Spirit of a Fighter275 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 275

7 min read November 5, 2026

"तेरी नाक," उसने कहा। "तेरे पापा ने मुझे बताया था। कहा था — मेरे बेटे की नाक ऐसी है जैसी किसी जानवर की होती है। वो मिट्टी सूँघकर बता सकता है कि किसने कल कितनी मेहनत की। और वो उस पानी को भी सूँघकर पहचान लेगा जो भैरव बनाता है।"

मेरा गला भर आया। मेरे पापा ने — जिन्हें मैंने कभी नहीं देखा, जो मर चुके थे जब मैं छोटा था — उन्होंने मेरे बारे में सोचा था। उन्होंने मुझे पहचाना था। जब मैं किसी को याद नहीं था, तब वो मुझे याद था।

"उन्होंने कहा था," रामदीन ने कहा, "कि अगर मैं मरूँ, तो मेरा बेटा ये ज़हर पानी में नहीं, मिट्टी में डालेगा।"

"माँ ने भी यही बताया," मैंने कहा। "पीले काग़ज़ में लिखा था।"

"तो तू जानता है," रामदीन ने कहा। "तो फिर तू यहाँ क्यों आया? अगर तुझे सब पता है, तो तू नीचे क्यों उतरा?"

मैं चुप हो गया।

और उस अंधेरे में, उन सीढ़ियों पर, मैंने पहली बार खुद से सच बोला।

"क्योंकि मैं डरा हुआ हूँ," मैंने कहा। "क्योंकि भैरव ने कहा कि वो मेरी माँ को या मीरा को मार देगा, और मैं दोनों को एक साथ नहीं बचा सकता। क्योंकि मेरे हाथ काँपते हैं जब मैं कुश्ती के लिए खड़ा होता हूँ, और मैं किसी को नहीं बताता।"

नीचे से कोई आवाज़ नहीं आई।

फिर उसने कहा, बहुत धीरे —

"अब तू तैयार है।"

"क्या मतलब?"

"जो आदमी अपना डर बोल देता है, वो अब डरा हुआ नहीं होता," उसने कहा। "वो सिर्फ़ सावधान होता है। और सावधान आदमी को भैरव नहीं हरा सकता, क्योंकि भैरव डर पर राज करता है। डर नहीं, तो राज नहीं।"

मैं सीढ़ी पर खड़ा था, और मेरी टाँगें अब काँप नहीं रही थीं।

"अब सुन," रामदीन ने कहा। "मैं तुझे एक बात बताता हूँ जो तेरे पापा भी नहीं जानते थे।"

"क्या?"

"इस कुएँ के नीचे एक और अखाड़ा है।"

मेरे पैर के नीचे की सीढ़ी जैसे हिल गई।

"और भी नीचे?"

"हाँ। पर वो अखाड़ा कुश्ती का नहीं है।" उसने रुककर साँस ली। "वो अखाड़ा उन लोगों का है जो यहाँ मिट्टी में सोते थे — साधु, संत, पहलवान — जो सैकड़ों साल पहले इस जगह पर आए थे। उन्होंने यहाँ मिट्टी में अपना पसीना, अपनी साधना, अपनी दुआएँ गाड़ दीं। और वो मिट्टी आज भी ज़िंदा है।"

"मैं जानता हूँ," मैंने कहा। "कालू काका ने बताया था।"

"कालू ने तुझे आधा बताया," रामदीन ने कहा। "उसने तुझे ये नहीं बताया कि उस मिट्टी से ताकत तभी मिलती है जब मन साफ़ हो। और भैरव का मन साफ़ नहीं है। इसलिए वो उस मिट्टी को उठाकर अपने पास रखना चाहता है — शहर के अखाड़ों में बेचने के लिए। वो सोचता है कि मिट्टी में ताकत है, और ताकत खरीदी जा सकती है।"

"और सच क्या है?"

"सच ये है," रामदीन ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब कोई हिचक नहीं थी, "कि वो मिट्टी भैरव के हाथ में पहुँचते ही मर जाएगी। सिर्फ़ मिट्टी हो जाएगी। क्योंकि मिट्टी उसी को ताकत देती है जो उसमें पसीना डालता है। जो उसे बेचता है, उसके लिए वो सिर्फ़ कीचड़ है।"

मैंने लालटेन की रोशनी में अपने हाथ देखे। उन पर मिट्टी लगी थी, और वो मिट्टी मेरी थी।

"तो भैरव को ये नहीं पता?"

"उसे पता है," रामदीन ने कहा। "पर वो मानता नहीं। वो सोचता है कि वो सबसे चालाक है। वो ये नहीं समझता कि इस खेल में चालाकी नहीं चलती — इस खेल में सिर्फ़ ईमानदारी चलती है।"

मैंने गहरी साँस ली। कुएँ की हवा अब पहले जितनी ठंडी नहीं लग रही थी।

"रामदीन काका, एक बात बताओ।"

"बोल।"

"जब भैरव ने तुम्हें यहाँ बंद किया, तो उसने तुम्हें मारा क्यों नहीं?"

वो हँसा। पर इस बार हँसी में कुछ और था — कुछ जो मैं पहचान नहीं पाया।

"क्योंकि मैंने उससे कहा था कि अगर मैं मरूँगा, तो तेरे पापा को एक चिट्ठी मिलेगी जिसमें सब लिखा होगा। और वो चिट्ठी," उसने कहा, "आज भी उसी जगह है जहाँ उसने छिपाई थी।"

"कहाँ?"

"वो तुझे खुद ढूँढना पड़ेगा," उसने कहा। "क्योंकि अगर मैं बता दूँ, तो तू वहाँ जाकर सिर्फ़ चिट्ठी उठा लाएगा। पर असली बात चिट्ठी नहीं है, बेटा। असली बात वो रास्ता है जो तुझे उस तक ले जाएगा। उस रास्ते पर तुझे अपने पापा का पसीना मिलेगा।"

मैं चुप हो गया।

और फिर मैंने कुछ सुना — ऊपर से। पैरों की आहट। दीवार के पीछे कोई चल रहा था।

मेरा शरीर सख़्त हो गया।

"रामदीन काका—"

"मुझे पता है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अब जल्दी थी। "वो आ गया। वो हर रात आता है, ये देखने कि मैं ज़िंदा हूँ या मर गया। और आज उसने तेरी लालटेन देख ली होगी।"

"मैं चला जाऊँगा—"

"नहीं!" उसकी आवाज़ में पहली बार डर आया। "अभी नहीं। अगर तू अभी ऊपर गया, तो वो तुझे इसी सीढ़ी पर पकड़ेगा। तू ऊपर जा, पर तब जब वो जाए। और वो जाएगा — क्योंकि उसका समय कम है। वो हर रात सिर्फ़ इतनी देर आता है।"

मैं उसी सीढ़ी पर जम गया, और मेरी साँस सीने में कैद हो गई।

ऊपर आहट रुकी।

मैंने सुना — भारी साँस। और फिर वो आवाज़, जिससे मेरी हर हड्डी पहचानती थी।

"रामदीन।"

रामदीन ने कोई जवाब नहीं दिया।

"रामदीन, मुझे पता है तू ज़िंदा है। मैंने तेरी खाँसी सुनी है।" भैरव की आवाज़ में वो मिठास थी जो सिर्फ़ ज़हर में होती है। "आज कोई तेरे पास आया था। मैंने लालटेन देखी है।"

रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा — मैं उसे नहीं देख सकता था, पर मुझे महसूस हुआ। फिर उसने ऊपर की तरफ़ देखकर कहा —

"हाँ, आया था।"

मेरा खून जम गया।

"कौन?"

"मैं नहीं बताऊँगा।"

"तो मैं नीचे आकर पूछूँगा।"

"आ जा," रामदीन ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब कोई डर नहीं था। "आ जा, भैरव। नीचे आ। पर एक बात याद रख — जो नीचे आता है, वो ऊपर नहीं जाता। तूने मुझे यहाँ बंद किया था, तू भूल गया? तूने ये सीढ़ियाँ तुड़वाई थीं। अब तू खुद इन पर आएगा, तो तेरे लिए भी कोई सीढ़ी नहीं बचेगी।"

ऊपर सन्नाटा छा गया।

मैंने अपनी साँस रोक ली। मेरे हाथ में लालटेन थी और वो काँप रही थी, और उसकी रोशनी सीढ़ियों पर नाच रही थी।

फिर भैरव बोला, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ हिला हुआ था।

"तू बूढ़ा हो गया है, रामदीन। तेरी बातें पुरानी हो गई हैं।"

"पुरानी बातें मरती नहीं," रामदीन ने कहा। "वो बस सोती हैं। और वो तब जागती हैं जब कोई उन्हें जगाने वाला आता है।"

ऊपर पैरों की आहट फिर शुरू हुई — पर इस बार दूर जाती हुई। भैरव जा रहा था।

मैंने लंबी साँस छोड़ी।

"अब?" मैंने फुसफुसाकर कहा।

"अब तू ऊपर जा," रामदीन ने कहा। "पर ध्यान से। वो कुएँ से दूर जाकर दीवार के पीछे खड़ा होगा, ये देखने के लिए कि कौन बाहर निकलता है। तू ढक्कन खोलकर बाहर निकलेगा, तो वो तेरा चेहरा नहीं देख पाएगा। बस तेरी चाल देखेगा। और तेरी चाल," उसने कहा, "अब बदल गई है।"

"क्या मतलब?"

"जब तू आया था, तो तेरी चाल में डर था। अब नहीं। वो तुझे पहचान नहीं पाएगा।"

मैंने सीढ़ियों पर पैर जमाया।

"रामदीन काका।"

"हाँ।"

"जब सब खत्म हो जाएगा — जब भैरव का खेल खत्म हो जाएगा — तब मैं आऊँगा। और तब मैं तुझे ऊपर ले जाऊँगा। चाहे तेरी आँखें रोशनी न सहें।"

नीचे से कोई जवाब नहीं आया।

फिर उसकी आवाज़ आई, बहुत धीरे, जैसे कोई दुआ पढ़ रहा हो —

"तेरे पापा ने भी यही कहा था, बेटा। और मैंने भी यही कहा था — तू आ जा। पर वो नहीं आए। क्योंकि वो उससे पहले मर गए। तू मत मरना जब तक वादा पूरा न कर ले।"

मेरी आँखें भर आईं।

मैंने उसे जवाब नहीं दिया। मैंने सिर्फ़ सीढ़ी चढ़नी शुरू की।

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