Spirit of a Fighter – Chapter 310
"तेरे हाथ काँप रहे थे।" मैंने कहा। धीरे से। बिना सोचे।
वो रुकी। उसने अपने हाथ देखे, जैसे पहली बार देख रही हो।
"मुझे पता है।" उसने कहा। और फिर उसने वो किया जो मैंने उससे उम्मीद नहीं की थी। उसने अपना हाथ बढ़ाया और मेरी कलाई पकड़ ली। "तुम्हारे भी काँप रहे हैं।"
नीम के पत्ते ऊपर हवा में हिल रहे थे। दूर कहीं कोई मुर्गा बोल रहा था। मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा। उसने भी नहीं छोड़ा।
फिर उसने हाथ खींच लिया, जैसे किसी ने उसे याद दिला दिया कि वक़्त नहीं है। "चलो। पापा इंतज़ार कर रहे होंगे।"
हम चले। पर मैंने उस पल को सीने में रख लिया। कोई वादा नहीं, कोई बात नहीं। बस एक हाथ। जो काँप रहा था, और जिसने मेरा हाथ पकड़ा।
रणवीर सिंह के घर पहुँचे तो सूरज निकल आया था। उनका घर अखाड़े से दूर था, पीपल के पेड़ के पीछे, एक पुरानी हवेली जैसा, जिसकी दीवारों पर मिट्टी की परत जमी थी। दरवाज़े पर एक बूढ़ा चौकीदार बैठा था, जो हमें देखते ही अंदर गया।
रणवीर सिंह बरामदे में व्हीलचेयर पर बैठे थे। सामने चाय की ट्रे रखी थी, ठंडी हो चुकी थी। उन्होंने हमें देखा। पहले मीरा को, फिर मुझे, फिर लुट्टन को।
लुट्टन उन्हें देखते ही रुक गया। उसका शरीर काँपने लगा। "सर…" उसने धीरे कहा। "मैं…"
"अंदर आ।" रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था। सिर्फ़ एक थकान।
लुट्टन ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया। वो अंदर गया, धीरे-धीरे, जैसे हर कदम में उसका कोई बोझ बढ़ रहा हो।
मीरा अपने पिता के पास गई। उसने उनका हाथ पकड़ा। "पापा, उसकी बेटी है। छह साल की। भैरव ने उसे शहर में बंधक रखा है।"
रणवीर सिंह ने एक पल के लिए आँखें बंद कीं। फिर उन्होंने कहा, "पता है।"
मैं सन्न रह गया।
"क्या?" मीरा ने उनका हाथ छोड़ दिया। "तुम्हें पता था?"
"मुझे शक था।" उन्होंने धीरे से कहा। "दो साल पहले लुट्टन ने एक बार मुझसे माफ़ी माँगी थी। बिना कहे। रोते हुए। मैंने पूछा तो बोला, 'सर, मेरी बच्ची…' फिर चुप हो गया। उसके बाद मैंने खुद पता लगवाया।" उन्होंने अपनी व्हीलचेयर की तरफ़ देखा। "पता लगा कि शहर में एक घर है, जहाँ एक बच्ची रहती है। उसके चारों तरफ़ भैरव के आदमी हैं। मैं कुछ नहीं कर सका।"
"तुमने मुझे क्यों नहीं बताया?" मीरा की आवाज़ ऊँची हुई।
"क्योंकि तू तब छोटी थी। और मैं…" उन्होंने अपने पैरों की तरफ़ देखा, जो सून्न थे। "मैं इस कुर्सी पर था।"
मीरा के होंठ काँपे। वो अपने पिता के पैरों के पास बैठ गई। उसने अपना सिर उनके घुटनों पर रख दिया। रणवीर सिंह ने अपना हाथ उसके सिर पर रखा।
मैं वहीं खड़ा रहा। लुट्टन भी। टिंकू दरवाज़े पर। कोई कुछ नहीं बोला।
फिर रणवीर सिंह ने आँखें उठाईं। मेरी तरफ़ देखा। "वीर सिंह, तू कल अखाड़े में लड़ेगा। भैरव से।"
"हाँ।"
"उसने तेरे सामने क्या रखा है?"
"मीरा का हाथ या उसकी लाश।"
रणवीर सिंह ने एक लंबी साँस ली। "उसने मुझे भी यही रखा था। बीस साल पहले।" उनकी आवाज़ धीमी हुई। "और मैंने अपना हाथ चुन लिया था। इसलिए आज इस कुर्सी पर हूँ।"
वो रुके। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, सीधे आँखों में। "तू मूर्ख है अगर उसकी बातों में आ गया। भैरव को न मीरा चाहिए, न तू। उसे बस एक चीज़ चाहिए — तेरा डर। अगर तू डरा, तो वो जीत गया। अगर तू नहीं डरा, तो उसके पास कुछ नहीं बचेगा।"
"पर लुट्टन की बच्ची…" मैंने कहा।
"उसके लिए लुट्टन को ज़िंदा रहना होगा।" रणवीर सिंह ने कहा। "और वो हमारे साथ है। बच्ची को मैं अपने आदमी भेजकर निकलवाऊँगा।"
"पर भैरव के आदमी…"
"मेरे भी कुछ आदमी हैं, वीर सिंह।" उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में फिर से वो गरज लौट आई थी, जो मैंने पहली बार सुनी थी जब वो अखाड़े में आए थे। "बीस साल मैं इस कुर्सी पर बैठा रहा। पर मैंने अपने आदमी नहीं खोए। वो मेरे पास हैं। बस इंतज़ार कर रहे थे।"
मीरा ने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था, पर वो मुस्कुरा रही थी। "पापा…"
"हाँ, बेटा।" रणवीर सिंह ने उसका सिर सहलाया। "अब जाकर लुट्टन को अंदर बिठा। उसका इलाज शुरू कर। कल बड़ा दिन है।" उन्होंने फिर मेरी तरफ़ देखा। "और तू, वीर सिंह, मेरे साथ आ। तुझे एक चीज़ दिखानी है।"
वो अपनी व्हीलचेयर के पहियों को घुमाकर मुड़े। मैं पीछे-पीछे गया। हवेली के पिछले हिस्से में एक छोटा कमरा था, जिसका दरवाज़ा लोहे का था। रणवीर सिंह ने अपनी जेब से चाबी निकाली, काँपते हाथों से ताला खोला।
अंदर अंधेरा था। दीवार पर एक लालटेन टंगी थी। वो माचिस से जलाई। रोशनी फैली तो मैंने देखा — कमरे में पुरानी तस्वीरें टंगी थीं। पहलवानों की। बीस-तीस, शायद ज़्यादा। हर तस्वीर के नीचे एक नाम लिखा था। और कुछ नामों के आगे एक लाल निशान।
"ये सब भैरव के हाथ से गए हैं।" रणवीर सिंह ने कहा। "मैंने हर एक की तस्वीर रखी है।" उन्होंने एक तस्वीर की तरफ़ इशारा किया। "ये जगदीश था। तेरा पिता। जिसने तुझे पाला।" उनकी आवाज़ भारी हो गई। "और ये…" उन्होंने अगली तस्वीर की तरफ़ इशारा किया। "ये रघुवीर। तेरा असली पिता। ये मेरा दोस्त था।"
मैंने तस्वीर देखी। एक नौजवान, चौड़े कंधे, हँसता हुआ, मिट्टी में खड़ा। मेरी उम्र का रहा होगा। उसकी आँखें मेरी आँखों जैसी थीं। मेरे हाथ काँपने लगे।
"इन दोनों के बीच एक तीसरा भी था।" रणवीर सिंह ने कहा। "मैं। हम तीन दोस्त थे। तीनों पहलवान। तीनों ने कसम खाई थी कि हम अखाड़े को एक नई ऊँचाई पर ले जाएँगे।" उन्होंने लंबी साँस ली। "फिर भैरव आया।"
वो रुके। उनकी आँखें तस्वीरों पर टिकी थीं। "वो हमारे पास आया। भूखा, दुबला, आँखों में आग। कहा, 'मुझे पहलवान बनना है।' हमने उसे अखाड़े में जगह दी। वो रघुवीर के साथ रहता था। रघुवीर ने उसे अपना भाई माना।"
"भाई?" मैंने कहा। "पर तहखाने में तस्वीर मिली थी। उसके पीछे लिखा था — भैरव उसका भाई है।"
रणवीर सिंह ने सिर हिलाया। "हाँ। पर भैरव ने उसे भाई नहीं माना। उसने उसे सीढ़ी माना।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "रघुवीर ने उसे ज़हर बनाना सिखाया। सिखाया, नहीं — बताया। क्योंकि रघुवीर जड़ी-बूटियों का जानकार था। उसने भैरव को ताकत का पानी बनाना सिखाया था — असली ताकत का। जो मेहनत से बढ़े, बीमारी से नहीं।"
"तो भैरव ने उसे बदल दिया।"
"हाँ।" रणवीर सिंह की आवाज़ कड़वी हो गई। "भैरव ने देखा कि अगर वो पानी में ज़हर मिला दे, तो पहलवान जल्दी ताकतवर दिखेगा। जल्दी जीतेगा। और फिर जल्दी मरेगा। और उसके पैसे भैरव के पास आएँगे।" उन्होंने तस्वीरों की तरफ़ इशारा किया। "ये सब उसी पानी का हिसाब है।"
मैंने उन तस्वीरों को देखा। इतने चेहरे। इतनी उम्मीदें। सब बुझ गईं।
"मैंने क्यों नहीं रोका?" रणवीर सिंह ने अचानक कहा। उनकी आवाज़ टूट गई। "मैंने खुद उस पानी को पिया। मैंने सोचा, बस एक बार। एक मुकाबले के लिए। और फिर…" उन्होंने अपने पैरों की तरफ़ देखा। "फिर ये कुर्सी आई।"
वो चुप हो गए। कमरे में सिर्फ़ लालटेन की लौ की आवाज़ थी।
मैंने धीरे से कहा, "आपने मुझे ये सब क्यों दिखाया?"
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