Billionaire Empire System – Chapter 85
"आपने मेरी दुकान का ताला कैसे खोला?" रवि ने पूछा।
"ताला खोलना बहुत आसान चीज़ है, बेटा।" शमशेर ने कहा। "मैं तुझे वो देने आया हूँ जो कोई नहीं दे सकता।"
"बलवंत नहीं दे सकता?" रवि ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी हो गई थी।
शमशेर की आँखों में एक हल्की चमक आई — जैसे किसी ने सही ताले में चाबी घुमा दी हो।
"मुझे तेरी समझ आती है।" उसने कहा। "बलवंत तुझे पैसा दे सकता है। दुकान दे सकता है। पाँच हज़ार का नज़राना माफ़ कर सकता है। पर सच नहीं दे सकता। उसके पास देने के लिए सच नहीं बचा।" उसने कुर्सी के पीछे झुककर एक लिफ़ाफ़ा उठाया और मेज़ पर रख दिया। "मेरे पास काग़ज़ हैं। गवाह हैं। और सबसे बड़ी बात…"
वो रुका। रुकावट जान-बूझकर थी, जैसे शिकारी जानता हो कि जाल अभी कसा नहीं है।
"…तुम्हारे पापा की आख़िरी बात।"
रवि की साँस जहाँ थी वहीं रुक गई। जैसे किसी ने उसके सीने पर हल्का सा हाथ रख दिया हो। पापा की आख़िरी बात। दस साल से वो सिर्फ़ चार लाइनें जानता था — आख़िरी रात की आवाज़, दालचीनी की गंध, अस्पताल का सफ़ेद कमरा, और माँ का रोता हुआ चेहरा।
शमशेर ने उसका चेहरा देखा। बहुत ध्यान से। जैसे कोई बीमारी का हाल जानने के लिए नब्ज़ टटोलता हो।
"तेरे पापा ने आख़िरी साँस में मेरा हाथ पकड़ा था।" उसने कहा। आवाज़ धीमी कर दी। "उस वक़्त भी उनकी आवाज़ वैसी ही थी — धीमी, ठंडी। जैसे दूर से आ रही हो। उन्होंने मुझसे कहा…" उसने रवि की आँखों में सीधा देखा। "शमशेर, मेरे बेटे को मेरी घड़ी मत देना।"
दुकान के अंदर चुप्पी उतर आई। बत्ती की गुनगुनाहट सुनाई दे रही थी। कहीं दूर गली में किसी का बर्तन गिरा — छन्।
रवि को अपने हाथ काँपते महसूस हुए। वो अपनी उँगलियों को बही से और कसकर दबा गया। क्योंकि घड़ी उसके सीने से थोड़ी ही नीचे, क़मीज़ के अंदर, जेब में थी। और ये बात सिर्फ़ उसे पता थी। माँ को भी नहीं, पिंकी को भी नहीं, इरा को भी नहीं।
शमशेर ने वो काँपना देखा।
उसकी हँसी बहुत धीमी थी, बस होंठों पर एक लकीर।
"तो घड़ी तेरे पास ही है ना, बेटा?" उसने कहा। बिलकुल हल्के से, जैसे कोई पूछ रहा हो कि चाय में चीनी कम है क्या।
पीछे से इरा ने कदम बढ़ाया। "सर।" उसकी आवाज़ साफ़ और ठंडी थी। "आपने जो अभी कहा, वो आपने हमारे सामने कहा। आपको पता है ना?"
शमशेर ने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी।
"सलाम ख़ान की बेटी।" उसने कहा। "तू भी बिलकुल अपने अब्बू जैसी है। वो भी हर बात से पहले सबूत माँगते थे।" उसने फिर रवि की तरफ़ देखा। "देख, तेरे पीछे खड़ी है। अच्छी है। तेरे साथ ऐसी ही चाहिए — जो सच को पकड़ सके।"
वो अपनी कुर्सी से उठा। उसने कुर्ते के बटन ठीक किए, जैसे कोई बहुत देर से बैठा हो और अब जाने की तैयारी कर रहा हो।
"मैं आज कुछ नहीं माँगने आया।" उसने कहा। "बस ये बताने आया था कि तेरे पापा आख़िरी वक़्त तक मुझ पर भरोसा करते थे। उन्होंने मुझे ही अपना काम सौंपा था।" उसने लिफ़ाफ़े को मेज़ पर थोड़ा आगे सरकाया। "इसमें एक पते की पर्ची है। वहाँ जो आदमी मिलेगा, वो तुझे बताएगा कि उस रात अस्पताल में कौन था, और किसने दवा की शीशी बदली थी।"
रवि ने लिफ़ाफ़े को नहीं छुआ।
"आप मुझे कुछ दे क्यों रहे हैं?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ अब भी धीमी थी, पर उसमें एक चुभने वाली सफ़ाई आ गई थी। "आपका इससे क्या फ़ायदा?"
शमशेर मुस्कुराया।
"फ़ायदा?" उसने दोहराया। "बेटा, मैं दस साल से रात को ठीक से सो नहीं पाया हूँ। रघु मेरा दोस्त था। मैंने उसे बचाने की बहुत कोशिश की। पर उस वक़्त मेरे हाथ बँधे थे।" उसने एक गहरी साँस ली। "अब मैं अपने हाथ खोल रहा हूँ। और ये सच तुझे दे रहा हूँ, क्योंकि सच उसका हक़ है — जो बेटा हो।"
वो दरवाज़े की तरफ़ चला। रवि के पास से गुज़रा — इतने पास से कि उसके कपड़ों से नीम और इत्र की हल्की गंध आई। दरवाज़े पर वो रुका।
और मुड़ा।
"एक बात याद रखना।" उसने कहा। उसकी आवाज़ में अब वो मिठास नहीं थी — कुछ और था, कुछ जो ठंडा कर देता था। "जिस दिन तू घड़ी का सच जानेगा, उस दिन तू मुझे माफ़ नहीं करेगा। क्योंकि उस घड़ी में जो आवाज़ है…"
उसने एक पल रुककर रवि की तरफ़ देखा।
"…वो मेरी है।"
और वो चला गया। शटर के नीचे से सफ़ेद कुर्ता गली की धूप में घुल गया। फिर गाड़ी का दरवाज़ा खुलने-बंद होने की आवाज़ आई — ठक। फिर इंजन की गुनगुनाहट दूर होती गई।
लुट्टन दौड़कर अंदर आया। उसका चेहरा पसीने से भीगा था। "यार, वो… वो कौन था?" उसकी आवाज़ फट रही थी। "मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा। पर जब वो गुज़रा, तो मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे पैर जमीन से चिपक गए हैं।"
रवि ने कुछ नहीं कहा। उसने धीरे से क़मीज़ की जेब से घड़ी निकाली। टूटी घड़ी — पुरानी, धूल भरी, सुइयाँ स्थिर। वो उसे अपनी हथेली में रखकर देखता रहा।
इरा ने फ़ोन रोका। उसने स्क्रीन देखी, फिर रवि की तरफ़ देखा। "मैंने सब रिकॉर्ड कर लिया।" उसकी आवाज़ में गुस्सा था — वो गुस्सा जो सब्र के नीचे दबा रहता है। "उसने आख़िरी बात कही — घड़ी में उसकी आवाज़ है। इसका मतलब वो जानता है कि घड़ी में क्या है।"
"हाँ।" रवि ने कहा।
"तो फिर हमें ये घड़ी उससे दूर रखनी होगी। या…"
"या क्या?"
इरा ने उसकी आँखों में देखा। "या हमें ये पता करना होगा कि घड़ी में आख़िर क्या है, इससे पहले कि वो हमसे छीन ले।"
लुट्टन ने एक कुर्सी खींचकर बैठ गया, जैसे उसके पैर अब काम नहीं कर रहे थे। "यार रवि," उसने कहा, "मुझे तो ये आदमी बलवंत से भी डरावना लगा। बलवंत गाली देता है, धमकाता है। ये… ये बस बैठा था और मेरे हाथ ठंडे हो गए। भगवान भी मुझे भूल गया है।"
रवि ने लिफ़ाफ़ा उठाया। उसने उसे खोला — अंदर एक छोटी सी पर्ची थी, जिस पर सिर्फ़ एक पता लिखा था — "पुराना अस्पताल, पीछे का गेट, दूसरी मंज़िल, दवा का कमरा।" और नीचे एक छोटा सा नाम — "बाबू ख़ान"।
"ये पता सच्चा हो सकता है।" इरा ने कहा, पर्ची को देखकर।
"या जाल।" रवि ने कहा।
"दोनों हो सकते हैं।" इरा ने कहा। "पर अगर उसने हमें जाल में फँसाना होता, तो वो घड़ी की बात क्यों करता? वो तो अपनी कमज़ोरी खुद बता गया।"
रवि ने सिर हिलाया। फिर उसने घड़ी को हथेली से उठाया।
उसका हाथ काँप रहा था। धीरे से उसने घड़ी अपने कान से लगाई।
शुरू में सिर्फ़ सन्नाटा था — कमरे की बत्ती की गुनगुनाहट, गली से किसी दूर के रेडियो की आवाज़, और उसके अपने दिल की धड़कन।
फिर…
घड़ी के अंदर से एक आवाज़ आई। बहुत धीमी। रुकी हुई। जैसे किसी ने बहुत सालों बाद साँस ली हो।
"बेटा…"
रवि की साँस रुक गई। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने घड़ी को कान से दूर किया, फिर फिर लगाया। आवाज़ गई नहीं थी। वो वहीं थी, अंदर, धीरे-धीरे साँस ले रही थी।
वो आवाज़ उसके पापा की नहीं थी।
वो किसी और की थी।
इरा ने उसका चेहरा देखा और उसका हाथ पकड़ लिया। "रवि? क्या हुआ? तुम्हारा चेहरा…"
रवि ने घड़ी को अपनी हथेली में कसकर दबाया। उसकी आँखों में पानी आ गया था, पर वो रो नहीं रहा था। वो डर रहा था।
वो फुसफुसाया — इतने धीमे से कि लुट्टन ने भी नहीं सुना, सिर्फ़ इरा ने, जो उसके बिलकुल पास खड़ी थी।
"तुम कौन हो?"
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