Spirit of a Fighter – Chapter 157
तहखाने में पहले एक आदमी उतरा। खाकी वर्दी। चश्मा। हाथ में एक मोटी फ़ाइल।
उसके पीछे दो सिपाही थे।
और उनके पीछे — व्हीलचेयर। रणवीर सिंह। उनके हाथ कुर्सी के सहारे पर थे, और उनका चेहरा उस लालटेन की रोशनी में ऐसा लग रहा था जैसे पत्थर पर कोई पुरानी लिखाई उभर आई हो।
इंस्पेक्टर ने एक बार पूरे तहखाने को देखा। फिर भैरव को देखा।
"भैरव सिंह?" उसने कहा।
भैरव ने कोई जवाब नहीं दिया। वो दीवार से टिका खड़ा था, और उसकी आँखें रणवीर सिंह पर थीं। सिर्फ़ उन पर।
रणवीर सिंह ने अपनी कुर्सी आगे बढ़ाई। वो उसके करीब आए। बहुत करीब। और मैंने देखा कि उनके हाथ कुर्सी के सहारे पर कस रहे थे — इतने कस रहे थे कि उनकी उँगलियों की पोरें सफ़ेद हो गई थीं।
"बीस साल," रणवीर सिंह ने कहा।
उनकी आवाज़ धीमी थी। इतनी धीमी कि जैसे किसी ने दूर से कुआँ खोदा हो।
"बीस साल मैं इस कुर्सी पर बैठा रहा। और तू मेरे सामने खड़ा रहा। हर सुबह। हर शाम। मेरे अखाड़े में। मेरी मिट्टी में। और तू मुझे 'सर' कहता था।"
भैरव ने अपनी आँखें नीची कर लीं।
"मैंने तुझे छोड़ दिया था," भैरव ने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ में अब कोई मिठास नहीं थी। बस एक थकान थी, जैसे कोई बहुत दूर चलकर आया हो। "उस रात। कुएँ के पास। मैं तुझे मार सकता था, पर मैंने तुझे छोड़ दिया।"
"तूने मुझे नहीं छोड़ा," रणवीर सिंह ने कहा। "तूने मुझे ज़िंदा रखा, ताकि मैं देखता रहूँ। ताकि मैं हर रोज़ अपनी मिट्टी में तेरा राज चलते देखूँ, और कुछ न कर सकूँ। ये छोड़ना नहीं है, भवानी। ये सज़ा है।"
भैरव ने उनकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ पिघला।
और उसी पल — मैंने देखा — रणवीर सिंह ने अपने दोनों हाथ कुर्सी के सहारे पर रखे। उनकी बाँहें काँपीं। उनकी साँस फूली। और वो खड़े हो गए।
एक पल। दो पल। बस इतनी देर के लिए कि उनकी आँखें भैरव की आँखों के बराबर आ गईं।
पूरा तहखाना सन्न रह गया। मैंने मीरा को देखा — उसने अपने मुँह पर हाथ रख लिया।
और रणवीर सिंह ने कहा, उसी धीमी आवाज़ में, जो अब काँप नहीं रही थी:
"बीस साल तूने मेरी मिट्टी में ज़हर घोला। अब ये मिट्टी तुझे कभी माफ़ नहीं करेगी।"
फिर वो वापस कुर्सी पर बैठ गए। उनके पैर फिर सून्न थे। पर उनका चेहरा — उनका चेहरा अब वैसा नहीं था जैसा सुबह था।
इंस्पेक्टर ने अपनी फ़ाइल खोली।
"भैरव सिंह उर्फ़ भवानी सिंह," उसने कहा, "तुम्हें हिरासत में लिया जाता है। तुम पर पहलवानों को ज़हर देने, हत्या, धोखाधड़ी और सबूत मिटाने का इल्ज़ाम है।"
उसने एक सिपाही की तरफ़ देखा। सिपाही आगे आया, हथकड़ी लेकर।
भैरव ने अपने हाथ आगे नहीं बढ़ाए। वो खुद आगे बढ़ा — एक क़दम — और फिर रुका। वो पलटा। एक बार। और उसकी आँखें मुझ पर आईं।
उसकी आँखों में कोई गुस्सा नहीं था। कोई धमकी नहीं थी। अजीब-सी बात थी — और मुझे लगा जैसे वो मुझसे कुछ कहना चाहता है, पर शब्द उसके पास नहीं हैं।
वो बोला नहीं। वो सिर्फ़ मुड़ा, और सीढ़ियों की तरफ़ चला।
हथकड़ी उसकी कलाई पर बंद हुई। उसकी आवाज़ आई — धातु की। ठंडी।
और फिर वो सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। उसके पैर भारी थे। उसके कंधे झुके थे। पीछे से देखने पर वो भैरव सिंह नहीं लग रहा था — वो बस एक थका हुआ आदमी लग रहा था, जिसने बहुत लंबा सफ़र किया है और अब घर लौट रहा है।
वो सीढ़ियों पर ऊपर चढ़ता गया, और उसकी धोती का लाल रंग अंधेरे में घुलता गया।
जब वो ऊपर पहुँचा, तो मैंने अपनी साँस छोड़ी — ऐसी साँस जो शायद बीस साल से रुकी हुई थी। मेरे घुटने काँपे, और मैं मिट्टी पर बैठ गया।
मेरे हाथ में वो काग़ज़ अब भी था। "जगदीश सिंह — पानी से मरा। कोई शक नहीं।"
मैंने उसे सीने से लगा लिया। काग़ज़ गीला हो गया, पर मुझे पता नहीं कब। शायद मेरी आँखों से।
और तभी मैंने सीढ़ियों पर कुछ और महसूस किया — एक गंध। जानी-पहचानी। हल्दी और मिट्टी और चक्की की गंध।
मैंने अपना सिर उठाया।
माँ सीढ़ियों से उतर रही थीं। उनके हाथ में लालटेन नहीं थी, पर उनका चेहरा उस उजाले से भी ज़्यादा चमक रहा था। वो मेरे पास आईं। उन्होंने मेरा सिर अपनी गोद में रखा।
"देखा," उन्होंने धीरे से कहा, "मैंने कहा था न — भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है।"
मैंने उनके हाथ पकड़े। उनकी उँगलियाँ सूखी थीं, और उन पर चक्की की धूल थी। और मुझे लगा जैसे वो धूल इस तहखाने की सारी मिट्टी से ज़्यादा कीमती है।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भर्रा गई, "पापा का नाम मिला। उस काग़ज़ में। भैरव के हाथ की लिखाई में।"
माँ ने मेरी आँखों में देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं, पर उन्होंने एक आँसू भी नहीं बहाया।
"मुझे पता था," उन्होंने कहा। "जिस दिन वो नहीं लौटे, मुझे पता था। पर सबूत नहीं था।" उन्होंने मेरे माथे पर हाथ रखा। "अब है।"
मैं उठा। मेरे घुटनों में मिट्टी लगी थी। मैंने अपने आस-पास देखा — रामू, भोला, शंकर, टिंकू, कालू काका, मीरा, रणवीर सिंह।
और मेरी नज़र कालू काका पर पड़ी।
वो दीवार के सहारे खड़े थे। उनकी आँखें बंद थीं। उनके होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे — जैसे कोई प्रार्थना कर रहे हों, या किसी से बात।
मैं उनके पास गया।
"काका?"
उन्होंने अपनी आँखें खोलीं। उनकी आँखों में पानी था। और वो मुस्कुरा रहे थे।
"बीस साल," उन्होंने कहा। "बीस साल मैंने इस दीवार के नीचे ये छुपाया। और आज—" उनकी आवाज़ रुकी। "आज मुझे लगा कि मैंने जो किया, वो सही किया। उस दिन। जिस दिन मैं कुएँ से भागा था।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनकी हथेली ठंडी थी, पर उस पर बीस साल की मिट्टी थी।
"काका," मैंने कहा, "तुमने आज मुझे जो सिखाया — वो मैं कभी नहीं भूलूँगा।"
उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा।
"मिट्टी झूठ नहीं बोलती, बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी थी। "आज तूने ये साबित कर दिया।"
तभी रणवीर सिंह ने अपनी कुर्सी आगे बढ़ाई। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और फिर वो कुछ ऐसा बोले जो मुझे उम्मीद नहीं थी।
"वीर सिंह," उन्होंने कहा, "तू कल अखाड़े में नहीं उतरेगा।"
मेरा दिल धक्क से रह गया।
"क्यों?" मैंने कहा।
"क्योंकि भैरव ने चुनौती दी थी," रणवीर सिंह ने कहा, "और चुनौती देने वाला जेल में है। मुकाबला रद्द।" उन्होंने एक पल रुककर मेरी आँखों में देखा। "पर अब ये तेरा फ़ैसला है। तू अखाड़े में उतरना चाहता है, तो उतर। पर अब वो लड़ाई तेरी अपनी होगी। भैरव के खिलाफ़ नहीं — अपने लिए।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मुस्कुरा रही थी, और उसकी आँखों में वो सवाल था जो उसने नहीं पूछा।
मैंने एक गहरी साँस ली।
"मैं उतरूँगा," मैंने कहा। "कल सुबह। अखाड़े में।" मैंने अपनी मुट्ठी खोली, उसमें मिट्टी थी — लाल, गरम। "और मैं बिना किसी पानी के उतरूँगा। बस इस मिट्टी के सहारे।"
रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था — शायद वो चीज़ जो बीस साल से सोई हुई थी।
"ठीक है," उन्होंने कहा। "कल सुबह।"
और तभी — जब सब हँसने लगे, जब टिंकू मेरे गले लगा, जब गुड़िया ने कहीं ऊपर से मेरा नाम पुकारा — तभी मैंने कुछ सुना।
ये सीढ़ियों से नहीं आया। दीवार से नहीं आया।
ये मेरे सीने से आया। एक हल्की-सी सरसराहट। जैसे किसी ने कहा हो — "शाबाश।"
मैंने अपना हाथ सीने पर रखा। वहाँ कुछ गरम था। कुछ जो पहले नहीं था।
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