Spirit of a Fighter – Chapter 265
"आज। अभी। पापा, जब तक वो अलमारी बंद है, भैरव के आदमी उसे खोलकर काग़ज़ निकाल सकते हैं। पुलिस भैरव को ले गई, पर उसके आदमी अभी भी गाँव में हैं।"
रणवीर सिंह ने उसकी तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर धीरे से उन्होंने अपना सिर हिलाया।
"अलमारी की चाबी कहाँ है?" मैंने पूछा।
कालू काका ने अपनी जेब से कुछ निकाला। एक छोटी, जंग लगी चाबी। उन्होंने मेरी हथेली पर रख दी।
"ये वो चाबी है जो रघुवीर ने मुझे दी थी," उन्होंने कहा। "बीस साल पहले। और कहा था — जिस दिन मेरा बेटा अखाड़े की मिट्टी में खड़ा हो, उस दिन ये उसे देना।"
मैंने चाबी को अपनी मुट्ठी में कस लिया। वो ठंडी थी और भारी थी और उसमें वो सब था जो रघुवीर बीस साल से कहना चाहते थे।
"चलो," मैंने कहा।
हम सब अखाड़े के उस कमरे की तरफ़ बढ़े जहाँ भैरव रहता था। कालू काका आगे थे, उनके पीछे मैं, फिर मीरा, फिर बब्बर, फिर टिंकू। माँ और गुड़िया दीवार के पास रुकीं — माँ ने कहा, "मैं यहीं रहूँगी। जो निकले, वो मुझे दिखाना।"
कमरे का दरवाज़ा खुला था। अंदर सब कुछ वैसा ही था — लोहे की अलमारी, उसके ऊपर रखी बोतलें, और दीवार पर लगी पुरानी तस्वीरें। पर कुछ बदला हुआ था। हवा में वो घुटन नहीं थी जो पहले थी।
मैंने चाबी को अलमारी के ताले में डाला। मेरे हाथ काँप रहे थे। चाबी घूमी। ताला खुला। दरवाज़ा खींचा।
अंदर सबसे ऊपर रखा था वो पीला काग़ज़। मैंने उसे उठाया। उस पर रघुवीर की लिखाई थी। मैंने उसे पढ़ा।
"आज मैंने अपने भाई को अखाड़े से बाहर किया। वो मेरा भाई नहीं रहा। उसने मेरे पीछे पानी में कुछ मिलाया था। मुझे पता है। पर मैंने किसी को नहीं बताया, क्योंकि जिस दिन बताऊँगा, उस दिन मेरी पत्नी और मेरी बेटी खतरे में होंगी। पर आज मैं लिख रहा हूँ, ताकि जिस दिन मेरा बेटा बड़ा हो, वो जाने कि उसके पापा डरपोक नहीं थे। उसके पापा ने सिर्फ़ अपनी बेटी को बचाया। और अपने बेटे को… उस बेटे को जिसे मैंने कभी गोद में नहीं उठाया।"
मेरी आँखों से पानी आ गया।
नीचे और लिखा था — "अगर मैं न रहूँ, तो मेरा बेटा इस ज़हर को पानी में नहीं, मिट्टी में डालेगा। क्योंकि मिट्टी में डाला ज़हर पानी से दस गुना ज़हरीला होता है। पर मिट्टी उसे सोख भी लेती है। और उसे सोखने के बाद वो मिट्टी ज़हर नहीं, ताकत बन जाती है। यही अंतर है पानी और मिट्टी में। पानी भूलता नहीं। मिट्टी माफ़ कर देती है।"
मैंने काग़ज़ को अपनी छाती से लगाया। और उस पल मुझे लगा कि रघुवीर मेरे सामने खड़े हैं— धोती में, मिट्टी में लिपटे हुए, और वो मुस्कुरा रहे हैं।
"मीरा," मैंने कहा। "तेरे पापा का नाम यहाँ है।"
मीरा ने काग़ज़ पढ़ा। उसकी आँखें भर आईं। उसने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा और कुछ नहीं कहा।
तभी टिंकू ने अलमारी की निचली तरफ़ देखा। "भाई," उसने कहा। "यहाँ एक और चीज़ है।"
उसने एक छोटा बक्सा निकाला। वो बक्सा साधारण था, पर उसमें एक ताला था जो बिना चाबी के नहीं खुलता।
"ये ताले की चाबी किसके पास है?" मैंने पूछा।
कालू काका ने अपना सिर हिलाया। "मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर मुझे याद है, रघुवीर ने कभी कहा था — 'जो चीज़ सबसे अंदर है, उसे सबसे आख़िर में खोलना।'"
मैंने बक्सा उठाया। वो भारी था। भैरव की अलमारी में, सबसे नीचे, सबसे अंदर।
"इसे अभी नहीं खोलेंगे," मैंने कहा। "जब सब सामने हों, तब खोलेंगे।"
पर तभी बाहर से आवाज़ आई। किसी के भागने की आवाज़। मैं दौड़कर बाहर आया।
लुट्टन भाग रहा था। उसके हाथ में एक सफ़ेद थैली थी। और वो दीवार की तरफ़ भाग रहा था।
"लुट्टन!" मैंने चिल्लाया।
वो रुका नहीं। पर उससे पहले कि वो दीवार के छेद तक पहुँचता, बब्बर उसके सामने आ गया।
"कहाँ जा रहा है?" बब्बर ने कहा। और उसकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो बीस साल से सोई हुई थी।
लुट्टन रुक गया। उसने थैली को अपनी छाती से लगाया।
"बब्बर भाई," वो हाँफते हुए बोला, "मैं तो… मैं तो बस…"
"थैली दे," बब्बर ने कहा।
लुट्टन ने थैली दी। बब्बर ने उसे खोला। उसमें पैसे थे। बहुत सारे पैसे। और एक चिट्ठी थी।
"ये भैरव सर ने मुझे दी थी," लुट्टन ने कहा। "कहा था — अगर आज कुछ गड़बड़ हो, तो ये लेकर भाग जाना। और किसी को कुछ न बताना।"
"और तू भाग रहा था?" बब्बर ने पूछा।
लुट्टन ने सिर नीचे कर लिया।
"लुट्टन," मैंने कहा। "तूने बीस साल उसका पानी पिया। आज उसके लिए भाग रहा था?"
लुट्टन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था। "मुझे नहीं पता," वो बोला। "मुझे नहीं पता कि मैं किसके लिए भाग रहा था। मैं तो बस… मैं तो बस डर गया था।"
"डर किसका?" मैंने पूछा।
लुट्टन ने कोई जवाब नहीं दिया। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। बब्बर ने थैली उसके हाथ में वापस थमा दी।
"रख ले," बब्बर ने कहा। "पर याद रख, ये पैसे तेरे नहीं हैं। ये उस आदमी के हैं जिसने तेरे पसीने का दाम दिया और तेरी आँखों पर पर्दा डाल दिया।"
लुट्टन ने थैली पकड़ी, पर उसके हाथ काँप रहे थे। वो वहीं बैठ गया, ज़मीन पर, और अपना सिर अपने घुटनों में छिपा लिया।
तभी पीछे से आवाज़ आई। "वीर!"
मैं पलटा। बब्बर मेरी तरफ़ बढ़ रहा था। उसके चेहरे पर वो हँसी नहीं थी जो पहले थी। इस बार उसकी आँखें तंग थीं।
"तूने मेरे घर में हाथ डाला," वो बोला। "मेरे भाई की अलमारी खोली। तू क्या समझता है खुद को?"
"तेरे भाई की अलमारी?" मैंने कहा। "बब्बर, वो अलमारी तेरे भाई की है, तेरी नहीं। और जिस चीज़ को तू बीस साल से ढक रहा है, वो आज सबके सामने है।"
"क्या सामने है?" उसने ठुड्डी उठाई। "एक पीला काग़ज़? मेरे भाई की लिखाई? कोई साबित करेगा कि ये सच है?"
"मैं करूँगा।" सरस्वती की आवाज़ आई। वो दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनके हाथ में वो पीला काग़ज़ था। "मैंने ये लिखते हुए देखा था। बीस साल पहले। इसी कमरे में।"
बब्बर एक कदम पीछे हटा।
"तू चुप क्यों रही?" उसकी आवाज़ फटी। "तूने बीस साल क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि मैं डरी हुई थी," सरस्वती ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो दर्द था जो सिर्फ़ एक माँ बोल सकती है। "क्योंकि मेरी बेटी छोटी थी। क्योंकि मुझे लगा कि अगर मैं चुप रहूँगी, तो कम से कम मेरी बच्ची ज़िंदा रहेगी। पर आज…" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "आज मेरे बेटे ने मुझे बताया कि चुप रहना भी एक तरह का ज़हर है।"
बब्बर ने अपनी मुट्ठी भींची। मुझे लगा वो अब मुझ पर झपटेगा। और वो झपटा।
पर मैंने पहली बार नहीं बचा।
पहले मैंने सिर्फ़ खुद को बचाया था। सोचा था, अगर मैं बचूँगा तो बाद में कुछ करूँगा। पर आज कुछ बाद में नहीं था। आज बस अभी था।
उसने मेरा गला पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया। मैंने उसकी दोनों कलाइयाँ पकड़ लीं। मेरी उँगलियाँ उसकी नसों पर जम गईं, और मैंने उसे अपनी तरफ़ खींचा। हमारे चेहरे के बीच सिर्फ़ एक बालिश्त रह गई।
"सुन," मैंने धीरे से कहा। इतना धीरे कि सिर्फ़ वो सुन सके। "तेरे पापा का बदला तू भैरव से ले, मुझसे नहीं।"
बब्बर ठिठक गया।
उसके हाथ मेरी पकड़ में ढीले पड़ गए। उसकी आँखों में कुछ टूटा। जैसे कोई बच्चा जिसे बीस साल बाद पता चले कि जिस आदमी ने उसे पाला, उसी ने उसका घर जलाया था।
"तू… तू झूठ बोल रहा है," वो फुसफुसाया।
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