Spirit of a Fighter – Chapter 1
सुबह चार बजे रामपुर गाँव में जब सब सो रहे होते हैं, मेरी माँ का चक्की चलाना शुरू हो जाता है। घर्र, घर्र, घर्र। मैं चारपाई पर पड़ा ये आवाज़ सुनता हूँ और मेरी आँखें अपने आप खुल जाती हैं। पेट में जैसे कोई चूहा कुतर रहा हो। पिछली रात सिर्फ़ एक रोटी खाई थी। बासी। माँ ने आधी अपनी थाली से निकालकर मेरी थाली में रख दी थी और कहा था कि उन्हें भूख नहीं है। माँ को भूख नहीं है। जबसे होश सँभाला है, माँ को भूख नहीं है।
मैं उठता हूँ, पैरों को ज़मीन पर रखता हूँ। मिट्टी ठंडी है। आँगन में माँ बैठी हैं, चक्की के दोनों पाट पकड़े, और उनकी चोटी झूल रही है। सफ़ेद चोटी। माथे पर हल्दी का टीका सूखा हुआ।
“उठ गया?” माँ ने पीछे मुड़े बिना पूछा।
“पानी पीने आया था।”
“मटके में ताज़ा भरा है।”
मैं पानी पीता हूँ। ठंडा नहीं है, आधा गुनगुना है, पर गला तर हो जाता है। तभी दीवार पर लगी वो टूटी घड़ी टिक-टिक करती है। बारह बजे रुकी हुई घड़ी। बापू के ज़माने की है। कभी ठीक नहीं हुई। माँ कहती है — जो रुक जाए, उसे ठीक नहीं करना चाहिए, उसे याद रखना चाहिए। पता नहीं इसका क्या मतलब है, पर माँ जो कहती है, सीधा दिल में लगता है।
“आज कहाँ जा रहा है?” माँ ने चक्की रोक दी। उनकी कमर से एक आवाज़ आई, जैसे कोई सूखी लकड़ी चटके। माँ ने मुँह नहीं बनाया। माँ कभी नहीं बनाती।
“मज़दूरी पर। हरनाम ठेकेदार का काम है, ईंट ढोने का।”
“ईंट ढोएगा?”
“हाँ।”
“तेरे कंधे पहलवानी के हैं, बेटा। ईंट के नहीं।”
मैं चुप हो गया। यही तो बात है। माँ को सब पता है। मैंने कभी किसी को नहीं बताया कि मैं रातों को अखाड़े की दीवार के बाहर जाकर खड़ा रहता हूँ। पर माँ को पता है। माँ के पास आँखें हैं जो मुँह से ज़्यादा बोलती हैं। और उन्होंने कभी कुछ कहा नहीं। बस, जिस दिन मैं ज़्यादा देर से लौटता हूँ, उस दिन दाल में नमक कम डाल देती हैं। ताकि मुझे लगे कुछ बदला है। ताकि मैं सोचूँ कि माँ का हाथ फिसल गया। माँ यही सोचती हैं ना।
मैंने टूटी चप्पल पहनी और बाहर निकल गया।
गाँव की हवा में तीन तरह की गंध होती है। एक नीम के पेड़ की, जो पंचायत के चबूतरे के पास लगा है। दूसरी गीली मिट्टी की, जो तालाब के पास से आती है। और तीसरी, गोबर के उपलों की, जो हर घर के बाहर चूल्हे में जल रहे होते हैं। मेरी नाक इन तीनों को अलग-अलग पहचानती है। बचपन से पहचानती है। मुझे नहीं पता ये सब क्यों होता है। पता है तो बस इतना — जब मैं सूंघता हूँ, तो मुझे चीज़ें साफ़ दिखने लगती हैं, बिना आँखों से देखे।
बचपन में एक बार मैंने ये बात गाँव के लड़कों को बताई थी। बसलू ने कहा था — “तू तो कुत्ता निकला।” सब हँसे थे। मैं रोया था। उस दिन के बाद से मैंने किसी को नहीं बताया। माँ से भी नहीं। माँ को शायद पता है, पर माँ ने कभी पूछा नहीं। कभी-कभी लगता है माँ को सब पता है।
रास्ते में गुड़िया मिली। स्कूल जा रही थी, कॉपी दबाए, दो चोटियाँ हवा में उड़ रही थीं।
“भैया!” वो दौड़कर आई। “आज अखाड़े में नई भर्ती है। कालू काका ने बताया। भैया, तुम चले जाओ ना।”
“गुड़िया।”
“क्या? मैं तो सच कह रही हूँ।”
“तू स्कूल जा।”
“तुम डरते हो।” उसने आँखें सिकोड़कर देखा। “मुझे पता है तुम डरते हो। पर भैया, तुम उन सबको पछाड़ दोगे, मुझे पता है। मैंने प्रार्थना में भी कहा है।”
मैं हँस पड़ा। “प्रार्थना में क्या कहा?”
“कहा — भगवान, मेरे भैया को पहलवान बना दो, और उनके हाथ में मिठाई की डिब्बी दे दो ताकि वो सबको बाँटें।”
मेरा गला भर आया। बच्ची है। बारह साल की। उसे क्या पता कि मिठाई की डिब्बी से पहले रोटी का सवाल है। मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। “जा, देर हो रही है।”
वो भाग गई। कुछ कदम जाकर पलटी और चिल्लाई — “भैया, थैली तुम्हारी चारपाई के नीचे है!”
मुझे पता है। मैं रोज़ देखता हूँ। वो थैली। उसमें अखाड़े की लाल मिट्टी है। गुड़िया रोज़ चुपके से लाती है, जब कोई नहीं देखता। और मुझे कहती है — “इससे तुम्हारे हाथ मज़बूत होंगे।” मैंने कभी उसे नहीं बताया कि मैंने उस मिट्टी को छुआ भी नहीं। डर के मारे नहीं। इस डर से कि अगर छू लिया, तो सपना असली हो जाएगा। और असली सपने से डर लगता है।
अखाड़े की दीवार दूर से दिखने लगी। लाल मिट्टी की ऊँची दीवार, जैसे कोई किला हो। दीवार पर पुरानी तस्वीरें टँगी हैं — पहलवानों की, जो एक ज़माने में यहाँ जीते थे। मेरी नाक में पसीने की गंध आने लगी। मिट्टी की गंध आने लगी। और तेल की गंध भी — वो खास तेल, जो पहलवान मालिश के लिए लगाते हैं। सरसों का तेल, उसमें कुछ जड़ी-बूटियाँ मिली हुईं। ये गंध मुझे हर बार खींच लेती है।
मैं दीवार के उस छेद के पास गया जो मुझे सबसे पहले मिला था। पाँच साल पहले। तब मैं बीस साल का था और एक दिन यहाँ से गुज़र रहा था। छेद आज भी वही है। छोटा-सा। जितना एक आँख को चाहिए। मैंने आँख रखी।
अंदर मिट्टी गीली थी। दो पहलवान कुश्ती लड़ रहे थे। एक मोटा, भारी शरीर वाला। दूसरा नया, पतला, लंबा। उनके शरीर पर मिट्टी लिपटी थी, पसीना टपक रहा था। मैंने आँखें बंद कर लीं। मुझे आँखों की ज़रूरत नहीं थी।
मैंने गहरी साँस खींची। हवा में मिली गंधें मेरे अंदर घुलने लगीं। मोटे वाले के पसीने में नमक ज़्यादा था, और एक थकी हुई गंध — जैसे कोई पुराना कपड़ा जो बार-बार धोया गया हो। उसकी साँस फूल रही थी। उसके पैरों से ज़मीन पर दबाव कम पड़ रहा था। वो टूट रहा था, बस दिखा रहा था कि वो अभी भी खड़ा है। और नए वाले की गंध में कच्चापन था। मिट्टी की गंध उसके शरीर से ठीक से मिली नहीं थी। उसके पैर पक्के नहीं थे। उसके हाथ अभी सीख रहे थे। उसमें दम था, पर अनुभव नहीं।
मैंने धीरे से बुदबुदाया — “ये मोटा वाला थक गया है, साँस फूल रही है। दो मिनट में गिरेगा। और ये नया है, इसके पैर अभी कच्चे हैं। अगर ये मोटे वाले से बचता रहे और उसके पैरों पर वार करे, तो पलटी हो सकती है। पर ये करेगा नहीं। ये डरा हुआ है।”
मेरी जेब में दो रुपये की एक ठंडी गोली खड़खड़ाई। पैसे नहीं थे। दो रुपये की गोली — जो मैंने कल रात खाने के बाद मुँह में रखी थी और भूल गया था। मैं मुस्कुराया। दुनिया का सबसे बड़ा राज़ मेरे पास है, और जेब में दो रुपये भी नहीं।
तभी अंदर से आवाज़ आई। मीठी आवाज़। इतनी मीठी कि सुनकर लगे कि सामने गुड़ का डला रखा है। पर मुझे पता है, ये आवाज़ भैरव सिंह की है।
“लुट्टन, इसे पिला दे। आज का पानी ताज़ा है।”
मेरी नाक में कुछ घुसा। कड़वा। जला हुआ। जैसे कोई चीज़ गलत पक रही हो। मैंने गहरी साँस ली, फिर एक और। ये गंध मुझे पहले भी मिली थी। कब? सोचता हूँ। हाँ। पिछले साल। एक पहलवान बीमार पड़ा था। गाँव वाले कह रहे थे — कुदरत का सितम है। पर मुझे उस दिन भी यही गंध आई थी। उसके शरीर से। यही कड़वी, जली हुई। मैं उस दिन समझा नहीं था। आज समझ रहा हूँ — ये पानी में कुछ मिला है। कुछ ऐसा जो अंदर जाते ही शरीर को गला रहा है।
मैंने आँख फिर छेद पर रखी। एक आदमी अंदर आया। मोटा-तगड़ा, छोटी मूँछें, अखाड़े की वर्दी में। यही लुट्टन है। वो एक गिलास लेकर नए पहलवान के पास गया। नए पहलवान ने गिलास हाथ में लिया, सूंघा, और पीने को हुआ। मेरा दिल ज़ोर से धड़का। मैंने मुट्ठी भींची।
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