Spirit of a Fighter – Chapter 273
माँ ने लालटेन मेरे और उनके बीच रखी और वो भी बैठ गईं। उनके घुटनों की हड्डी ने आवाज़ की।
"मैंने बीस साल से किसी को कुछ नहीं बताया," उन्होंने कहा। "आज बताती हूँ।"
मैं चुप रहा।
"तेरे पापा उस कुएँ के नीचे गए थे," उन्होंने कहा। "एक रात। बिना बताए। मैं जागी रही, और सुबह के धुंधलके में वो लौटे। उनके हाथ काँप रहे थे, उनकी धोती पर ऐसी मिट्टी लगी थी जो इस गाँव की नहीं थी — काली, गीली, और उसमें से बदबू आ रही थी, जैसे कोई पुरानी कब्र खुली हो।"
मैंने अपनी साँस रोक ली।
"मैंने उनसे पूछा, क्या हुआ। वो बैठ गए, वहीं, इसी आँगन में। और उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा — ऐसे, जैसे किसी चीज़ से बचाना चाहते हों।"
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर उनमें जान थी।
"और उन्होंने कहा — 'सरस्वती, उस कुएँ के नीचे मिट्टी नहीं है।'"
मैंने उनकी आँखों में देखा।
"फिर क्या है, माँ?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आवाज़ ऐसी धीमी थी जैसे वो कोई बोझ उठा रही हों।
"उन्होंने कहा — 'उस कुएँ के नीचे एक और अखाड़ा है।'"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। आँगन में लालटेन की लौ हिली, और परछाइयाँ दीवार पर नाचीं।
"एक और अखाड़ा?" मैंने दोहराया। "माँ, ये क्या बात हुई? कुएँ के नीचे अखाड़ा कैसे हो सकता है?"
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। "मैंने भी यही पूछा था। और वो बोले — 'वो अखाड़ा सैकड़ों साल पुराना है। उसकी मिट्टी में वो ताकत है जो आज किसी अखाड़े में नहीं बची। और उस मिट्टी को कोई छू नहीं सकता जो लालची हो।'"
"फिर?"
"फिर वो चुप हो गए। तीन दिन तक कुछ नहीं बोले। चौथे दिन उन्हें बुखार आया। और पाँचवें दिन…"
माँ रुक गईं। उनका गला भर आया, पर उन्होंने खुद को सँभाला।
"पाँचवें दिन वो बिस्तर से उठे और उन्होंने मुझसे कहा — 'सरस्वती, उस कुएँ का दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद होना चाहिए। किसी को नहीं बताना। और अगर मैं न रहूँ, तो वीर को भी मत बताना।'"
"और आपने बताया नहीं," मैंने कहा। मेरी आवाज़ में इल्ज़ाम नहीं था, बस एक टीस थी।
"मैंने नहीं बताया," माँ ने कहा। "क्योंकि मैं डरी हुई थी। और डर हमेशा सच को नहीं रोकता, बेटा। डर सिर्फ़ सच को टालता है। वो उसे बड़ा कर देता है।"
वो उठीं। उन्होंने लालटेन उठाई और उसकी रोशनी मेरे चेहरे पर डाली।
"अब सुन आख़िरी बात," उन्होंने कहा। "तेरे पापा ने उस रात एक और चीज़ कही थी। उन्होंने कहा — 'उस अखाड़े के नीचे कुछ और भी है। और जो वहाँ तक पहुँचेगा, वो वहाँ से वापस नहीं आएगा।'"
मेरी साँस रुक गई।
"तो मैं नहीं जाऊँगा?" मैंने पूछा।
माँ ने मेरे सिर पर हाथ रखा। उनका हाथ भारी था, और उसमें वो आशीर्वाद था जो सिर्फ़ माँ के हाथ में होता है।
"तू जाएगा," उन्होंने कहा। "क्योंकि जो तेरे पापा नहीं कर पाए, वो तुझे करना है। पर तू अकेला नहीं जाएगा।"
मैंने सिर उठाया।
"माँ—"
"मैं नहीं जाऊँगी," उन्होंने कहा, और हल्की-सी हँसी। "मेरी उम्र हो गई है और मेरी कमर में दर्द है। पर मैं तुझे कुछ दे सकती हूँ।"
वो अंदर गईं। मुझे लगा वो कुछ लेने गई हैं, पर वो सिर्फ़ अपने पल्ले से एक चीज़ निकालने गई थीं।
वो लौटीं और उन्होंने मेरी हथेली पर कुछ रखा।
मैंने देखा। एक छोटी-सी मिट्टी की गोली थी, सूखी, काली, और उसमें से वो गंध आ रही थी जो मैंने छत पर सूँघी थी — वही गहरी, वही ठंडी, वही पुरानी।
"ये तेरे पापा की जेब में मिली थी उस रात," माँ ने कहा। "मैंने इसे सँभालकर रखा था। मुझे नहीं पता इसमें क्या है, पर तेरे पापा ने कहा था — 'ये मिट्टी सबसे बड़ी ताकत है, और सबसे बड़ा ख़तरा भी।'"
मैंने उस गोली को अपनी हथेली में दबाया। वो ठंडी थी, और उसका वज़न किसी पत्थर से ज़्यादा था।
"शुक्रिया, माँ," मैंने कहा।
"शुक्रिया बाद में," उन्होंने कहा, और उठकर खड़ी हो गईं। "अब सो जा। कल सुबह जब तू उठेगा, तो तेरे पास एक रात की नींद होगी। और भैरव के पास एक रात की सोच। और तेरे पापा कहते थे — जो रात सोच में काटे, वो सुबह हारता है।"
वो अंदर चली गईं।
मैं आँगन में बैठा रहा, हाथ में वो काली मिट्टी की गोली लिए। लालटेन धीमी हो रही थी, और उसकी लौ एक-एक करके छोटी हो रही थी।
और उसी वक़्त मुझे कुछ सूँघाई दिया।
घर की दीवार के उस पार से — गली की तरफ़ से — धुएँ की गंध। बहुत हल्की, बहुत दूर, पर थी।
मैं उठा। दरवाज़ा खोला। गली में झाँका।
कोई नहीं था। पर गली के कोने पर, उस पुराने नीम के पेड़ के नीचे, एक लालटेन रखी थी — जलती हुई। और उसके पास, ज़मीन पर, एक छोटा-सा काग़ज़।
मैंने काग़ज़ उठाया और लालटेन के सामने खोला।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, और वो लाइन भैरव की लिखाई में थी —
"अखाड़े में एक और अखाड़ा है। उस तक पहुँचने का रास्ता सिर्फ़ मुझे पता है। सुबह मिल, तो बात करें। वरना तेरी माँ की दाल में आज रात नमक नहीं, कुछ और होगा।"
मेरे हाथ काँप गए।
मैं दौड़कर अंदर गया। माँ रसोई में थीं, चूल्हे के पास, दाल की हांडी को ढक रही थीं।
"माँ!"
उन्होंने पलटकर देखा। मेरे चेहरे से सब पढ़ लिया।
"क्या हुआ?"
मैंने काग़ज़ उनकी तरफ़ बढ़ाया। उन्होंने पढ़ा। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"माँ, आपने दाल में कुछ—"
"मैंने नहीं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ पत्थर जैसी सख़्त थी। "पर वो जानता है कि मैं कब पकाती हूँ, कब सोती हूँ, कब उठती हूँ। वो हमारे घर के बाहर नहीं है, वीर। वो हमारे घर की दीवारों के अंदर है।"
मैं रसोई में खड़ा रहा। चूल्हे की आग मेरे चेहरे पर लग रही थी, और मेरा शरीर ठंडा था।
फिर मैंने दाल की हांडी उठाई, उसे खोला, और अपनी नाक पास ले गया।
मैंने गहरी साँस ली।
दाल में ज़हर की गंध नहीं थी। पर कुछ और था — बहुत हल्का, बहुत नया, जैसे किसी ने सुबह के पानी में एक बूँद डाल दी हो।
मैंने हांडी वापस रखी और माँ की तरफ़ देखा।
"माँ, आज रात हम ये दाल नहीं खाएँगे।"
"और कल?"
"कल," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो उस रात पहली बार आई, "कल सुबह मैं उससे मिलूँगा। और मैं उससे वो पूछूँगा जो आज तक किसी ने नहीं पूछा।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में डर था, पर उस डर के पीछे कुछ और था — भरोसा।
"क्या पूछेगा?"
मैंने काली मिट्टी की गोली अपनी जेब में रखी और मैंने कहा —
"मैं उससे पूछूँगा — भैरव, तू उस दूसरे अखाड़े में गया है? और अगर गया है, तो तू लौटकर कैसे आया? क्योंकि पापा ने कहा था कि वहाँ से कोई लौटकर नहीं आता।"
माँ की आँखें फैल गईं।
और उसी वक़्त, दूर अखाड़े की तरफ़ से, कुएँ की घंटी बजी — वो पुरानी घंटी जो बरसों से नहीं बजी थी।
मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
"वो हमें बुला रहा है," मैंने कहा।
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा।
"मत जा।"
"माँ, वो घंटी तभी बजती है जब कोई नीचे जाता है। और आज रात मैंने किसी को नीचे जाते नहीं देखा।"
मैंने उनका हाथ धीरे से छोड़ा, और मैंने अपनी चप्पल पहनी, और मैंने दरवाज़ा खोला।
बाहर अंधेरा था, और उस अंधेरे में कुएँ की घंटी अब भी बज रही थी — धीमी, लगातार, जैसे कोई नाम पुकार रही हो।
मैंने एक कदम बाहर रखा।
और मेरी जेब में काली मिट्टी की गोली गरम होने लगी — जैसे उसे पता चल गया हो कि उसका वक़्त आ गया है।
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