Spirit of a Fighter221 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 221

6 min read November 5, 2026

"वीर," उसने धीरे से कहा। "तू आ गया।"

"तूने क्यों पिया?" मैंने उसका कंधा पकड़ा। "तूने क्यों पी लिया, लुट्टन?"

"क्योंकि…" उसने मुश्किल से साँस ली। "क्योंकि भैरव ने कहा कि अगर मैंने नहीं पीया, तो वो मेरी बहन को…" वो रुका। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। "मेरी बहन शहर में पढ़ती है। भैरव ने कहा कि अगर मैं उसकी बात नहीं मानूँगा, तो वो उसे भी वही पानी पिला देगा।"

मैंने उसे सहारा देकर बैठाया।

"मीरा!" मैंने पुकारा।

वो दौड़कर आई, टिंकू उसके पीछे। मीरा ने लुट्टन की नाड़ी पकड़ी, आँखें देखीं, और अपना डिब्बा खोला।

"इसे उल्टी करनी होगी," उसने कहा। "जल्दी।"

टिंकू ने कहा, "मैं पानी लाता हूँ।"

"नमक मिलाकर ला," मीरा ने कहा। "गरम पानी।"

टिंकू दौड़ा।

मैंने लुट्टन का हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, और उसकी साँस में वो कड़वाहट थी जो मैंने हरनाम की साँस में सूँघी थी।

"लुट्टन," मैंने कहा। "तू मेरा दुश्मन था। तूने मुझे धमकाया, तूने टिंकू की दुकान जलवाई…"

"मैंने नहीं जलवाई," उसने काँपते हुए कहा। "मैंने नहीं। वो भैरव के दूसरे आदमी थे। मैं तो बस…" उसने आँखें बंद कर लीं। "मैं तो बस डरता था। बीस साल से डरता था। जब मैं अखाड़े में आया, तो भैरव ने मुझे पहला गिलास दिया, और मैंने कहा — नहीं सर, मुझे नहीं चाहिए। और उसने मेरी तरफ़ देखा। बस देखा। और मैंने गिलास पी लिया।"

उसकी आँखों से आँसू गिर रहे थे।

"मैं बीस साल से उसका गुलाम हूँ, वीर। मैंने जो किया, वो सब मैंने अपनी मर्ज़ी से नहीं किया।"

मीरा ने उसका सिर अपनी गोद में रखा।

"अब बोलना बंद कर," उसने कहा। "और साँस ले।"

टिंकू पानी लेकर आया। मीरा ने लुट्टन को पिलाया और उसकी पीठ थपथपाई। लुट्टन ने उल्टी की — कड़वा, भूरा पानी जो ज़मीन पर गिरा और मिट्टी में समा गया।

मैं उस पानी को देखता रहा, और मेरे अंदर कुछ ठंडा हो गया।

ये वही ज़हर था। वही जो मेरे दोनों पापाओं को ले गया। वही जो मेरी माँ के शरीर में बैठा है। वही जो बीस साल से इस अखाड़े की मिट्टी में घुल रहा है।

और आज उसने लुट्टन को चुना।

लुट्टन कुछ देर बाद होश में आया। उसकी आँखें अब भी लाल थीं, पर साँस ठीक हो रही थी।

"बच गया," मीरा ने कहा। "पर ये आखिरी बार था, लुट्टन। अगर तूने दोबारा पिया, तो मैं तुझे नहीं बचा पाऊँगी।"

लुट्टन ने धीरे से सिर हिलाया।

फिर वो मेरी तरफ़ देखकर बोला, "वीर, एक बात है।"

"क्या?"

"भैरव ने आज सुबह मुझे बुलाया। बोला — वीर को तीन दिन बाद खेलना है। पर उसके पहले उसकी माँ की दवा खत्म हो जाएगी। और जब वो दवा के लिए आएगा, तो उसे वही देना जो तूने आज पिया।"

मेरा खून जम गया।

"उसने कहा कि मुझे तेरी माँ के पास जाना है?"

"हाँ," लुट्टन ने कहा। "और अगर तू गया, तो वो मुझे मार डालेगा। इसलिए मैंने खुद पी लिया। ताकि मैं उस काम के लायक न रहूँ।"

वो हँसा — एक टूटी हुई हँसी।

"मैं तेरी माँ के पास नहीं जाना चाहता था, वीर। मैं भैरव का आदमी हूँ, पर मैं किसी की माँ को ज़हर नहीं देना चाहता था।"

मैंने उसका हाथ पकड़ा। मेरे हाथ काँप रहे थे, पर इस बार गुस्से से नहीं — किसी और चीज़ से।

"तू अब भैरव का आदमी नहीं है," मैंने कहा।

"क्या?"

"तूने आज उसका पानी पीकर उससे मुँह मोड़ लिया। अब तू उसका नहीं है।"

लुट्टन ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ आई जो शायद बीस साल से बंद थी — उम्मीद। छोटी-सी, डरी हुई, पर थी।

"मैं क्या करूँ?" उसने पूछा।

"तू यहीं रुक," मीरा ने कहा। "मैं तुझे अभी दवा देती हूँ। और फिर तू मेरे साथ चलेगा। मेरे पापा के पास। वहाँ तू सब बताएगा।"

लुट्टन ने धीरे से सिर हिलाया।

टिंकू ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और धीरे से बोला, "वीर, अब लुट्टन हमारे साथ है। और लुट्टन भैरव के अंदर का आदमी है। वो जानता है कि भैरव कहाँ जाता है, कब जाता है, और क्या करता है।"

"हाँ," मैंने कहा।

"तो फिर," टिंकू ने कहा, "आज रात हम तीन नहीं, चार जाएँगे।"

मैंने लुट्टन के पास बैठकर उसकी पीठ पर हाथ रखा। उसका शरीर ठंडा था, पर साँस चल रही थी।

और मेरे दिमाग में एक ही बात घूम रही थी — भैरव ने आज सुबह लुट्टन को मेरी माँ के पास भेजने का प्लान बनाया था।

मतलब वो जानता है कि माँ की दवा कब खत्म होती है। वो जानता है कि माँ कब कमज़ोर पड़ेगी। वो जानता है कि उस वक़्त मैं कहाँ रहूँगा।

वो मेरी हर चाल का हिसाब रख रहा है।

पर एक बात वो नहीं जानता।

वो नहीं जानता कि मेरे पास मेरे पापा की डायरी है। वो नहीं जानता कि रणवीर सिंह अब बोल रहे हैं। वो नहीं जानता कि कालू काका ने मुझे वो रास्ता दिखाने का वादा किया है जो सिर्फ़ मिट्टी जानती है।

और सबसे बड़ी बात — वो नहीं जानता कि आज रात, जब वो सोचेगा कि सब सो गए हैं, तब उसके अपने आदमी उसके खिलाफ़ खड़े होंगे।

मैंने लुट्टन का हाथ छोड़ा और खड़ा हुआ।

"टिंकू," मैंने कहा। "तू लुट्टन को रणवीर सिंह के पास ले जा। मीरा, तू उनके साथ जा।"

"और तू?" मीरा ने पूछा।

"मैं कालू काका के पास जाऊँगा। अभी। उन्हें बताना है कि आज रात हमें जल्दी निकलना है।"

"मैं तेरे साथ चलूँगी।"

"नहीं।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "मीरा, तेरा काम यहाँ ज़्यादा ज़रूरी है। लुट्टन को तेरी ज़रूरत है। और तेरे पापा को भी। मैं कालू काका से मिलकर सीधे तेरे घर आ जाऊँगा।"

वो कुछ देर मुझे देखती रही। फिर उसने सिर हिलाया।

"अगर तू देर से आया," उसने कहा, "तो मैं खुद तहखाने आ जाऊँगी।"

"मैं देर नहीं करूँगा।"

वो मुस्कुराई, और मैंने उसकी आँखों में वो भरोसा देखा जो मुझे अब तक किसी ने नहीं दिया था। माँ के बाद, शायद पहली बार किसी ने मुझ पर इतना भरोसा किया था।

मैं मुड़ा और कालू काका की झोपड़ी की तरफ़ चल दिया।

सूरज ढल रहा था। आसमान में लाल रंग फैल रहा था — वही लाल जो अखाड़े की मिट्टी का था। और मुझे लगा कि आज आसमान भी उसी मिट्टी से बना है, जो मेरे पापा की है, जो मेरी है, और जिसे भैरव ने ज़हर से भर दिया है।

कालू काका की झोपड़ी का दरवाज़ा खुला था। अंदर लालटेन जल रही थी, और वो अपनी चारपाई पर बैठे कुछ सोच रहे थे।

मैंने अंदर कदम रखा।

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा, फिर लालटेन की लौ को छोटा कर दिया। झोपड़ी में अंधेरा थोड़ा और गहरा हो गया।

"बैठ," उन्होंने कहा।

मैं बैठ गया। चारपाई की रस्सियाँ मेरे वज़न से चरमराईं।

"तू जो पूछने आया है," काका ने कहा, "वो तेरी आँखों में लिखा है। पर मैं तुझे पहले कुछ और बताता हूँ।"

उन्होंने मेरी तरफ़ झुककर आवाज़ धीमी की। "आज सुबह भैरव ने अखाड़े का गड्ढा भरवाया। जानता है क्यों?"

"तीन दिन बाद खेल है," मैंने कहा। "मैदान बराबर कर रहा होगा।"

काका हँसे। पर हँसी में मिठास नहीं थी।

"वो गड्ढा अखाड़े का दिल है, वीर। वहाँ दो सौ साल की मिट्टी है। पहलवान वहाँ गिरते हैं, वहाँ का पानी पीते हैं, वहाँ का पसीना उसी मिट्टी में मिलता है। जब गड्ढा भरता है, तो पुरानी मिट्टी नीचे दब जाती है और ऊपर ताज़ी मिट्टी आ जाती है।"

"तो?"

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