Spirit of a Fighter105 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 105

6 min read November 5, 2026

मेरे पीछे गुड़िया की साँस रुक गई। माँ ने गुड़िया का कंधा दबाया।

"क्यों बता रही हो मुझे?" मैंने पूछा।

"क्योंकि मामा ने भेजा है," लज्जो ने कहा। "कहा है — जाकर लड़के को बता दे कि मैदान में जो होगा, वो खेल से ज़्यादा है। और खेल में सब जायज़ है।"

वो मुड़ी और अंदर जाने लगी। फिर रुकी, पलटी, और माँ की तरफ़ देखा।

"तुम रघुवीर की औरत हो न?" उसने पूछा।

माँ ने ठुड्डी ऊपर की। "हाँ।"

लज्जो ने एक पल माँ को देखा, और उसके चेहरे पर कुछ बदला। जैसे किसी को कोई पुरानी चीज़ अचानक याद आ गई हो।

"मामा ने तुम्हारे बारे में कभी नहीं बात की," उसने धीरे से कहा। "पर एक बार, बहुत साल पहले, मैंने उन्हें रात में बैठकर एक पुरानी फोटो देखते देखा था। उसमें एक औरत थी। उन्होंने वो फोटो जल्दी से रख दी थी।"

माँ कुछ नहीं बोलीं।

लज्जो अंदर चली गई और गेट बंद हो गया।

हम तीनों सड़क पर खड़े रहे। दोपहर की धूप, धूल, और मेरी नाक में वो धतूरे वाली मिठास जो अब भी चिपकी हुई थी।

"भैया," गुड़िया ने धीरे से कहा, "वो औरत अच्छी नहीं है न?"

"नहीं है," मैंने कहा।

"पर उसने हमें बचाया।" गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा। "उसने बताया कि वो पानी में क्या है। अगर वो बुरी है, तो क्यों बताया?"

मैंने माँ की तरफ़ देखा। माँ का चेहरा पत्थर जैसा था।

"क्योंकि कोई भी इंसान पूरा बुरा नहीं होता, बेटी," माँ ने कहा। "कुछ लोग बुरे काम करते हैं, पर अंदर कहीं उनका भी कोई पुराना ज़ख़्म होता है जो उन्हें कुरेदता रहता है।"

"तो फिर हम उस पर भरोसा करें?" मैंने पूछा।

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "भरोसा सिर्फ़ उस पर करना जो तेरे साथ मिट्टी में खड़ा हो। बाकी सब तेरी नाक बताएगी।"

हम घर लौटे। माँ ने चूल्हा जलाया और गुड़िया को खाना दिया। मैं आँगन में बैठकर पापा की तांबे की डिबिया देखता रहा।

पर मेरा दिमाग एक ही बात पर अटका था — भैरव का कमरा। अलमारी। वो चाबी जो उसने मुट्ठी में कसी थी। अगर भैरव तीन दिन के लिए अखाड़ा बंद कर रहा है, तो ज़रूर वो उस अलमारी को खाली कर रहा है। और अगर वो खाली हो गई, तो हमारे हाथ में कुछ नहीं बचेगा।

मैंने टिंकू को मैसेज किया। फिर कालू काका के पास गया।

वो अपनी झोपड़ी के बाहर चटाई पर बैठे थे, हाथ में लोटा, और सामने ज़मीन पर एक कटोरी में पानी। वो पानी में उँगली डुबोकर मिट्टी पर छींटे दे रहे थे, धीरे-धीरे, जैसे कोई दुआ पढ़ रहा हो।

"काका," मैंने कहा। "आज रात मुझे अखाड़े के अंदर जाना है।"

कालू काका ने उँगली रोक दी।

"अभी तो तीन दिन बाद लड़ाई है," उन्होंने कहा। "जल्दी क्या है?"

"भैरव अलमारी खाली कर रहा है। अगर उसने काग़ज़ हटा दिए, तो सब खत्म।"

कालू काका ने लंबी साँस ली। फिर उन्होंने पानी वाला लोटा किनारे रखा और अपनी कमर सीधी करने की कोशिश की। कमर की हड्डी कड़कड़ाई।

"सुन," उन्होंने कहा। "अगर तू रात में अंदर जाएगा, तो वो पुराना रास्ता ही इस्तेमाल करना — नीम के पीछे वाला। पर आज रात वहाँ भैरव के आदमी होंगे। मैंने शाम को दो लालटेन वहाँ जाते देखी हैं।"

"तो फिर?"

कालू काका ने अपनी कुबड़ी के नीचे से कोई चीज़ निकाली। चाबी थी। पुरानी, जंग लगी।

"ये भैरव के कमरे के पिछले दरवाज़े की है," उन्होंने कहा। "बीस साल पहले मैं इसे रख लिया था। सोचा था, कभी काम आएगी।"

मैंने चाबी ली। वो मेरी हथेली में ठंडी लगी।

"पर एक बात याद रख," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक भारी हो गई। "अंदर जो कुछ देखे, चाहे वो जैसा भी हो, तू शांत रहना। भैरव के कमरे में हर चीज़ आवाज़ करती है — फर्श, दरवाज़ा, यहाँ तक कि हवा भी।"

"मैं संभाल लूँगा।"

"नहीं, तू नहीं संभालेगा," वो बोले। "इसीलिए तो मैं तेरे साथ चलूँगा।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी उम्र, उनकी कमर, उनके सूखे हाथ।

"काका, आप—"

"मैंने तेरे पापा को अकेले मरने दिया था," उन्होंने कहा। आवाज़ नरम थी, पर उसमें एक चुभन थी जो सीधे मेरे सीने में लगी। "आज अगर तू गया और मैंने कुछ नहीं किया, तो दूसरी बार कोई मरेगा और मैं बैठा रहूँगा। नहीं चलेगा।"

मैंने कुछ नहीं कहा। कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी।

रात ग्यारह बजे हम निकले। आसमान में बादल थे और चाँद छिपा हुआ था। यही हमारे काम का था।

मैंने माँ को सोता हुआ छोड़ा था। पर जब मैं दरवाज़े से बाहर पैर रख रहा था, तभी पीछे से आवाज़ आई।

"रुक।"

मैं पलटा। माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनके हाथ में दीया था, जो हवा में काँप रहा था।

"माँ, आप—"

"मैं तुझे नहीं रोकूँगी," उन्होंने कहा। फिर वो मेरे पास आईं और उन्होंने मेरे माथे पर हाथ रखा। उनकी हथेली ठंडी थी। "जा। पर एक बात सुन।"

"क्या?"

"तेरे पापा ने भी एक रात ऐसे ही चुपके से जाना था। मैंने रोका नहीं था।" उनकी आवाज़ रुकी। "और वो लौटकर आए थे। बदले हुए। चुप हो गए थे। महीनों तक उन्होंने अखाड़े का नाम तक नहीं लिया।"

मैंने उनका हाथ पकड़ा। "मैं लौटूँगा।"

"मुझे नहीं बोलना इसे," उन्होंने कहा। उनकी आँखों में पानी था, पर वो नहीं गिरा। "सच बोल। जो देखेगा, उसे संभाल पाएगा?"

मैंने एक पल सोचा। सच में सोचा।

"नहीं पता," मैंने कहा।

माँ ने मेरा माथा चूमा। "अच्छा जवाब। झूठ वाला जवाब घर में ही छोड़ जा।"

मैं बाहर निकला। टिंकू गली के मोड़ पर खड़ा था, हाथ में लालटेन और कंधे पर एक बोरी।

"क्या है बोरी में?" मैंने पूछा।

"रस्सी, दो रोटी, और एक डिब्बी में तेल।" उसने कहा। "पता नहीं क्या काम आए।"

"तू आ रहा है?"

"भाई, मैं तो कल से ही कसरत करने वाला था," उसने कहा। "बस ये मौका मिल गया।"

मैं हँसा। पहली बार उस दिन में।

कालू काका नीम के पेड़ के नीचे मिले। वो पहले से वहाँ थे, अपनी लाठी के सहारे खड़े।

"दो लालटेन अभी भी अंदर जल रही हैं," उन्होंने धीरे से कहा। "कमरे के पीछे वाली खिड़की के नीचे।"

टिंकू ने लालटेन धीमी कर दी। हम दीवार की तरफ़ बढ़े। मैंने कालू काका की चाबी जेब में टटोली।

अखाड़े की पिछली दीवार पर वो जगह थी जहाँ पुरानी ईंटें ढीली थीं। कालू काका ने एक ईंट खींची, फिर दूसरी। अंदर से हवा निकली — मिट्टी और पसीने की पुरानी गंध। और उसी में मिली हुई वो धतूरे वाली मिठास।

"जा," कालू काका ने फुसफुसाया। "मैं यहीं रहूँगा। अगर लालटेन बुझे, तो भागना।"

मैं अंदर घुसा। टिंकू मेरे पीछे। हम दबे पाँव चले। ज़मीन पर नरम मिट्टी थी, और मेरे पैर उसमें धँसते हुए रहे।

भैरव का कमरा पीछे की तरफ़ था। उसकी खिड़की से पीली रोशनी आ रही थी। मैंने खिड़की के पास से झाँका।

भैरव अंदर था। कुर्सी पर बैठा, मेज़ पर झुका हुआ, और हाथ में एक काग़ज़। उसके सामने अलमारी खुली थी — और खाली। बस नीचे के खाने में एक पुराना पीला काग़ज़ पड़ा था।

भैरव ने वो पीला काग़ज़ उठाया। फिर उसने अपनी जेब से एक चीज़ निकाली। छोटी सी, चमकती। चाबी। उसने उसे उँगली पर घुमाया, और फिर काग़ज़ को मोड़कर अपनी धोती की कमर में खोंस लिया।

फिर उसने कुछ कहा — मुझे शब्द नहीं सुनाई दिए, पर आवाज़ का लहजा मीठा था, जैसे कोई अपने आप से बात कर रहा हो।

और फिर वो उठा, लालटेन उठाई, बुझाई, और अँधेरे में बाहर निकल गया।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho