Spirit of a Fighter – Chapter 259
"अंदर सीढ़ियाँ हैं," उन्होंने कहा। "धीरे उतरना। और वीर —" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, "— अंदर जाते ही अपनी नाक बंद कर लेना। मिट्टी की गंध तुझे भड़का देगी। और अभी हमें तेरी नाक चाहिए, तेरी बेहोशी नहीं।"
मैंने सिर हिलाया।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। अंधेरे में उसका चेहरा सिर्फ़ आधा दिख रहा था — एक आँख, एक गाल, एक होंठ।
"डर लग रहा है?" उसने धीरे से पूछा।
"लग रहा है," मैंने कहा। सच बोला। "तुम्हें?"
"बहुत," उसने कहा। और फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया और मेरी कलाई पकड़ ली। "पर डर के साथ चलना आता है। पापा ने सिखाया था।"
मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा।
हम सीढ़ियों पर उतरे। एक, दो, तीन। अंधेरा गाढ़ा होता गया। कालू काका ने अपनी जेब से एक माचिस निकाली और दीवार पर टिकी एक पुरानी लालटेन जला दी। रोशनी छोटी थी, पर काफ़ी।
दस सीढ़ियों के बाद एक चौड़ा रास्ता शुरू हुआ। दीवारों पर नमी थी, उँगली लगाओ तो पानी। हवा में गंध थी — मिट्टी, पुरानी लकड़ी, और उसके नीचे कुछ और। कुछ जला हुआ।
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा।
"ये रास्ता अखाड़े की दीवार के नीचे से जाता है," उन्होंने कहा। "बीस साल पहले भैरव इसे इस्तेमाल करता था। मैंने उसे एक बार यहाँ से आते देखा था — रात में, अकेले, हाथ में बोतल लिए।"
"तो ये रास्ता भैरव का है," बब्बर ने कहा। "वो इसे जानता है।"
"जानता है," कालू काका ने कहा। "पर उसे नहीं पता कि इसकी एक और शाखा है। जो सीधे उसके कमरे के नीचे जाती है।"
मैंने रास्ते में आगे देखा। अंधेरा गहरा था।
"और वो शाखा?" मैंने पूछा।
"दीवार में एक पत्थर है," कालू काका ने कहा। "जिस पर तीन निशान हैं। उसे दबाओ, तो रास्ता खुल जाएगा। पर वीर —" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखें लालटेन की रोशनी में चमकीं, "— उसके बाद जो कमरा आएगा, वहाँ से तेरी नाक काम नहीं आएगी। वहाँ सिर्फ़ तेरा दिमाग़ काम आएगा।"
हम चलते रहे। मेरी छाती में धक-धक हो रही थी। मीरा का हाथ अब भी मेरी कलाई पर था, और उसकी पकड़ गरम थी।
रास्ता मुड़ा। और फिर मैंने देखा — दीवार में एक पत्थर, थोड़ा अलग रंग का, जिस पर तीन छोटे निशान खुदे हुए थे।
कालू काका रुके। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"अब?" उन्होंने पूछा। "तू दबाएगा या मैं?"
मैंने अपना हाथ बढ़ाया। मेरी उँगलियाँ पत्थर पर टिकीं। पत्थर ठंडा था, पर उसके नीचे कुछ गरम था — जैसे दीवार के अंदर कोई साँस ले रहा हो।
और तभी, पत्थर दबाने से पहले, मैंने सुना।
दीवार के उस पार से — ज़ोर-ज़ोर से बजती घंटी। बार-बार। कोई भाग रहा था, और कोई चीख रहा था।
और उस चीख में एक नाम था।
"चंदा!"
बब्बर ने मेरा हाथ खींच लिया।
"वो मेरी बहन है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "वो अंदर है। और वो रो रही है।"
मैंने पत्थर से हाथ हटाया। मेरी नज़र मीरा पर गई। उसकी आँखें बड़ी थीं।
"अब क्या?" उसने पूछा।
अंदर से चीख फिर आई। इस बार शब्द साफ़ थे।
"बचाओ! कोई है? बचाओ!"
और फिर — भैरव की आवाज़। ठंडी। मीठी।
"चंदा, बेटा। तेरा भाई आज रात आएगा। बस थोड़ा इंतज़ार कर।"
मेरा खून जम गया। भैरव जानता था। वो हमारा इंतज़ार कर रहा था।
॥
"चंदा!"
बब्बर की आवाज़ अब भी वही नाम दोहरा रही थी। उसका हाथ मेरी कलाई पर जमा हुआ था, पसीना टपक रहा था मेरी त्वचा पर। दीवार के उस पार से घंटी की आवाज़ आ रही थी — पागलों की तरह, बिना रुके।
और फिर भैरव की वो मीठी आवाज़।
"चंदा, बेटा। तेरा भाई आज रात आएगा। बस थोड़ा इंतज़ार कर।"
मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। लालटेन की रोशनी में उनका चेहरा पत्थर जैसा था।
"वो जानता है," मैंने कहा। "वो जानता है कि हम यहाँ हैं।"
"नहीं," कालू काका ने धीरे से कहा। "वो अंदाज़ा लगा रहा है। वो हमेशा अंदाज़ा लगाता है, और हमेशा सही निकलता है। यही उसका खेल है।"
"तो फिर हम रुक क्यों रहे हैं?" बब्बर ने कहा। उसकी आवाज़ फट रही थी। "मेरी बहन अंदर है!"
"शांत हो, बब्बर," मीरा ने कहा। उसने उसका कंधा पकड़ा। "अगर हम टूटे दरवाज़े से घुसे, तो हम सीधे उसके हाथ में गिरेंगे। वो यही चाहता है।"
"तो क्या करें?" बब्बर ने पूछा। "यहाँ खड़े रहकर उसकी बहन को रोते सुनें?"
मैंने आँखें बंद कीं। दीवार के उस पार की हवा मेरी नाक में आ रही थी — पत्थर के छेदों से, दरारों से। उसमें मिट्टी थी, नमी थी, और फिर वो कड़वी गंध — तेज़, जैसे कुछ जल रहा हो। जली हुई लकड़ी नहीं। कुछ और।
"कुछ जल रहा है अंदर," मैंने कहा। "पर लकड़ी नहीं। कुछ और।"
"क्या?" मीरा ने पूछा।
मैंने गहरी साँस ली। फिर पहचाना।
"काग़ज़। बहुत सारा काग़ज़।"
कालू काका का चेहरा बदल गया।
"उसकी अलमारी," उन्होंने कहा। "वो अपनी अलमारी जला रहा है।"
"क्यों?" बब्बर ने पूछा।
"क्योंकि वो जानता है कि अब वो बच नहीं सकता," मीरा ने कहा। "वो सबूत मिटा रहा है।"
मेरा दिल ज़ोर से धड़का। अगर वो अलमारी जला देगा, तो सब खत्म। बीस साल के काग़ज़, हर मौत का हिसाब, हर चिट्ठी — सब राख।
"चाबी?" मैंने कालू काका से पूछा।
"तेरे पास है," उन्होंने कहा। "दोनों।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। दोनों चाबियाँ वहीं थीं। ठंडी। मेरी हथेली में चुभ रही थीं।
"तो फिर रास्ता खोलो," मैंने कहा।
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था। डर। सिर्फ़ डर नहीं। कुछ और।
"याद रख," उन्होंने कहा। "जब वो पत्थर खुलेगा, तो अंदर जो हवा आएगी, वो तुझे बेहोश कर सकती है। वो कमरा बीस साल से बंद है। उसके अंदर जो साँस है, वो ज़हर है। मुँह पर कपड़ा रखना। और नाक से साँस मत लेना।"
"मैं नाक से ही ज़िंदा हूँ," मैंने कहा।
"आज नहीं," उन्होंने कहा। "आज तेरी नाक ही तेरी दुश्मन है।"
मीरा ने अपनी दुपट्टा खोला और फाड़कर दो टुकड़े किए। एक मुझे दिया, एक बब्बर को।
"मुँह पर बाँध लो," उसने कहा।
मैंने बाँध लिया। कपड़े में उसकी दवाइयों की गंध थी — तुलसी, अदरक। उस गंध के नीचे मुझे थोड़ी हिम्मत मिली।
कालू काका ने पत्थर पर हाथ रखा। उन्होंने आँखें बंद कीं, जैसे कोई दुआ पढ़ रहे हों। फिर दबाया।
पत्थर अंदर की तरफ़ धँसा। पहले थोड़ा, फिर पूरा। और फिर एक आवाज़ आई — लकड़ी के पहिये की, जैसे कोई पुराना दरवाज़ा खुल रहा हो। दीवार हिली।
और रास्ता खुल गया।
अंदर से हवा का एक झोंका आया। गरम। बहुत गरम। जैसे भट्ठी का मुँह खुला हो। उसमें वो कड़वी गंध थी — जलता काग़ज़, पिघलती स्याही, और उसके नीचे कुछ और। कुछ धातु जैसा।
तांबा। जलता तांबा।
"अलमारी पीतल की है," कालू काका ने कहा। "लोहे के ताले लगे हैं। जब आग लगती है, तो तांबा पहले पिघलता है।"
मैं आगे बढ़ा। कमरा छोटा था — दस कदम चौड़ा, दस कदम लंबा। बीच में अलमारी थी, और अलमारी के चारों तरफ़ आग। छोटी आग। पर फैल रही थी। फ़र्श पर पेट्रोल जैसा कुछ डाला गया था, और वो जल रहा था।
और अलमारी के सामने, कुर्सी पर बैठी, एक लड़की थी।
चंदा।
उम्र सोलह-सत्रह साल। दुबली। सिर पर चोटी। आँखें लाल, सूजी हुई। हाथ-पैर रस्सी से बँधे हुए कुर्सी से। और उसके मुँह पर कपड़ा बँधा था, जिसके नीचे से आवाज़ आ रही थी।
बब्बर ने एक कदम आगे बढ़ाया और फिर रुक गया। उसके पैर जैसे जम गए।
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