान गाड़ रहा है।"
"रणवीर सिंह?"
कालू काका हँसे। पर हँसी में मिठास नहीं थी।
"रणवीर सिंह ने तो इस अखाड़े को अपने पसीने से बनाया," उन्होंने कहा। "पर जो आदमी इसे खा रहा है, वो बाहर से आया था। और उसका नाम…"
वो रुके।
"क्या?"
"मैं नाम नहीं जानता," उन्होंने कहा। "मैंने सिर्फ़ एक बार उसकी आवाज़ सुनी है। बीस साल पहले। उस रात जब रघुवीर मरा था।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"क्या सुना?"
"बस एक लाइन।" कालू काका की आवाज़ फुसफुसाहट बन गई। "भैरव कुएँ के पास खड़ा रो रहा था। और फिर एक आवाज़ आई — ऊपर से नहीं, नीचे से नहीं, पीछे से। आवाज़ ने कहा, 'अब तू अकेला नहीं है। अब हम दो हैं। और जब तक ये अखाड़ा रहेगा, हम दो ही रहेंगे।'"
झोपड़ी में सन्नाटा छा गया।
"और भैरव?"
"भैरव ने सिर्फ़ एक बात कही।" कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "उसने कहा, 'पर तीन तो हैं।'"
मेरी छाती में कुछ ठंडा फैल गया।
"तीन?"
कालू काका ने सिर हिलाया।
"तीन। भैरव। वो आवाज़। और तीसरा — जिसका नाम उस रात किसी ने नहीं लिया।"
मैंने धोती में से बोतल निकाली। हरी शीशी। मेरे हाथ में। लालटेन की रोशनी में उसका रंग ऐसा लग रहा था जैसे किसी ज़िंदा चीज़ का रंग हो।
कालू काका ने उसे देखा। और उनका चेहरा बदल गया।
"ये…" उन्होंने धीरे से कहा। "ये वही रंग है।"
"कौन-सा?"
"वो रंग जो रघुवीर के हाथ में था।" उन्होंने बोतल की तरफ़ हाथ बढ़ाया, पर छुआ नहीं। जैसे डरते हों। "उस रात जब वो मरा, उसकी मुट्ठी में कुछ था। मैंने सोचा था काँच है। पर वो यही रंग था।"
मैंने बोतल उनकी तरफ़ की।
"इसे छुओ मत," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ तेज़ था। "इसका ढक्कन भी नहीं।"
मैंने हाथ रोक लिया।
"क्यों?"
"क्योंकि जो इसके पास बैठता है, उसकी साँस में ये घुल जाती है।" उन्होंने अपनी नाक की तरफ़ इशारा किया। "मेरी नाक आज तक ठीक नहीं हुई। बीस साल से मुझे हर चीज़ में यही गंध आती है।"
मैंने बोतल वापस धोती में रखी। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"तो इसे क्या करें?"
कालू काका ने सोचा। उनकी आँखें डिब्बे पर टिकी थीं।
"इसे उस आदमी के सामने रखना है," उन्होंने कहा। "पर उसके लिए तुझे सबूत चाहिए। सिर्फ़ बोतल से कोई नहीं मानेगा। वो कहेगा — ये तो बाज़ार में मिलती है।"
"तो क्या करें?"
उन्होंने डिब्बा खोला। उसमें पुराने काग़ज़ थे। पीले पड़े। और कुछ चीज़ें — एक टूटी घड़ी, एक सिक्का, एक सूखा फूल।
"ये सब रघुवीर के हैं," उन्होंने कहा। "जो उस रात उसके पास था। मैंने इसे छुपाया था। भैरव को पता नहीं।"
"क्यों छुपाया?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में वो बात आई जो सुबह वाले दिन उन्होंने कही थी — "तेरी आँखें वैसी हैं।"
"क्योंकि मैं डर गया था," उन्होंने कहा। "और मैं आज तक खुद को माफ़ नहीं कर पाया।"
उनकी आवाज़ टूटी। और मैंने पहली बार देखा कि कालू काका — जो हमेशा मिट्टी में हाथ डाले खड़े रहते थे, जो कभी नहीं रोते थे — उनकी आँखों में पानी था।
"मैं उस रात वहाँ था," उन्होंने कहा। "मैंने रघुवीर को गिरते देखा। और मैं भाग गया। मैं इतना डर गया था कि मैंने उसकी लाश को भी नहीं उठाया।"
मैं चुप रहा। कुछ नहीं बोला। क्योंकि शब्द ऐसे मौकों पर छोटे लगते हैं।
"तू मुझे माफ़ नहीं करेगा," उन्होंने कहा। "पर मुझे इसकी आदत है।"
"काका," मैंने कहा। "माफ़ी देने के लिए मैं कौन हूँ?"
उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं। फिर सीधे हो गए।
"अब सुन," उन्होंने कहा। "मैंने सुक्खी की बात सुनी। वो कुएँ वाली बात। वो पूरी नहीं कही।"
"क्या?"
"सुक्खी ने कहा कि भैरव आज खुश लौटा है," उन्होंने कहा। "पर सुक्खी नहीं जानती कि क्यों। और मैं जानता हूँ।"
मेरी साँस रुक गई।
"क्यों?"
कालू काका ने डिब्बे से एक चीज़ निकाली। एक पतली सी लकड़ी। जिसके सिरे पर कुछ लिपटा था — राख में सना कपड़ा।
"ये राख है," उन्होंने कहा। "आज शाम कुएँ के पास से। भैरव ने आज कुछ जलाया है।"
"क्या?"
"मुझे नहीं पता।" उन्होंने लकड़ी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "पर इस राख को सूँघ। तेरी नाक मेरी नाक से तेज़ है।"
मैंने लकड़ी पकड़ी। और उसे अपनी नाक के पास लाया।
और मेरे पेट में एक झटका लगा।
"काग़ज़," मैंने धीरे से कहा। "जला हुआ काग़ज़। और…" मैंने फिर सूँघा। "और तेल। और… कुछ और।"
"क्या?"
"मिट्टी।" मैंने आँखें खोलीं। "तहखाने वाली मिट्टी।"
कालू काका का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"तो उसने तहखाने का कुछ जलाया है," उन्होंने कहा। "और अगर उसने तहखाने का कुछ जलाया है, तो…"
वो रुके। और मैंने उनकी आँखों में वो डर देखा जो मैंने पहले कभी नहीं देखा।
"तो क्या, काका?"
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