Spirit of a Fighter328 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 328

7 min read November 5, 2026

"तो हमें आज रात वो बोतल लेनी है," मैंने कहा। "कल नहीं। आज रात। क्योंकि कल भैरव को पता चल जाएगा कि लुट्टन ने कुछ बोला है। और फिर वो सब कुछ छुपा देगा।"

"तू अकेला नहीं जाएगा," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में फिर वो सख़्ती लौट आई थी। "मैं साथ चलूँगी।"

"नहीं।"

"वीर सिंह।"

"नहीं, मीरा।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "अगर मैं पकड़ा गया, तो मुझे पीटेंगे, मारेंगे, पर जान नहीं लेंगे — क्योंकि मैं उनके लिए कोई नहीं हूँ। पर तू अखाड़े की बेटी है। तेरा पकड़ा जाना मतलब तेरे पापा का पूरा नाम खतरे में। और भैरव को तेरे हाथ में एक भी सबूत नहीं मिलना चाहिए। तू बाहर रहेगी। दूर। बरगद के नीचे। अगर मैं एक घंटे में न लौटूँ, तो सीधी सरपंच के घर जाएगी, और वो जो काग़ज़ मेरे पास है, उसकी कॉपी लेकर जाएगी।"

मीरा कुछ देर मुझे देखती रही। फिर उसने फ़ाइल बैग में रखी, और धीरे से कहा —

"एक घंटा नहीं। आधा घंटा। आधे घंटे में तू नहीं लौटा, तो मैं खुद अंदर आऊँगी। और तब तेरी बात नहीं मानूँगी।"

"मीरा…"

"आधा घंटा, वीर सिंह। या मैं अभी साथ चलूँगी। तेरी मर्ज़ी।"

मैंने उसकी आँखों में देखा और समझ गया कि ये बहस मैं जीत नहीं सकता। उसके चेहरे पर वो ज़िद थी जो कभी नहीं मिटती।

"ठीक है," मैंने कहा। "आधा घंटा।"

वो मुस्कुराई — पहली बार उस दिन — और वो मुस्कान बहुत छोटी थी, बस होंठों के कोने पर, पर मेरे लिए वो पूरे दिन की रोशनी जैसी थी।

"और वीर," उसने कहा, जब मैं पलटने लगा, "अंधेरे में अकेले मत जाना। टिंकू को साथ ले।"

"टिंकू? वो डर जाएगा।"

"तो डर जाने दे," उसने कहा। "डरा हुआ आदमी भी अगर साथ खड़ा हो, तो पीठ सुरक्षित रहती है। तू मुझे लगता है कि तू सब कुछ अकेले लड़ने का आदी हो गया है। और ये आदत तुझे मार डालेगी।"

मैं कुछ नहीं बोला। पर जब मैं पलटा, तो मैंने उसे वहीं खड़ा छोड़ा — बरगद के नीचे, फ़ाइल सीने से लगाए, और उसकी छाया में एक ऐसी शक्ल, जो मुझे हर जगह मिलती रहेगी।

शाम हो रही थी जब मैं टिंकू की दुकान पर पहुँचा। वो अपना टीन का शेड बंद कर रहा था, हाथ में हल्दी लगी थी और चेहरे पर वो हमेशा वाली मुस्कान थी, जो आज थोड़ी फीकी लग रही थी।

"भाई, तू ऐसे आया जैसे भूत देखकर भागा हो," उसने कहा, और टोपी उतारकर पोंछी। "बता, क्या बात है?"

मैंने सीधा कहा। टिंकू का चेहरा सुनते-सुनते बदलता गया। उसने कुछ नहीं कहा, बस अपनी दुकान का ताला लगाया, कान के पीछे की पेंसिल निकालकर जेब में रखी, और बोला —

"चल।"

"तू डरा नहीं?"

"डरा तो बहुत हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो हँसी थी जो डर के साथ आती है। "पर जब तू मेरे पास आया, तो इसका मतलब है कि तू मुझे अकेला नहीं छोड़ेगा। और मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ूँगा। बस इतना है। बाकी भगवान देखेंगे।"

रात गहरी हो चुकी थी जब हम अखाड़े की पीछे वाली दीवार के पास पहुँचे। दीवार लाल मिट्टी की थी, ऊँची, और ऊपर काँटेदार झाड़ियाँ। मैंने कालू काका का बताया रास्ता याद किया — नीम के पेड़ के पीछे से, जहाँ दीवार में एक पत्थर ढीला था।

पत्थर हटाया। अंदर एक छोटा-सा छेद था। मैं उसमें से सरका, और टिंकू मेरे पीछे आया। उसकी साँस मेरे कान के पास तेज़ चल रही थी।

अखाड़े के अंदर अंधेरा था। सिर्फ़ भैरव के कमरे की खिड़की से हल्की पीली रोशनी आ रही थी।

"वो जाग रहा है," टिंकू ने फुसफुसाया।

"नहीं," मैंने कहा, और मैंने अपनी नाक उठाई। हवा में धुआँ था, तेल की गंध थी। "वो बाहर गया है। लालटेन जलाकर छोड़ गया है। पर वो आस-पास है। उसकी गंध… मुझे आ रही है। वो कुएँ के पास है।"

"तो फिर जल्दी कर।"

हम कमरे की तरफ़ बढ़े। दरवाज़ा खुला था। अंदर घुसते ही वो गंध और तेज़ हो गई — तेल, पसीना, और वो कड़वी मिट्टी जो मुझे तहखाने से याद थी। कोने में मटका रखा था, बड़ा, पुराना, ऊपर से ढका हुआ।

मैंने ढक्कन हटाया। अंदर अंधेरा था। मैंने हाथ डाला और मेरी उँगलियाँ काँच से टकराईं। एक बोतल। दो। तीन।

"भाई, जल्दी," टिंकू ने दबी आवाज़ में कहा, और वो दरवाज़े के पास खड़ा था, बाहर देख रहा था।

मैंने एक बोतल निकाली। हरी, ऊपर से मोम की सील। बिल्कुल वैसी जैसी मीरा ने कही थी। मैंने उसे धोती में लपेटा और कमर से बाँध लिया।

"एक और," मैंने कहा। "दो अलग बोतलें। अगर एक खो जाए, तो दूसरी रहे।"

मैंने दूसरी निकाली — थोड़ी छोटी, पर वही सील। बाँध ली। और तभी मेरी नाक में एक गंध आई जो मुझे जमा देने वाली थी।

जली हुई लकड़ी। और उसके साथ — वो काग़ज़ की गंध, जो सिर्फ़ पुराने काग़ज़ की होती है।

"टिंकू," मैंने धीरे कहा, "मटके के नीचे कुछ है।"

मैंने मटके को सरकाया। उसके नीचे लकड़ी का एक पतला तख़्ता था। तख़्ता उठाया, और नीचे एक छोटा-सा गड्ढा था। उसमें राख थी — ताज़ी राख, वो अधजले काग़ज़ के टुकड़े, जिनके कोने अभी काले पड़ रहे थे।

मैंने एक टुकड़ा उठाया। उस पर आधा शब्द बचा था — "…वीर का बेटा…"

मेरा दिल रुक गया।

"भाई, ये क्या है?" टिंकू ने पूछा, और उसकी आवाज़ जैसे दूर से आ रही थी।

"ये…" मैंने उसे पलटा। दूसरी तरफ़ कुछ और लिखा था, आधा जला हुआ — "…वो जानता है। उसे हटाओ।"

मेरे हाथ काँपे। ये काग़ज़ मेरे बारे में था। भैरव मेरे बारे में लिख रहा था। मैं उसके लिए सिर्फ़ एक मज़दूर नहीं था — मैं उसकी सूची में एक नाम था।

"चल," टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा। "अब नहीं। बाद में देखेंगे। भैरव वापस आ रहा है, मुझे उसके कदमों की आवाज़ आ रही है।"

मैंने राख का एक टुकड़ा जेब में रखा और पलटा। हम दरवाज़े से बाहर निकले, और मैंने सुना — दूर से कुएँ की तरफ़ से कदमों की आवाज़। भारी कदम। भैरव।

हम दीवार के छेद की तरफ़ भागे। टिंकू पहले सरका, फिर मैं। जब मैं आधा बाहर था, तभी पीछे से आवाज़ आई —

"कौन है वहाँ?"

भैरव की आवाज़। मैंने और ज़ोर लगाया, पर मेरी धोती दीवार के पत्थर में फँस गई। मैंने झटका दिया। कपड़ा फटा। मैं बाहर गिरा, घुटने के बल, और टिंकू ने मुझे खींचा।

"भाग!"

हम भागे। घुटने में दर्द था, धोती फटी थी, पर मेरी कमर पर बँधी दोनों बोतलें सलामत थीं। मैं भागते-भागते नीम के पेड़ के पीछे पहुँचा, और वहीं रुककर साँस लेने लगा।

"टिंकू," मैंने हाँफते हुए कहा, "तू ठीक है?"

"हाँ, पर भाई…" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "तेरी धोती। वो फटी है। और वो फटा हुआ टुकड़ा अंदर रह गया। भैरव उसे देख लेगा।"

मेरा खून जम गया।

"वो मेरी धोती का टुकड़ा पहचान लेगा," मैंने कहा। "और सबको पता है कि मेरे पास यही धोती है।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था।

"तो फिर अब क्या?"

मैंने आसमान की तरफ़ देखा। चाँद बादलों में छुप रहा था।

"अब बात सिर्फ़ बोतल की नहीं है," मैंने धीरे कहा। "अब वो जान जाएगा कि उसके कमरे में कोई आया था। और वो ये भी जान जाएगा कि कौन आया था।"

मैंने जेब से राख का वो आधा जला टुकड़ा निकाला, जिस पर लिखा था — "…वो जानता है। उसे हटाओ।"

"टिंकू," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी, "भैरव मुझे हटाने की सोच रहा है। ये लिखा हुआ है। मतलब वो मेरे बारे में कुछ जानता है, और वो कुछ ऐसा है जो मुझे खुद भी नहीं पता।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।

"क्या?"

मैंने काग़ज़ का टुकड़ा उसकी तरफ़ बढ़ाया।

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