Spirit of a Fighter – Chapter 314
मैंने दरवाज़े के बाहर देखा। अंधेरा। बस एक जुगनू दूर उड़ रहा था, और फिर बुझ गया।
मैंने गुड़िया को हाथ में पकड़ा। उसकी आँखें मेरी तरफ़ देख रही थीं।
"तू अपना काम कर।"
पर मुझे ये भी समझ नहीं आ रहा था कि मेरा काम क्या है — गोलू को बचाना, या भैरव से लड़ना, या माधव से?
मैं वहीं खड़ा रहा। हाथ में एक बच्ची की मिट्टी की गुड़िया, और दिल में एक नया डर।
तभी मेरी जेब में पड़ी टूटी घड़ी की सुई अचानक हिली। मैंने उसे जेब से निकाला। वो घड़ी जो बीस साल से बंद थी। उसकी सेकंड की सुई एक बार हिली। फिर रुक गई।
मैंने घड़ी को कान से लगाया। अंदर कुछ टिक-टिक कर रहा था। धीरे-धीरे। जैसे कोई बहुत दूर से आकर जगा हो।
॥
घड़ी की टिक-टिक रात भर मेरे कान में बजती रही। मैंने उसे तकिये के नीचे रखा, पर आवाज़ वहीं से आती रही — जैसे कोई दूर से दरवाज़ा खटखटा रहा हो और फिर भूल जाए कि खटखटाना था।
सुबह मैं उठा तो घड़ी चुप थी। सुई वहीं अटकी हुई, जहाँ रात में रुकी थी।
माँ चक्की पर बैठी थीं। मैंने पास जाकर देखा — आटा उनके हाथ से गिर रहा था, पर आँखें दरवाज़े पर थीं।
"माँ।"
"हूँ।"
"टिंकू आज शहर जा रहा है।"
चक्की रुकी। माँ ने हाथ पोंछा और मेरी तरफ़ देखा।
"किसलिए?"
"गोलू के लिए।"
वो कुछ नहीं बोलीं। उठीं, अंदर गईं, और एक छोटा-सा डिब्बा लेकर आईं। उसमें सोंठ और काली मिर्च की पुड़िया थी — मीरा की दी हुई।
"ये टिंकू की जेब में रख देना," उन्होंने कहा। "और ये भी कह देना — अगर बच्ची मिले, तो पहले उसकी जीभ पर थोड़ी पुड़िया रख देना, फिर पानी। ज़हर का निशान शरीर में हो तो ये जलन करेगी, और अगर ज़हर न हो तो मीठी लगेगी।"
मैंने डिब्बा हाथ में लिया। माँ ने मेरा हाथ पकड़कर रोका।
"वीर।"
"हाँ।"
"टिंकू डरपोक है। उसे अकेले मत भेज।"
"माँ, मैं जाऊँ तो अखाड़े में कौन—"
"मैंने ये नहीं कहा कि तू जा।" उन्होंने मेरी हथेली पर हल्की थपकी दी। "मैंने ये कहा कि उसे अकेले मत भेज। बुढ़िया बुधिया को साथ भेज दे। वो दो गाँव की सड़क जानती है, और शहर के बाज़ार में उसकी एक बहन रहती है।"
मेरे गले में कुछ अटक गया। मैंने सिर हिलाया।
टिंकू दुकान पर मिला। वो अपनी टीन की आलमारी में मिठाई की डिब्बियाँ जमा रहा था, पर हाथ काँप रहे थे — एक डिब्बा दो बार गिरा।
"भाई, मैंने सोचा था सुबह जल्दी निकलूँगा," उसने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे। "पर ये डिब्बे… इन्हें ठीक से रख दूँ, वरना लौटकर आऊँ तो सब बिखरा मिलेगा।"
"टिंकू।"
"हाँ।"
"ये ले।" मैंने डिब्बा उसकी जेब में रखा। "मीरा की पुड़िया है। और ये पर्ची — इसमें गोलू के बारे में जो भी पता है, सब लिखा है। हरनाम का नाम, पीली दीवार वाला घर, दो साल।"
उसने पर्ची को सीने की जेब में रखा, फिर अपनी टोपी उतारी और दोबारा पहनी — जैसे कोई फ़ौजी अपना हेलमेट ठीक करता हो।
"भाई," उसने कहा, "मैं सच में डरा हुआ हूँ।"
"मुझे पता है।"
"पर मैं जाऊँगा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। "क्योंकि अगर मैं नहीं गया, तो कल को मेरी दुकान के सामने कोई बच्ची खड़ी होगी और मैं उससे आँख नहीं मिला पाऊँगा।"
मैंने उसका कंधा पकड़ा। कुछ कहने को जी चाहा, पर मुँह से सिर्फ़ इतना निकला — "भूख लगे तो रास्ते में मत रुकना। सीधे पहुँचना।"
वो हँसा। "भाई, तू मेरी माँ बन गया है।"
बुधिया दुकान के बाहर खड़ी थी, सिर पर पुरानी चुन्नी, हाथ में लाठी। उसने टिंकू को देखा और बस इतना कहा — "चल, देर मत कर।"
मैं उन्हें गाँव की सड़क तक छोड़ने गया। टिंकू ने जाते-जाते हाथ हिलाया, और फिर दोनों नीम के पेड़ के मोड़ पर से गायब हो गए।
मैं वहीं खड़ा रहा। सुबह की हवा में गोबर और धुएँ की गंध थी। दूर किसी के घर से चूल्हे की आवाज़ आ रही थी।
लौटते वक़्त सुक्खी बुआ मिलीं। वो अपने दरवाज़े पर पान का बीड़ा दबाए खड़ी थीं, जैसे सुबह से वही इंतज़ार कर रही हों।
"अरे वीर!" उन्होंने आवाज़ दी, जैसे कोई ढोल बजा दिया हो। "इतनी सुबह-सुबह कहाँ से आ रहा है?"
"टिंकू को छोड़ने गया था, बुआ।"
"टिंकू को?" उनकी आँखें चमकीं। "कहाँ गया टिंकू?"
"मौसी के घर। मिठाई का नया नुस्खा सीखने।"
"अच्छा?" उन्होंने बीड़ा एक तरफ़ किया। "अरे मैंने तो सुना है कि शहर में भैरव सिंह का भी एक घर है। बड़ा-सा। पीली दीवार। और वहाँ…" उन्होंने आवाज़ धीमी की, जैसे कोई बहुत बड़ा राज़ बता रही हों, "बच्चे रखे जाते हैं। छोटे-छोटे बच्चे। किसी के पास से लाए हुए।"
मेरे पैर जैसे ज़मीन में गड़ गए।
"किसने कहा, बुआ?"
"अरे, किसने कहा क्या — मैंने तो सुना है।" उन्होंने कंधे उचकाए। "पर सुन, वीर — जो भी हो, तू अपना ध्यान अखाड़े पर रख। भैरव सिंह आज कुछ करेगा। मैंने उसके आदमियों को सुबह-सुबह अखाड़े की तरफ़ जाते देखा है।"
वो अंदर चली गईं।
मैं सीधे अखाड़े पहुँचा। गेट खुला था। अंदर मिट्टी गीली थी, और मैदान के बीच पहलवान खड़े थे — दस-बारह। उनके चेहरे पर वो डर था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा।
भैरव सिंह मंच पर बैठा था। उसके सामने एक गिलास रखा था, और वो उसे धीरे-धीरे घुमा रहा था।
"आ गया," उसने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे। "बैठ जा।"
मैं नहीं बैठा।
"आज तेरी परीक्षा है, वीर सिंह।" उसने गिलास मेज़ पर रखा। आवाज़ वही मीठी, पर आँखें वही कुआँ। "अखाड़े के सब पहलवानों के सामने तू लुट्टन से कुश्ती लड़ेगा।"
मैंने लुट्टन की तरफ़ देखा। वो दीवार के पास खड़ा था। उसके हाथ पीछे बँधे थे — जैसे किसी ने उसे यहाँ खींचकर लाकर खड़ा कर दिया हो। उसकी आँखों में वो डर था जो किसी जानवर की आँखों में कसाई देखकर होता है।
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्यों क्या?"
"क्यों लड़ूँ उससे? वो तो ज़हर पीकर बीमार है। मैंने खुद उसकी साँस में कड़वाहट सूँघी थी। तू जानता है।"
भैरव हँसा। वो हँसी ऐसी थी जैसे कोई चाकू घिस रहा हो।
"इसीलिए तो," उसने कहा। "ताकि सब देखें कि ज़हर पीने वाला भी तेरे जैसे बाहर वाले के सामने खड़ा नहीं रह सकता। या फिर…" उसने गिलास उठाया, "ये पी ले, और मैदान में उतर जा। जैसे सब पीते हैं।"
मैंने गिलास को देखा। पानी साफ़ था, पर मेरी नाक में उसकी गंध आ रही थी — वही कड़वी, वही पुरानी।
"नहीं।"
"तो लड़।"
"लड़ूँगा," मैंने कहा। "पर उससे नहीं।" मैंने लुट्टन की तरफ़ इशारा किया। "उससे तो मैं तभी लड़ूँगा जब वो खुद कहे कि लड़ना है।"
भैरव की आँखें सिकुड़ीं। उसने लुट्टन की तरफ़ देखा।
"बोल," उसने कहा। सिर्फ़ एक शब्द। पर वो शब्द ऐसा था जैसे किसी कुत्ते को पट्टे से खींचा जा रहा हो।
लुट्टन ने होंठ हिलाए। कुछ नहीं निकला।
"बोल!" भैरव की आवाज़ ऊँची हुई। "या फिर तेरी बच्ची का—"
"लड़ूँगा!" लुट्टन चिल्लाया। उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "मैं लड़ूँगा सर। मैं लड़ूँगा।"
मैदान में सन्नाटा छा गया।
मैं मिट्टी में उतरा। मैंने अपनी धोती ऊपर की। कालू काका दीवार के पास खड़े थे, हाथ में पानी का लोटा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और बस इतना कहा — "मिट्टी को मत भूल।"
लुट्टन उतरा। उसके कदम भारी थे। वो मेरे सामने आकर खड़ा हुआ, और उसने बहुत धीरे से, सिर्फ़ मेरे सुनने के लिए कहा — "मार दे जल्दी। मुझे हारना है।"
मेरा दिल धक से रह गया।
तभी भैरव ने ताली बजाई।
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