Spirit of a Fighter – Chapter 331
"कल दोपहर," उसने कहा। "अखाड़े के पीछे, नीम के नीचे। और वीर —"
"हाँ?"
"अगर भैरव कुछ भाँप गया, तो भागना मत। मेरी तरफ़ देखना। मैं वहीं रहूँगी।"
वो चली गई। मैं उसकी आहट सुनता रहा — जूतों की आवाज़ सूखी पत्तियों पर, फिर मिट्टी पर, फिर कुछ नहीं।
मैं घर की तरफ़ चला। रास्ते में मेरी जेब में शीशी थी, सीने पर चाबी थी, और हथेली पर सूखा खून। मैं सोच रहा था कि कल क्या होगा, और सोचते-सोचते मेरे कदम भारी हो रहे थे।
गाँव का बाज़ार पार करके, पंचायत के चबूतरे के पास से, जहाँ दिन में बूढ़े बैठते हैं और रात में सिर्फ़ सूखी पत्तियाँ रहती हैं। मैं उस चबूतरे के पास से गुज़रा और मेरी नाक में एक गंध आई — तेल, काग़ज़, और स्याही। हरनाम की गंध।
मैं रुक गया।
वो चबूतरे के कोने पर बैठा था, अकेला, फ़ाइलें गोद में रखे। उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। सिर्फ़ अपना चश्मा उतारा, साफ़ किया, और फिर से लगाया।
"वीर सिंह," वो बोला, आवाज़ ऐसी जैसे काग़ज़ की परतें उलट रहा हो। "इतनी रात को अकेले?"
"रास्ता है," मैंने कहा। "गुज़र रहा हूँ।"
"हम्म।" उसने फ़ाइल बंद की। "मैं भी गुज़र रहा हूँ। पर मैं रुक गया, क्योंकि मुझे कुछ बताना है।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मेरी नाक उसकी गंध पढ़ रही थी — आज उसके पसीने में भैरव की बोतल वाली कड़वाहट नहीं थी। आज उसके पसीने में डर था। पुराना डर, जो सालों से जमा हुआ है।
"कल दोपहर," हरनाम ने धीरे से कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे, "भैरव पंचायत में नहीं होगा।"
मेरा दिल एक धड़कन रुक गया।
"वो कुएँ पर होगा," हरनाम ने कहा। "और वहाँ कोई तीसरा भी होगा।"
मैंने अपनी आवाज़ सँभाली।
"कौन तीसरा?"
हरनाम ने अपनी फ़ाइल उठाई, अपने घुटनों पर रखी, और उठ खड़ा हुआ। उसने मेरी तरफ़ तब देखा जब वो मेरे बराबर आ गया — और उसकी आँखें चश्मे के पीछे बहुत थकी हुई थीं।
"वो जिसका नाम मैंने बीस साल से काग़ज़ों में नहीं लिखा," उसने कहा। "और अगर तू समझदार है, तो तू भी उसका नाम मत लिखना।"
वो चल दिया। उसकी चप्पलों की आवाज़ मिट्टी पर धीरे-धीरे दूर गई।
मैं वहीं खड़ा रह गया। मेरे हाथ में शीशी थी, सीने पर चाबी थी, और मेरे सामने एक नया सवाल खड़ा था, जो मेरे पैरों के नीचे ज़मीन की तरह खिसक रहा था।
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। तारे थे, पर बादल उन्हें खा रहे थे। मैंने अपनी जेब से वो जला काग़ज़ निकाला। वो ठंडा था। बिलकुल ठंडा। कोई नया शब्द नहीं, कोई नई लिखाई नहीं। बस आधा जला काग़ज़, और उस पर पुरानी स्याही।
मैंने उसे वापस जेब में रखा और घर की तरफ़ चल दिया, और चलते-चलते मैंने धीरे से कहा, "तीसरा कौन है?"
हवा ने जवाब नहीं दिया।
॥
हवा ने जवाब नहीं दिया। पर मेरे अंदर एक आवाज़ ज़रूर बोली — और वो आवाज़ हरनाम की थी।
वो जिसका नाम बीस साल से काग़ज़ों में नहीं लिखा।
घर पहुँचा तो आँगन में चक्की की आवाज़ बंद थी। माँ सो चुकी थी। गुड़िया की चोटी खुली हुई थी और कॉपी उसके सीने पर रखी थी। दरवाज़े की कुंडी मैंने धीरे से खोली, जूते बाहर उतारे, और चारपाई पर बैठ गया।
नींद नहीं आई।
मैंने आँखें बंद कीं तो कुएँ की आवाज़ सुनाई दी — वो आवाज़ जो अब भी मेरे कानों में थी। रामदीन की आवाज़। और उसके ऊपर हरनाम की आवाज़ — "कोई तीसरा भी होगा।"
तीसरा कौन? भैरव के सिवा तीसरा कौन हो सकता है इस गाँव में? माधव? हरनाम खुद?
या कोई ऐसा, जिसका नाम मैंने कभी सुना भी नहीं?
रात भर मैं करवटें बदलता रहा। एक बार उठकर मैंने जेब से वो जला काग़ज़ निकाला और चूल्हे की राख में रखकर देखा। ठंडा रहा। कोई लिखाई नहीं आई। जब ऐसा होता है, तो काग़ज़ भी मुँह फेर लेता है — जैसे आदमी करते हैं।
सुबह माँ ने चक्की शुरू की। चार बजे। मैं भी उनके साथ उठ गया। वो मुझे देखकर हैरान हुई, पर कुछ नहीं बोली। बस अनाज डालती रही और मैं चक्की घुमाता रहा। गुड़िया उठी तो उसने मेरी आँखें देखीं और बोली, "भैया, तुमने सोया नहीं।"
"सो गया था," मैंने कहा।
"झूठ," वो बोली और अपनी कॉपी उठा ली।
माँ ने चूल्हे पर दाल चढ़ाते हुए बिना मेरी तरफ़ देखे कहा, "कुछ हुआ है।"
"कुछ नहीं हुआ, माँ।"
"तो तेरे हाथ क्यों काँप रहे हैं?"
मैंने अपने हाथ देखे। सच में काँप रहे थे। मैंने उन्हें चक्की के हैंडल पर रख दिया और ज़ोर लगाया।
सूरज निकलते ही मैं अखाड़े की तरफ़ चला। रास्ते में सोच रहा था कि कालू काका से क्या पूछूँ और क्या नहीं। मन में एक ही बात थी — अगर भैरव आज दोपहर कुएँ पर होगा, तो उसका कमरा खाली होगा।
और अगर कमरा खाली होगा, तो मैं उस काग़ज़ को ढूँढ सकता हूँ। रघुवीर की लिखाई वाला पीला काग़ज़। जिस पर ज़हर बनाने की पर्ची थी।
अखाड़े का गेट अभी भी बंद था। दीवार पर वो नोटिस लगा था, हवा से फटा हुआ। मैं पीछे की तरफ़ गया, जहाँ नीम का पेड़ था और उसके नीचे पुरानी परत वाली मिट्टी।
कालू काका वहीं थे। घुटनों के बल बैठे, हाथ से मिट्टी पर पानी छिड़क रहे थे। उनके हाथ धीमे थे, पर हर छिड़काव में कुछ कह रहे थे।
मैं पास जाकर खड़ा हो गया। वो ऊपर नहीं देखा। सिर्फ़ बोला, "बैठ जा।"
मैं बैठ गया।
कुछ देर वो चुप रहे। फिर पानी का लोटा रखकर बोले, "रात को हरनाम मिला?"
मेरे हाथ रुक गए। "आपको कैसे पता?"
"उसकी चप्पल की आवाज़ बदल जाती है जब वो डरता है," कालू काका ने कहा। "आज सुबह वो चबूतरे से उठकर सीधा अपने घर गया। रास्ते में किसी से बात नहीं की। ये बात है। हरनाम जब किसी से बात नहीं करता, तो समझ लो वो डरा हुआ है।"
"उसने मुझसे कहा कि भैरव आज दोपहर कुएँ पर होगा। और वहाँ कोई तीसरा भी होगा।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें छोटी थीं, पर उनमें वो गहराई थी जो सत्तर साल की मिट्टी में आती है।
"हरनाम डर गया है, बेटा," उन्होंने धीरे से कहा। "और जो आदमी डरता है, वो झूठ और सच दोनों बोलता है। इसलिए उसकी बात आधी मान।"
"आधी?"
"आधी।" वो उठे और अपनी कमर सीधी करने की कोशिश करते हुए बोले। "भैरव के कुएँ पर होने की बात सच हो सकती है। पर 'तीसरा' वाली बात — वो डर से निकली है। डरे हुए आदमी को हर जगह कोई तीसरा दिखता है।"
मैंने कुछ देर सोचा। फिर बोला, "अगर भैरव कुएँ पर होगा, तो कमरा खाली होगा।"
कालू काका ने लोटा उठाया और फिर से मिट्टी पर पानी डालने लगे। जैसे मेरी बात सुनी ही न हो।
"काका —"
"सुन लिया," उन्होंने कहा। "तू कमरे में घुसना चाहता है।"
"हाँ।"
"तो घुस जा।" उन्होंने पानी डालना बंद किया और मेरी तरफ़ पूरा मुँह किया। "पर एक बात याद रख, वीर। भैरव के कमरे से कुछ भी लेकर निकलना आसान है। वो कमरा चीज़ों से भरा है — बोतलें, काग़ज़, डिब्बे। उठा ले, जेब में रख ले, कोई रोकने वाला नहीं। पर उस कमरे से लेकर ज़िंदा निकलना — वो मुश्किल है।"
मेरे पेट में एक ठंडी हवा चली।
"मतलब?"
"मतलब, वो कमरा देखता है। बंद कमरे में भी आँखें रखता है।" कालू काका ने पानी का लोटा दीवार के पास रखा और अपने हाथ पोंछे। "मैंने बीस साल में एक बात सीखी है। भैरव की हर चीज़ के नीचे एक और चीज़ रखी होती है। तू जो उठाए, उसके नीचे देख। और जो देखे, उसे मुँह पर मत लाना।"
मैं उठा। मेरे घुटनों पर मिट्टी लगी थी।
"काका," मैंने कहा, "आप मेरे साथ नहीं चलेंगे?"
वो हँसे। हल्की, सूखी हँसी।
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