Spirit of a Fighter277 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 277

7 min read November 5, 2026

"मैं नहीं बता सकता। मैं बता दूँ, तो तू वहाँ जाने से डर जाएगा। और अगर तू डर गया, तो कल वो जीत जाएगा।" उन्होंने चिट्ठी की तरफ़ इशारा किया। "ये उन्होंने मुझे दी थी। कहा था — 'अगर मैं वापस न आऊँ, तो ये मेरे बेटे को देना। पर तभी देना जब वो खुद से तहखाने तक पहुँच जाए।' बीस साल से मैं ये चिट्ठी अपने सीने पर बाँधकर रखता था। आज सुबह मुझे लगा — अब देने का वक़्त आ गया।"

"आपको कैसे पता कि मैं आज तहखाने तक पहुँचा?"

"वो गंध," काका ने धीरे से कहा। "जब तक तू मिट्टी से नहीं जुड़ता, वो गंध किसी को नहीं आती। आज मुझे यहाँ तक आती रही। मुझे पता था कि तूने कुआँ छुआ है।"

माँ ने काका का हाथ छोड़ा और पीछे हट गईं।

"कुआँ?" उनकी आवाज़ काँपी। "वीर, तूने कुआँ छुआ?"

जवाब मैंने नहीं दिया। देना चाहता भी तो क्या देता। रामदीन काका ने मेरी जगह पलटकर माँ से कहा, "बहू, जो होना था वो हो गया। अब सिर्फ़ ये देखना है कि वो कुएँ तक पहुँचा, या कुएँ ने उसे पहुँचाया। फ़र्क़ इसमें है — और यही फ़र्क़ कल की लड़ाई में तय होगा।"

उन्होंने मेरे हाथ से चिट्ठी दोनों हाथों में ले ली, और जैसे कोई पुरोहित कोई बहुत पुराना काम कर रहा हो, उसे मेरी मुट्ठी में दबा दिया।

"इसे अभी मत खोलना," वो बोले। "जब अखाड़े में घुसे, तब खोलना। भैरव देख रहा हो, तो भी मत खोलना — अंदर जाकर, चारदीवारी के भीतर, मिट्टी पर खड़े होकर खोलना। वो चिट्ठी मिट्टी पढ़ती है, दीवार नहीं।"

"काका, आप अंदर चलिए," माँ ने फिर कहा, इस बार ज़्यादा ज़ोर से। "भैरव के आदमी —"

"भैरव के आदमी मुझे ढूँढ रहे हैं, बहू," काका ने धीरे से कहा। "और जब तक मैं ऊपर नहीं आया था, वो मुझे ढूँढ भी नहीं सकते थे। अब जब ऊपर आ गया हूँ, तो मुझे अंदर नहीं, बाहर रहना है। अंदर रहूँगा तो तुम तीनों को ख़तरे में डाल दूँगा।"

वो पलटे।

"एक बात और," उन्होंने कहा, बिना पलटे। "जब तू अखाड़े में जाए, तो अपनी माँ को साथ ले जाना। भैरव उसे अकेली नहीं छोड़ेगा — वो जानता है कि तेरी ताकत तेरे पापा से नहीं, उससे आती है।"

और फिर वो गली में उतरे, और उनकी लाठी की आवाज़ धीरे-धीरे मिट गई।

मैंने दरवाज़ा बंद किया। माँ कुछ देर वहीं खड़ी रहीं, फिर धीरे से बोलीं, "वीर, तूने मुझे नहीं बताया।"

"माँ, मैं—"

"मुझे गुस्सा नहीं है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट रही थी। "मुझे डर है। तेरे पापा ने भी ऐसे ही नहीं बताया था। एक दिन वो बस चले गए थे, और लौटे नहीं। और मैं तेरे सामने खड़ी रह गई — तुझे बताने के लिए कुछ नहीं था।"

मैंने उनका हाथ पकड़ा। मेरे हाथ में चिट्ठी थी, और उनका हाथ उस पर था, और मुझे लगा कि उस चिट्ठी में मेरे पापा का पसीना नहीं, उनकी आवाज़ है — जो बीस साल से चुप थी, और अब बोलने को बेचैन थी।

"माँ, अब मैं जा रहा हूँ।"

"कहाँ?" उनकी आवाज़ में पहली बार वो डर लौटा जो उन्होंने काका के सामने छिपाया था।

"अखाड़े में। आज नहीं, कल जाना है। पर कल जाने से पहले मुझे वो जगह देखनी है जहाँ मेरे पापा ने आखिरी बार पसीना बहाया था। और वो जगह मुझे अभी चाहिए — रात में। दिन में भैरव के आदमी मुझे रोक देंगे।"

माँ ने मेरा हाथ छोड़ दिया। उन्होंने दीवार पर टँगी घड़ी की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।

"तो जा," उन्होंने कहा।

॥

"तो जा," माँ ने कहा था, और उनका हाथ मेरे कंधे पर था, और उनकी आँखों में वो पानी था जो वो कभी गिरने नहीं देतीं।

मैं पलटा।

और दरवाज़े के बाहर, अँधेरे में, लालटेन लेकर कोई खड़ा था।

पहले मुझे लगा भैरव का आदमी है। मेरा हाथ अपने आप मुट्ठी में बंध गया, पैर पीछे हटे। फिर लालटेन थोड़ी ऊपर उठी और रोशनी में वो सफ़ेद दाढ़ी दिखी, और वो कुबड़ा ढाँचा — जो मैंने सुबह कुएँ पर देखा था।

कालू काका।

पर ये वही कालू काका नहीं थे जो सुबह मिट्टी सींचते वक़्त मुस्कुरा रहे थे। उनकी दाढ़ी में हवा भरी हुई थी जैसे वो बहुत तेज़ भागकर आए हों। लालटेन उनके हाथ में काँप रही थी, और उनकी आँखों में वो डर था जो इंसान के चेहरे पर तभी आता है जब उसने कुछ ऐसा देखा हो जो इंसान को देखना नहीं चाहिए।

"काका?" मैंने कहा। "आप यहाँ?"

उन्होंने जवाब नहीं दिया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरे पीछे माँ की तरफ़, फिर फिर मेरी तरफ़। और फिर उन्होंने लालटेन नीचे रखी और मेरा हाथ पकड़ लिया।

"काका, क्या—"

"चुप।"

उनका हाथ ठंडा था। सुबह जब उन्होंने मुझे मिट्टी दी थी, तब भी उनका हाथ ठंडा था, पर तब वो मिट्टी की ठंडक थी। अब ये ठंडक कहीं और से आ रही थी — अंदर से। जैसे उनके अंदर का खून रुक गया हो।

वो मुझे दरवाज़े से बाहर खींच लाए, गली में। माँ दरवाज़े पर खड़ी रह गईं, कुछ बोलीं नहीं, पर मैंने सुना उनकी साँस रुकी हुई है — जैसे वो जानती हों कि अब जो होगा, वो अच्छा नहीं होगा।

"तू अंदर गया था?" काका ने फुसफुसाया। उनकी आवाज़ में वो धीमापन नहीं था जो हमेशा रहता था, जैसे कोई पुरानी किताब पढ़ रहा हो। अब उनकी आवाज़ में सिर्फ़ डर था, सूखा और कर्कश। "कुएँ के अंदर? सीढ़ियों तक?"

"मैं—"

"बता!"

"हाँ," मैंने कहा। "मैं नीचे उतरा था। रामदीन काका से बात की।"

कालू काका ने मेरा हाथ छोड़ दिया। वो पीछे हटे, दीवार से टिक गए, और उनकी आँखें बंद हो गईं। उनके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी। जैसे वो कोई पुरानी दुआ पढ़ रहे हों, या कोई पुरानी गाली।

"काका, आप ठीक—"

"तूने उसका नाम लिया?" उन्होंने आँखें खोलीं। "रामदीन का नाम? उस कुएँ के अंदर?"

"हाँ, उन्होंने खुद अपना नाम—"

"तो अब वो जानता है," काका ने कहा, और उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने उनके पेट में लात मार दी हो। "वो जानता है कि रामदीन ज़िंदा है। और वो अब उसे ढूँढेगा। और जो उसे ढूँढेगा, वो तेरे साथ भी—"

"काका, रुकिए।" मैंने उनका कंधा पकड़ा। मेरे हाथ भी अब काँप रहे थे, पर मैंने अपनी आवाज़ नीची रखी ताकि माँ न सुनें। "मुझे समझाइए। आप क्या कह रहे हैं? भैरव क्या करेगा? वो तो पहले से ही जानता है कि मैं उसके ख़िलाफ़ हूँ—"

"वो कुआँ जानता है," काका ने कहा। "पर वो ये नहीं जानता था कि उस कुएँ में कोई अभी भी ज़िंदा है। बीस साल से वो समझता रहा कि रामदीन उस पानी में मर गया। अब उसे पता चल गया कि वो ज़िंदा है — और जो आदमी उसके ज़हर का राज़ जानता है, वो ज़िंदा नहीं रह सकता।"

मेरे पेट में एक ठंडी गोली सी घूम गई।

"तो मैंने क्या कर दिया, काका?" मैंने कहा। "मैंने उसे मार डाला?"

काका ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो डर धीरे-धीरे गुस्से में बदलने लगा — अपने आप पर गुस्सा, मुझ पर नहीं।

"नहीं, बेटा," उन्होंने धीरे से कहा। "तूने उसे मारा नहीं। तूने उसे वक़्त दिया। पर वो वक़्त कम है, बहुत कम।" उन्होंने मेरा हाथ फिर पकड़ा, इस बार ज़ोर से। "अब सुन। मैं जो कहूँ, वो कर। तू इस कुएँ को भूल जा। समझा? अभी, इस वक़्त, तू इस कुएँ को भूल जा। जब वक़्त आएगा, मैं खुद तुझे ले जाऊँगा। तब तक तू उस कुएँ के पास भी मत फटकना।"

"भूल जाऊँ?" मेरी आवाज़ ऊपर उठी, और मैंने खुद को रोका नहीं। "काका, तीन दिन बाद मुझे भैरव से लड़ना है! और वो रात में इसी कुएँ के रास्ते तहखाने की मिट्टी उठा रहा है — आपने खुद बताया था! अगर वो मिट्टी उसके हाथ लग गई, तो सब ख़त्म। मैं कैसे भूल जाऊँ?"

काका का चेहरा पीला पड़ गया। गली की लालटेन की रोशनी में भी दिख रहा था — जैसे किसी ने उनके चेहरे से खून खींच लिया हो।

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